वास्तु और आप: सुखी जीवन का आधार, दिशा और दृष्टिकोण का संगम
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
यदि हम "वास्तु" (प्रकृति के तत्वों का संतुलन) और "आप" (स्वयं का आचरण और विचार) को मिला दें, तो एक संपूर्ण सुखी जीवन का आधार तैयार होता है। वास्तु केवल ईंट-पत्थर की दिशा नहीं है, बल्कि आपके और आपके वातावरण के बीच का एक गहरा संबंध है।
कुछ मौलिक और व्यावहारिक नियम का पालन कर आप अपने जीवन में सुख और समृद्धि ला सकते हैं।
ऊर्जा का प्रवेश: मुख्य द्वार और आपकी मुस्कान
वास्तु नियम: घर का मुख्य द्वार हमेशा साफ, अच्छी रोशनी वाला और बाधा मुक्त होना चाहिए। प्रवेश द्वार पर एक सुंदर 'नेमप्लेट' और स्वास्तिक का चिन्ह सकारात्मकता को आमंत्रित करता है।
आपकी भूमिका: जैसे घर का द्वार साफ रखते हैं, वैसे ही अपने मुख (वाणी) को मधुर रखें। घर में प्रवेश करते समय अपनी चिंताओं को बाहर छोड़ें और एक मुस्कान के साथ प्रवेश करें। आपकी सकारात्मक ऊर्जा घर की दीवारों में बसती है।
ब्रह्मस्थान: घर का केंद्र और आपका मन
वास्तु नियम: घर के बीच का हिस्सा (ब्रह्मस्थान) खाली और खुला होना चाहिए। यहाँ कोई भारी फर्नीचर या गंदगी नहीं होनी चाहिए।
आपकी भूमिका: आपका 'मन' आपके शरीर का ब्रह्मस्थान है। प्रतिदिन 5-10 मिनट मौन बैठें। जब मन शांत और खाली (विचारमुक्त) होता है, तभी उसमें नए और शुभ विचार जन्म लेते हैं।
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) : जल और विचार की शुद्धता
वास्तु नियम: यह दिशा ईश्वर और जल की है। यहाँ पूजा घर या केवल साफ स्थान रखें। यहाँ भारी सामान रखने से मानसिक तनाव बढ़ता है।
आपकी भूमिका: जैसे ईशान कोण में शुद्ध जल रखा जाता है, वैसे ही अपने विचारों को पारदर्शी और शुद्ध रखें। दूसरों के प्रति द्वेष रखने से आपके मस्तिष्क का 'ईशान कोण' दूषित होता है, जिससे मानसिक शांति भंग होती है।
आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) : रसोई और आपकी कार्यक्षमता
वास्तु नियम: यह अग्नि की दिशा है। यहाँ रसोई का होना शुभ है। अग्नि ऊर्जा और स्वास्थ्य का प्रतीक है।
आपकी भूमिका: आपके भीतर की 'जठराग्नि' और 'सीखने की ललक' को कभी कम न होने दें। आलस्य वास्तु दोष से भी बड़ा शत्रु है। सक्रिय रहें और अपने कर्म की अग्नि को प्रज्वलित रखें।
नेऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम):
वास्तु नियम: यह पृथ्वी तत्व की दिशा है। यहाँ भारी सामान या मास्टर बेडरूम होना चाहिए, जो परिवार के मुखिया को स्थिरता प्रदान करता है।
आपकी भूमिका: अपने रिश्तों में स्थिरता और धीरज लाएं। पृथ्वी की तरह क्षमाशील बनें। अपनों के प्रति समर्पण ही आपको जीवन में मानसिक 'ग्राउंडिंग' (आधार) देता है।
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