पानी रे पानी... तूने शहर को आईना दिखा दिया
KHULASA FIRST
संवाददाता

अजय कुमार बियानी स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पानी रे पानी, तूने सबको पानी-पानी कर दिया
वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए रहता है,
जब तू फिरे उम्मीदों पर, तेरा रंग समझ में ही नहीं आए।
पानी रे पानी, सच कहें तो तेरा रंग कैसा है-
कभी अमृत, कभी जहर और कभी सीधे श्मशान का रास्ता दिखा दे।
भागीरथपुरा में तूने जो खेल रचाया, वह पानी का खेल नहीं था, वह पूरे शहर के विवेक की अग्नि-परीक्षा थी। तू बहा तो सिर्फ पाइपों में नहीं, घरों के भीतर, रिश्तों के बीच और भरोसे की नसों में भी बह गया। तू आया और कोहराम मचा गया। किसी के घर में सन्नाटा छोड़ा, किसी की रसोई में मातम और किसी के आंगन में सवाल कि गलती किसकी थी, पानी की या उसे पिलाने वालों की?
तूने मौत का तांडव भी दिखाया और व्यवस्था का असली चेहरा भी। पानी रे पानी, तू इतना मासूम भी नहीं जितना दिखाया जाता है। तू जानता है किस नल से निकलना है, किस टंकी में ठहरना है और किस शरीर में जाकर बीमारी बन जाना है। तेरे नाम पर शहर में तूफान उठा, राजनीति में उबाल आया और बयानबाजी की नदियां बह निकलीं।
कुछ बोले- जांच होगी, कुछ बोले- कार्रवाई होगी, और तू चुपचाप सबको पानी पिलाकर किनारे बैठ गया। सत्ता के गलियारों में भी तूने गजब का खेल किया। जिनकी जुबान में कल तक आग थी, आज उनका पानी उतर गया।
जिनके हाथों में फाइलें थीं, उनके हाथ कांपने लगे। भविष्य के राजनीतिक आंगन में जितनी हसरतें, जितनी आर्जुएं और जितने सपने सजे थे, उन सब पर तूने फिरकर बता दिया कि पानी जब फिरता है, तो तख्त भी भीग जाते हैं।
आपदा में अवसर ढूंढ़ने की कला में भी तू अव्वल निकला। पहले नाली और नाले के रास्ते जो पानीदार बने, अब पानी पिलाने और पानी निकालने में भी कई अंजुलियां भर-भरकर पानी समेटने को तैयार खड़ी हैं। कहीं टैंकर पानीदार बना रहे हैं, कहीं बोतलें पानीदार हो रही हैं और कहीं जिम्मेदारी ही पानी में घुल गई है।
पानी रे पानी, तू प्रकृति भी है और राजनीति भी। तू जैसा मिले, वैसा ही रंग पकड़ लेता है। साफ मिले तो जीवन, गंदा मिले तो महामारी। तू बीमारी का कारण भी है, अकाल का डर भी और पलायन की मजबूरी भी। तू घर उजाड़ देता है, रिश्तों में दरार डाल देता है और शहरों को नक्शे पर सवाल बना देता है।
सबसे मजेदार बात यह कि हर कोई तुझ पर दोष डाल देता है, पर जिम्मेदारी उठाने में सबके भीतर का पानी सूख जाता है। कोई कहता है- मेरी नहीं सुनी गई। कोई कहता है- मैंने तो पहले ही बताया था। और तू चुपचाप बहते हुए कहता है- जिसमें जितनी क्षमता थी, उतना ही पानी था।
पानी रे पानी, तू सिर्फ तरल नहीं, तू आईना है। तू दिखा देता है कि शहर कितना जागरूक है, व्यवस्था कितनी ईमानदार है और समाज कितना संवेदनशील। भागीरथपुरा में तूने यह आईना सबके सामने रख दिया। अब देखना यह है कि इस आईने में देखकर कोई अपना चेहरा सुधारेगा या फिर कहेगा- पानी का क्या भरोसा, आज साफ है, कल गंदा हो जाएगा। क्योंकि सच तो यही है, पानी कभी झूठ नहीं बोलता, बस हम ही हैं, जिनके भीतर सच स्वीकार करने का पानी नहीं होता।
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