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मप्र भाजपा में बड़े ‘संगठनात्मक’ बदलाव की ‘आहट’

KHULASA FIRST

संवाददाता

27 जनवरी 2026, 6:53 pm
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मप्र भाजपा में बड़े ‘संगठनात्मक’ बदलाव की ‘आहट’

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर नितिन नवीन की ताजपोशी के साथ ही पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बड़े फेरबदल की चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन के साथ मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में संगठन महामंत्री स्तर पर अहम बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

मप्र भाजपा में मौजूदा संगठन महामंत्री का कार्यकाल पूरा हो चुका है, ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या नितिन नवीन मप्र में किसी नए चेहरे को संगठन की कमान सौंपेंगे या फिर 2028 के विधानसभा चुनाव तक मौजूदा व्यवस्था को ही बरकरार रखा जाएगा?

केंद्रीय नेतृत्व संगठन को नई ऊर्जा और रणनीतिक धार देने के मूड में है। ऐसे में मप्र में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि चुनावी गणित और संगठनात्मक संतुलन को देखते हुए यथास्थिति बनाए रखने का विकल्प भी खुला हुआ है। फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व के अगले कदम पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं।

राजमाता को भूल गई भाजपा?
वर्ष 1967... मप्र की राजनीति में भूचाल लाने वाला साल। उस दौर के सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री द्वारकाप्रसाद मिश्र को सत्ता से बाहर कर जनसंघ को मजबूत आधार देने वाली शख्सियत थीं- राजमाता विजया राजे सिंधिया। भाजपा की वैचारिक और सांगठनिक नींव रखने वाली राजमाता की 25 जनवरी को पुण्यतिथि थी, लेकिन इस बार भाजपा के सियासी गलियारों में एक अजीब सन्नाटा दिखा।

अब तक परंपरा रही है कि भाजपा 25 जनवरी को राजमाता को पूरे सम्मान और जोर-शोर से याद करती रही है। इस दिन को पार्टी ‘नारी शक्ति दिवस’ के रूप में भी मनाती आई है, लेकिन इस बार तस्वीर बदली हुई थी। न भाजपा मुख्यालय में श्रद्धांजलि सभा, न ही कोई औपचारिक या विशेष आयोजन।

नारदजी को भाजपा के एक पुराने पदाधिकारी दबी जुबान से कहते हैं कि नई भाजपा का फोकस अब भविष्य (युवाओं) पर है। इतिहास में झांकने की फुरसत नहीं रही। शायद यही वजह है कि पार्टी के कई पुराने नेता और विचारधारा के स्तंभ अब धीरे-धीरे हाशिए पर खिसकते नजर आ रहे हैं या फिर स्मृतियों के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं। हैरानी की बात यह कि जिस राजमाता ने एक समय भाजपा की सियासी राह आसान की, आज वही भाजपा उन्हें बिसराती जा रही है।

घर वालों से परेशान मंत्रीजी..!
श्रीमंत के करीबी प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री इन दिनों सियासी नहीं, बल्कि पारिवारिक मोर्चे पर उलझे हुए हैं। मंत्रीजी की परेशानी की वजह कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उनके अपने घरवाले, खासतौर पर पत्नी और बेटा बताए जा रहे हैं।

कहानी कुछ यूं है कि मंत्रीजी के सरकारी बंगले से ही एक ‘बेनाम’ कंसल्टेंसी चुपचाप संचालित हो रही है। दावा है कि यह कंसल्टेंसी मंत्रीजी के विभाग से लेकर सरकार से जुड़े हर छोटे-बड़े काम को ‘करवाने’ का भरोसा देती है। शर्त है जैसा काम, वैसा दाम।

बताते हैं जब मंत्रीजी को इस ‘कंसल्टेंसी’ की भनक लगी, तो उन्होंने तत्काल इस पर ब्रेक लगाने की कोशिश की, लेकिन पत्नी-बेटे की जिद के सामने बेबस नजर आए। अब हालात यह हैं कि मंत्रीजी भीतर ही भीतर उधेड़बुन में हैं। डर इस बात का सता रहा है कि यदि यह मामला ‘ऊपर’ तक पहुंच गया, तो बदनामी तय है और राजनीतिक भविष्य पर भी खतरा। नारदजी कहते हैं कि जब संकट घर के भीतर से खड़ा हो जाए, तो बड़े-बड़े मंत्री भी लाचार हो जाते हैं।

कमल नाथ का राज्यसभा जाना लगभग तय!
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के यह कहते ही कि अब उनका राज्यसभा जाने का कोई इरादा नहीं है, मप्र कांग्रेस की सियासत में अचानक हलचल तेज हो गई है। खाली होती दिख रही संभावित राज्यसभा सीट ने पार्टी के भीतर दावेदारी की दौड़ शुरू करा दी है।

कोई खुलकर मैदान में है, तो कोई परदे के पीछे अपनी जमीन मजबूत करने में जुटा हुआ है। इस दौड़ में कमल नाथ, अरुण यादव, जीतू पटवारी, मीनाक्षी नटराजन और कमलेश पटेल जैसे नाम चर्चा में हैं, लेकिन इन तमाम दावेदारों के बीच कमल नाथ का नाम सबसे ज्यादा भारी और प्रभावी माना जा रहा है।

दरअसल, मौजूदा राजनीतिक हालात में कांग्रेस को जितनी जरूरत कमल नाथ के अनुभव, नेटवर्क और सियासी पकड़ की है, उतनी ही जरूरत कमल नाथ को भी मप्र में अपना राजनीतिक दबदबा बनाए रखने के लिए राज्यसभा के मंच की है।

यही वजह है कि पार्टी के भीतर-बाहर यह धारणा बनती जा रही है कि राज्यसभा की यह बाजी अंततः कमल नाथ के खाते में ही जाएगी। अब निगाहें कांग्रेस हाईकमान के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। अगर ऐन मौके पर कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर या आसमानी-सुल्तानी नहीं हुई, तो कमल नाथ का राज्यसभा पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है..!

सबका ‘सेवादार’ विधर्मी परिवहन अधिकारी..!
प्रदेश के राजनीतिक-प्रशासनिक गलियारों में परिवहन विभाग के एक रिटायर्ड ‘विधर्मी’ अधिकारी की चर्चा जोरों पर है। वजह उसकी अद्‌भुत ‘सेवादारी’ है। यह अपने कार्यकाल में परिवहन विभाग की विजिलेंस शाखा में अहम पद पर रहा और उसका मूलमंत्र था नेताओं और बड़े अधिकारियों की हर हाल में, हर तरह से ‘सेवा’ करना।

इसी ‘सेवादारी’ के दम पर वह सबका चहेता और रसूखदार बना। भोपाल के गांधी नगर रोड स्थित उसकी आलीशान कोठी देख अच्छे-अच्छों की आंखें चौंधिया जाती हैं। इंदौर, बुरहानपुर और रीवा में भी उसकी करोड़ों की बेनामी संपत्ति की चर्चा है। नारदजी बताते हैं यह सब ‘सेवादारी’ से हासिल किया गया ‘मेवा’ है।

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