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मैच के टिकट जाते कहां हैं: टिकटों में हर बार ठगे जाते हैं इंदौरी; मुफ्तखोरों को तव्वजो

KHULASA FIRST

संवाददाता

19 जनवरी 2026, 7:49 पूर्वाह्न
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मैच के टिकट जाते कहां हैं

कभी कतार में लगकर खिड़की से मिलते थे ईमानदारी से टिकट, अब ऑनलाइन के नाम पर क्या चल रहा गड़बड़झाला?

क्रिकेटप्रेमियों के हिस्से में हर बार निराशा ही लगती है हाथ, इस बार टीम इंडिया ने भी तोड़ा दिल

आम इंदौरी टिकट के लिए तरसता-भटकता रहता है, रसूखदारों के घर कैसे पहुंच जाते टिकट?

आम इंदौरी को छोड़ नेता, अफसर, मंत्री, सांसद, पुलिस, जज, कुल-कुटुंब के लिए हैं टिकट-पास

आम जनता के लिए असंभव टिकट ब्लैक मार्केट में सहजता से कैसे उपलब्ध? इस बार भी खूब ब्लैक में बिके

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
85 पार्षद, 9 विधायक, 2 सांसद, 2 मंत्री, मेयर, अध्यक्ष सबके लिए टिकट हैं, हमारे लिए क्यों नहीं? कलेक्टोरेट, आरटीओ, आबकारी, पुलिस, एक्साइज, इन्कमटैक्स, सेल्सटैक्स, पुलिस थानों के लिए सहजता से टिकट उपलब्ध हैं, हमसे क्या दुश्मनी? भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन आदि शहरों तक टिकट पहुंच रहे तो इस इंदौर से क्या अदावत? जबकि ये तो वो शहर है, जहां असल ‘ब्याह मंडा' है।

यानी मैच हो रहा है। उसी शहर को बार-बार ठगाया हुआ क्यों महसूस कराए जा रहे हैं आप? जवाब दें-हर बार के मैच के बाद इंदौर की ये पीड़ा क्यों कि टिकट तो उपलब्ध ही नहीं हो पाए? ये शहर सिस्टम से ज्यादा सहजता से ब्लैक मार्केट से टिकट खरीदने को मजबूर क्यों हो रहा है?

असल क्रिकेटप्रेमियों से ज्यादा मुफ्तखोरों की चिंता क्यों? ये क्या नीति अपना ली कि जो उंगली उठाने या रत्तीभर भी नुकसान करने की स्थिति में हों, उन्हें स्टेडियम में बैठकर मैच देखने का सुख घर बैठे उपलब्ध करा दो। आम जनता का क्या? वह हर बार की तरह रो-झीककर रह जाएगी। कर क्या लेगी?

हर मैच-दर-मैच इंदौर में इंटरनेट की जगह ब्लैक मार्केट में टिकट कैसे सहजता से उपलब्ध हो रहा है? कौन हैं वे लोग या कौन-सा सिस्टम है, जो थोकबंद टिकट झपट रहा है, ताकि बाद में 1500 का टिकट 25 हजार व 5 हजार का 1 लाख में बिक जाए? आखिर हर मैच के बाद समूचे इंदौर में एक ही प्रश्न क्यों उठता है कि ये टिकट आखिर जाते कहां हैं?

ये इंदौर में मैच रखते ही क्यों हो, जब इस शहर के बाशिंदों को टिकट दे ही नहीं पाते हो तो? आखिर ये टिकट हर बार कहां चले जाते हैं? कौन है इनका थोक खरीदार, जिसके कारण इंदौर को टिकट मिल ही नहीं पाते? ये ऑनलाइन के नाम पर क्या तमाशा बना हुआ है?

जो सिस्टम औसत क्रिकेटप्रेमी को मैच देखने का आनंद मुहैया नहीं करा पा रहा, वो सुधारा या बदला क्यों नही जाता? ये क्या ढर्रा हो गया इस शहर में कि मैच देखना हो तो आपका रसूखदार होना या ‘जेक-जरिया' वाला होना जरूरी है? अन्यथा आप कितना ही उत्साह-उमंग अपने शहर में होने वाले मैच को देखने की रखो, किसी काम की नहीं।

आखिर जब टिकट जनसामान्य को दे ही नहीं सकते तो बार-बार यहां मैच रख क्यों लेते हो? कम से कम औसत इंदौरी के मन में ये मलाल-संताप तो न रहे कि वह अपने ही शहर में टीम इंडिया को खेलता न देख पाया।

क्रिकेट मैच को लेकर हर बार इंदौरी ठगे क्यों जाते हैं? मैच इंदौर को मिल रहा है, ये सुनते ही इंदौरी कितना खुश होता है कि इस बार तो वह स्टेडियम में मैच देखेगा। घर में बाल-बच्चों की भी मनुहार शुरू हो जाती है कि इस बार तो हम स्टेडियम में चलेंगे न?

लेकिन मैच के दिन आते-आते कितनी मायूसी व बेबसी इस इंदौरी के हिस्से में आती है, जब वह एक बार फिर ठगाया हुआ स्वयं को पाता है। कितनी आत्मा दुःखती है क्रिकेटप्रेमी की, जब हर बार ये अहसास होता है कि उसके हक के टिकट-कुर्सियां मुफ्तखोरों के हिस्से दे दी गईं। क्रिकेटप्रेमी से ज्यादा मुफ्तखोरों की चिंता है, तो क्यों रखते हो इंदौर में क्रिकेट मैच?

इस शहर की क्रिकेट व टीम इंडिया के प्रति दीवानगी आला दर्जे की है? टीमों के विमानतल से होटल, स्टेडियम, आते-जाते देखते हो न? नेट प्रैक्टिस निहारने को भी इंदौरी मर-मर जाता है। मुंह अंधेरे ही स्टेडियम, होटल, मंदिर, छप्पन पर लोग पहुंच जाते हैं कि कहीं भी खिलाड़ी आ सकते हैं।

फिर भी थोड़ी-सी दया-शर्म इन इंदौरी क्रिकेटप्रेमियों के लिए नहीं आती, जो टिकट दे ही नहीं पाते? टिकट उनके हिस्से में सहजता से पहुंच जाते हैं, जिनके लिए क्रिकेट देखने से ज्यादा स्टेडियम में पहुंचकर स्वयं का शहर में रसूख व स्टेटस दिखाना अहम रहता है।

टिकट रसूखदारों-ब्लैकमेलरों के पास कैसे पहुंच जाते हैं?
आखिर ये टिकट जाते कहां हैं? पहले तो इस शहर में ऐसा होता नहीं था कि मैच के टिकट आम आदमी की पकड़ से दूर और खास आदमी की जकड़ में हों। लंबी-लंबी कतारें लगती थीं स्टेडियम की खिड़कियों पर। वहीं से टिकट मिलते थे।

पहले आए सो पहले पाए की तर्ज पर क्रिकेट के दीवाने रात को बिस्तर भी खिड़की के पास लगा लेते थे कि सुबह अपन का पहला नंबर। कम से कम ईमानदारी से टिकट का बिकना इस शहर की आंखों के सामने तो होता था। ये पारदर्शिता के नाम और ऑनलाइन टिकट वितरण की व्यवस्था किस काम की, जब टिकट आम आदमी के हाथ लगे ही नहीं?

महज मिनट-दो मिनट में टिकट उड़नछू हो जाते हैं और असल क्रिकेटप्रेमी हाथ मसलता व मन मसोसता रह जाता है। वह ये हर बार जानने की कोशिश करता है कि जिस टिकट के लिए वह भटकता रहता है, वही टिकट रसूखदारों के घर चलकर कैसे पहुंच जाता है?

ये ऑनलाइन के नाम पर क्या चल रहा गड़बड़झाला?
ये ऑनलाइन के नाम पर कैसा सिस्टम कि जनसामान्य ये कहने की स्थिति में ही नहीं रहता कि उसने ऑनलाइन टिकट लिया? सुना इंदौर में किसी इंदौरी को कि वह ये दावा करे कि उसे ऑनलाइन सिस्टम के तहत टिकट मिल गया? या तो वह ब्लैक में टिकट मिलने की बात करेगा या किसी नेता-अफसर के दम पर जुगाड़ का दंभ भरेगा।

जब ऐसा ही है तो ये सिस्टम सुधारा क्यों नहीं जाता, बदला क्यों नहीं जाता? अगर टिकट की संख्या कम रहने का आपका दावा है, तो ये 35-40 लाख की आबादी वाले शहर में 20-25 हजार क्षमता वाला स्टेडियम लेकर क्यों बैठे हुए हो?

जब मैच बड़े ला रहे हो इंदौर में, तो इस शहर को एक 50-80 हजार की क्षमता का स्टेडियम क्यों नहीं देते? यूं तो मेट्रो लाते हो, स्वयं को स्मार्ट सिटी कहते हो, सेंट्रल इंडिया का बड़ा शहर इंदौर को बताते हो, लेकिन स्टेडियम वही, जरा-सा...!

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