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अब तक कहां था संघ: ‘सुदर्शन निगरानी' के अभाव में बेलगाम सत्ता-सरकार-ब्यूरोक्रेसी

Khulasa First

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संवाददाता

09 जनवरी 2026, 1:44 pm
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अब तक कहां था संघ

पटवा सरकार तक संघ करता रहा है तालमेल, सीएम भी जाते थे संघ दफ्तर, शिवराज ने बदली परिपाटी, मोहन सरकार ने तो बिसरा ही दिया

न इंदौर में संगठन मंत्री व्यवस्था, न ताई-भाई जैसे नेताओं का दखल, भागीरथपुरा जैसा कांड तो होना ही था?

‘रणवीर सिंह' के समय भी ऐसे ही कांग्रेस ने उठाए थे सवाल, लेकिन ‘अर्चना' जिम्मेदारी से हटा नहीं, न सरकार डरी इंदौर की हो रही राजनीतिक व प्रशासनिक फजीहत क्या RSS को नजर नहीं आ रही थी?

18 जिंदगियों के काल-कवलित होने व इंदौर की उज्ज्वल छवि के तार-तार होने का क्या हो रहा था इंतजार?

कलेक्टर-मेयर को बुलाने से स्पष्ट है संघ की आज भी सुनी जाती है, तो फिर ये दखल शहर की थू-थू होने के पहले क्यों नहीं हुई?

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम की बेबसी, मंत्री के प्रति सत्ता की बेरुखी और शहर में हावी अफसरशाही से क्या अब तक अनभिज्ञ था संघ? इंदौर की हो रही राजनीतिक व प्रशासनिक फजीहत क्या आरएसएस को नजर नहीं आ रही थी? जबकि उसके तो शहर की गली-गली में ‘गटनायक' मौजूद हैं।

क्या आरएसएस हलकों में भी सरकार की तरह 18 जिंदगियों के काल-कवलित होने व इंदौर की उज्ज्वल छवि के देशभर में तार-तार होने का हो रहा था इंतजार? कलेक्टर-मेयर को बुलाने से स्पष्ट है संघ की आज भी सुनी जाती है, तो फिर ये दखल शहर की थू-थू होने के पहले क्यों नहीं हुई?

पटवा सरकार तक संघ करता रहा है इस तरह का तालमेल, सीएम भी जाते थे संघ दफ्तर, शिवराज ने क्यों बदली परिपाटी और मोहन सरकार ने क्यों मातृसंस्था को बिसरा ही दिया? ये तमाम सवाल एक मुलाकात से इंदौर की फिजा में 48 घंटे से तैर रहे हैं। कारण है ‘सुदर्शन निगरानी' का अब तक का अभाव।

न इंदौर में संगठन मंत्री व्यवस्था, न ताई-भाई जैसे नेताओं का दखल, लिहाजा भागीरथपुरा जैसा कांड तो होना ही था? ‘रणवीर सिंह' के समय भी ऐसे ही कांग्रेस ने उठाए थे सवाल, लेकिन ‘अर्चना' जिम्मेदारी से हटा नहीं, न सरकार दबी-डरी। अभी भी वक्त है, किसी को तो इंदौर का पालक बनना ही पड़ेगा। आरएसएस से बेहतर कोई पालक हो सकता है?

साल-ओ-साल बाद सत्ता व प्रशासन के बीच आरएसएस के दखल ने न सिर्फ इंदौर, बल्कि मध्य प्रदेश की पहले से ही गर्म सियासत में खासी हलचल पैदा कर दी। भागीरथपुरा कांड से गर्म प्रदेश की राजनीति में इस बात का उबाल आ गया कि इंदौर कलेक्टर किस हैसियत से आरएसएस दफ्तर में तलब किए गए? और कलेक्टर ऐसे कैसे संघ कार्यालय में जाकर ‘संघ दक्ष' हो गए?

राजनीति से हटकर एक सवाल इस मुलाकात पर इंदौर शहर से भी मुखर हुआ है कि अब तक कहां था संघ? क्या उसे इंदौर की राजनीतिक व प्रशासनिक रूप से हो रही फजीहत नजर नहीं आ रही थी या वह भी सत्ता और व्यवस्था की तरह भागीरथपुरा कांड का इंतजार कर रहा था?

कलेक्टर व मेयर के आरएसएस के प्रांत कार्यालय में हाजिरी देने से सियासी उठापटक से हटकर असल प्रश्न इंदौरियों के बीच से निकलकर सामने आया है। इस शहर के बाशिंदे इस मुलाकात में कुछ भी अजीब नहीं देखते, बल्कि वे इस मुलाकात को शहरहित में मानकर चल रहे हैं कि चलो, कोई तो है, जो इंदौर में पसरी अराजकता पर जवाब-तलबी की स्थिति में अब भी है।

अन्यथा ये इंदौर तो एक तरह से ‘राम भरोसे' कर दिया गया है। जिसकी जो मर्जी वो कर रहा है। न कोई पूछने वाला, न नजर रखने वाला, न फटकार लगाने वाला। जो चाहा, कर गुजरे। चाहे वे राजनीतिक फैसले हों या शहर के भविष्य से जुड़े मसले।

सब बेलगाम। सांसद, विधायक, पार्षद, मंत्री, मेयर, एमआईसी, पदाधिकारी और शहर की ब्यूरोक्रेसी। सबके अपने अपने आका और सिर्फ उनके प्रति आस्था-निष्ठा। इंदौर का कोई मालिक नहीं। जिसकी मर्जी, वैसा इस शहर के साथ सलूक करे। लूटे-खसोटे, मिल्कियत खड़ी करे, सही-गलत धंधों को शह दे, भागीदारी करे।

कोई जानने, समझने व पूछने वाला नहीं। एक तरह से सत्ता से जुड़ा तबका पूरी तरह बेलगाम। न अब शहर में कोई संगठन मंत्री, न ताई-भाई जैसा वरिष्ठ नेतृत्व, ताकि कहीं कुछ चमक-धमक बनी रहे। कभी अरविंद मेनन जैसी व्यवस्था व ताई-भाई जैसा तंत्र शहर में काम करता था। लिहाजा एक हद तक सब ‘सूत-सावल' में बना था। सत्ता भी, अफसरशाही भी। उस दौर में कभी इंदौर को ये सुनने को नहीं मिला कि ‘अफसर सुनते नहीं'।

अब इंदौर को बड़ी हैरत से ये सुनना व देखना पड़ता है कि यहां पर महापौर, मंत्री, पार्षदों की अफसर ही नहीं सुनते। कितने आश्चर्य की बात है कि इंदौर इस हालत में पहुंच गया, लेकिन किसी को फर्क ही नहीं पड़ रहा। न सरकार इस बात पर गंभीर, न संगठन को चिंता कि प्रदेश के सबसे बड़े शहर में ये हाल क्यों और कैसे बन गए या किसने बना दिए।

ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि फिर ये शहर बार-बार क्यों एक राजनीतिक विचारधारा से बंध के रहे? ये सवाल ही आरएसएस के वैचारिक अनुष्ठान पर सवाल खड़ा कर देता है, क्योंकि ये सब सत्ता का ताना-बाना आरएसएस की वैचारिक साधना के बल पर ही तो बुना गया। ऐसे में इस तरह की अराजकता पर भी आरएसएस खामोश या मूकदर्शक क्यों?

पटवाजी की कार तो सीधे ’76, रामबाग' पहुंचती थी
कांग्रेस का विरोध अपनी जगह सही है, तो भी अब शहरहित में इंदौर पर ‘सुदर्शन निगरानी' जरूरी हो गई है। 90 के दशक में ये निगरानी कायम थी। लिहाजा सत्ता व प्रशासन में न सिर्फ बेहतर तालमेल था, बल्कि इंदौर और यहां के नेतृत्व की प्रदेश में अपनी एक ठसक थी।

उसी दौर में आज का नेतृत्व बना व संवारा गया था। इस काम में ‘अर्चना' ने लीक से हटकर भूमिका का निर्वहन किया था। मुख्यमंत्री का इंदौर आगमन भी ‘अर्चना' प्रवास के बिना अधूरा रहता था। स्व. सुंदरलाल पटवा तो जब-तब ’76, रामबाग' पहुंच जाते थे। शिवराज सिंह के आगमन के बाद ये परिपाटी बदली और इंदौर के भाग्य के फैसले राजधानी भोपाल से जुड़ गए।

मुख्यमंत्री संघ के उच्च स्तर से जुड़ गए और ‘विभाग' व ‘प्रांत' एकदम परे हो गए। मौजूदा सरकार ने तो मातृसंस्था को जैसे बिसरा ही दिया। जब तक संघ का दखल रहा, सब कुछ ठीक रहा। लिहाजा 90 के दौर में ताजा-ताजा भाजपाई बना इंदौर भी संघ की इस फिक्रमंदी को देख कालांतर में कट्टर भाजपाई बना।

लेकिन आरएसएस के सत्ता व उससे जुड़े लोगों के क्रियाकलापों से आंख फेर लेने का असर ये हुआ कि आज पूरा इंदौर ये सोचने पर विवश है कि क्या इस दिन के लिए हमने एक दल विशेष की विचारधारा का 3 दशक से आंखें मींचकर साथ दिया? इंदौर का ये चिंतन की संघ की एक सदी की साधना के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए।

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