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जब जागे, तब सवेरा: ‘सरकार' अब बदले इंदौर को लेकर अपना नजरिया

KHULASA FIRST

संवाददाता

05 जनवरी 2026, 7:50 पूर्वाह्न
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जब जागे, तब सवेरा

भागीरथपुरा कांड : एक बुरा सपना मानकर अब आगे की सुध लें नेता, निगम, सरकार, प्रशासन

एक-दूसरे को निपटाने की राजनीति से बाज आएं अब भाजपा नेता, जनता अब सब समझ गई

अब सब मिलकर इंदौर की करें चिंता, देशभर में हुई बदनामी से बाहर निकलने के हों सामूहिक प्रयास

इंदौर ने भाजपा पर आंखें मींचकर भरोसा किया है, गुटबाजी छोड़ अब आंखें खोलकर नेता जुटें जनसेवा में

वक्त है संभल जाएं, शहर ने अगर आंखें फेर ली तो फिर एक नहीं, सबका जीतना मुश्किल हो जाएगा

इंदौर निगम को नीचा दिखाने के कुचक्र में पूरे प्रदेश की हो गई बदनामी, प्रदेश सरकार को भी देखना पड़ा नीचा

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पूरा शहर अब अच्छी तरह से समझ गया है कि निर्दोष लोगों की जान क्यों और कैसे गई? भागीरथपुरा की आपदा जितनी दुखदायी व कष्टप्रद है, उतना ही इस संकट ने शहर की आंखें भी खोल दीं कि आखिर सत्तारूढ़ दल भाजपा के अंदरखाने क्या चल रहा है? इंदौरी इतने ‘गेलिये' भी नहीं, जितना भाजपा नेता समझने लग गए हैं।

डेढ़ दर्जन मौतों ने इंदौर की आत्मा को झकझोर दिया है। कमलदल के नेताओं की परस्पर शह-मात की लड़ाई ने जीवनभर के लिए इंदौरियों के माथे पर दाग लगा दिया। देश के किसी भी हिस्से में पीने के पानी से मौत कभी देखी, सुनी नहीं। ये इंदौर में हो गया, जो माई नर्मदा के निर्मल नीर की नगरी है, उस शहर में जहरीला जल? इस घटना से सब सबक लें। खासकर सत्तारूढ़ दल। प्रतिपक्ष को साथ ले अब सब मिलकर इंदौर की खोई हुई साख की चिंता करें।

देशभर में हुई अहिल्या नगरी की बदनामी से बाहर निकलने के सामूहिक प्रयास ही सफल होंगे। लाशों के ढेर पर एक-दूजे को नीचा दिखाने की राजनीति नहीं। सवाल इंदौर का है, आपके दल का नहीं। दल बनते हैं, बिगड़ते हैं... सत्ता आती है, जाती है… ये देश नहीं टूटना चाहिए!! याद हैं न ये शब्द भाजपा वालो? ऐसे ही इंदौर, इंदौरी जज्बा, मिजाज नहीं टूटना चाहिए। न भागीरथपुरा वालों का हौसला-हिम्मत।

अ ब उबरना होगा इस भयावह मानवजनित घोर लापरवाही, संकट-आपदा-विपदा से। जहरीले जल से काल-कवलित हुई जिंदगियों के लिए असल श्रद्धांजलि बस ये ही होगी कि इंदौर को एक बार फिर प्रदेश सरकार को नए नजरिये से देखना होगा। बड़ा दिल कर इस शहर के मिजाज व राजनीतिक तासीर को समझना होगा।

सत्तारूढ़ दल के आपस के मतभेदों का खामियाजा इस शहर ने भुगता और अहिल्या नगरी के माथे पर अमिट कलंक लग गया। जिस शहर को माई नर्मदा का आशीर्वाद है, वहां पीने के पानी से 17 निर्दोष नागरिकों का मौत के मुंह में समा जाना ताजिंदगी का दाग दे गया।

वह भी उस इंदौर को, जिसका नाम व काम देश-दुनिया में बोल रहा था। लिहाजा भागीरथपुरा कांड को एक बुरा सपना मानकर अब नेता, निगम, सरकार व प्रशासन को आगे की सुध लेना होगी। हताहतों के जख्म भरने के साथ इंदौर की आत्मा पर लगे दाग मिटाने के अब ‘भगीरथ' प्रयास ही मां अहिल्या के गौरव को पुनर्स्थापित कर पाएंगे।

अब शहर में एक-दूसरे को निपटाने की कुत्सित राजनीति से नेताओं को बाज आना ही चाहिए। खासकर सत्तारूढ़ दल को ये काम करना है। सत्ता के मद व मजबूत विपक्ष की गैरमौजूदगी के चलते भाजपाई पक्ष-विपक्ष की जिस भूमिका में आ गए हैं, उससे अब समय रहते बाहर आ जाएं।

भागीरथपुरा कांड को सबक मान लें। वक्त है अब भी भाजपा नेता संभल जाएं। अन्यथा अगर इस जिंदादिल शहर ने ‘आंखें फेर ली' तो फिर एक नहीं, सभी का चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा। इंदौर इतना नासमझ भी नहीं कि वह आंख देखे मक्खियां निगलता ही जाए।

इंदौर ने भाजपा पर आंखें मींचकर इसलिए भरोसा न किया था कि कमलदल के नेता भी आपस में कांग्रेस जैसी गुटबाजी करने लग जाएं और शहर के विकास के साथ उसकी बरसों की साख-धाक व पुण्याई को ही दांव पर लगा दें। 6 माह के मासूम की पथराई आंखें देख अगर थोड़ी भी नैतिकता व गैरत होगी तो अब आंखें खोलकर सत्तारूढ़ दल के नेता जनसेवा में जुट जाएं।

गुटबाजी का साफ-साफ मुजाहिरा जहरीले जल से आई आपदा में इंदौर में देख लिया कि किस तरह संबंधित विधानसभा को छोड़ सब नेताओं ने इस संकट से किनारा किया, कन्नी काटी। लिहाजा अब कमर कस लें कि भागीरथपुरा अब इस शहर का पहला व आखिरी आपदा का केंद्र होगा।

जनता समझ गई है कि भाजपाई राजनीति ने शहर की दुर्दशा कर दी। उसकी परिणीति भागीरथपुरा के गंदे जल से हुई मौतों के रूप में हुई है। मौत का ये सिलसिला अब भी थमा नहीं है। लिहाजा अब तो संभल जाए सत्तारूढ़ दल और अपने-अपने राजनीतिक हक और हुकूक के बजाय इंदौर के हित के लिए लड़े-भिड़े। सत्ता की लड़ाई का सेंटर कृपा कर हमारे इंदौर को न बनाएं। इसे सेंट्रल इंडिया का सिरमौर इंदौर ही बनाएं, राजनीति का अखाड़ा नहीं।

निगम को नीचा दिखाने का हश्र देख लिया न क्या हुआ? सिर्फ निगम नाम की संस्था ही नहीं, अहिल्या नगरी इंदौर व प्रदेश सरकार तक दांव पर लग गई। देशभर में जो लानत-मलानत व थू-थू के साथ प्रदेश व इंदौर को धिक्कार मिली, वो क्या कम है? राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में 8 दिन बाद भी इंदौर नंबर वन पर है और इस बार ये अव्वल नंबर वाहवाही नहीं, बदनामी के कारण मिल रहा है।

लिहाजा अब इस शहर को देखने व समझने का नजरिया सरकार को भी बदलना होगा। शहर का कोई तो धणीधोरी हो, जो कम से कम जवाबदेही ले सके कि भागीरथपुरा कांड जैसी ये नाकामी किसकी है?

भाजपा ध्यान रखे- इंदौर किसी एक नेता/दल की बपौती नहीं
बीते डेढ़ दशक से सत्तारूढ़ दल की परस्पर शह-मात की राजनीति का केंद्र हमारे इस शहर को क्यों बनाया जा रहा है? क्या सिर्फ इसलिए कि इस शहर के बाशिंदे भाजपा से प्रेम करते हैं तो सब स्वीकार कर लेंगे? लेकिन भाजपा के बड़े नेता ये भूलें नहीं कि इंदौर किसी एक नेता या दल की बपौती नहीं।

इस शहर ने जिले की सभी 9 विधानसभा क्षेत्रों में कमल का परचम लहराया है। ये शहर 1989 से कमलदल का सांसद चुन रहा है। यानी पूरे 36 साल से दिल्ली संसद में इंदौर का भाजपा ही प्रतिनिधित्व करती आ रही है। 25 साल से नगर निगम की हुकूमत भी इस शहर ने भाजपा को सौंप रखी है। देशभर में इंदौर को भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है।

लिहाजा ये बदनामी एक नेता या सिर्फ निगम नाम की सरकारी संस्था की नहीं, पूरी भाजपा व भाजपा नेतृत्व की है। अच्छा भला काम कर रही मोहन सरकार की भी बदनामी हुई। याद रखें, देश के बड़े नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव आदि ने हमला मेयर-मंत्री पर नहीं, नरेंद्र मोदी राज की ट्रिपल इंजिन सरकार पर किया है। भूलें नहीं।

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