ठगी के खेल में ठग की कहानी: एक मोबाइल नंबर से शुरू होती है; ठगों की पूरी चेन
KHULASA FIRST
संवाददाता

मोबाइल डेटा से लेकर उधार खातों तक फैला करोड़ों की ठगी का जाल
ऐसे होती है शुरुआत
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शेयर बाजार में मोटे मुनाफे का झांसा देकर लोगों की गाढ़ी कमाई हड़पने के मामले रोज सामने आ रहे हैं। शातिर ठग रकम दोगुना करने या चार गुना रिटर्न का झांसा देकर लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं और उनसे लाखों-करोड़ों रुपए अपने बैंक खातों में डलवा लेते हैं।
सवाल यह है कि ठगी का यह खेल आखिर शुरू कहां से होता है? एक अनजान कॉल या मैसेज आम आदमी की जिंदगीभर की कमाई तक कैसे पहुंच जाता है? इस पूरे खेल के पीछे कौन-सी कड़ियां जुड़ी होती हैं और ठग इतने सुरक्षित कैसे बच निकलते हैं?
खुलासा फर्स्ट इस रिपोर्ट में ठगी की इस पूरी चेन का क्रमवार खुलासा कर रहा है। कहानी एक मोबाइल नंबर से शुरू होती है और डेटा, फर्जी सिम, डिमैट खातों व उधार के बैंक खातों से होती हुई रकम ठगों तक पहुंच जाती है।
डेटा चोरी : ठगी की पहली और सबसे खतरनाक कड़ी
अक्सर सुनने में आता है कि ठगों के पास लोगों का पूरा डेटा होता है। मोबाइल नंबर से लेकर जन्मतिथि, माता-पिता के नाम तक। आम आदमी के मन में सवाल उठता है कि आखिर यह डेटा आता कहां से है? क्या कोई सीधे मोबाइल, लैपटॉप या बैंक सर्वर हैक कर रहा है? हकीकत इससे कहीं ज्यादा संगठित और खतरनाक है।
कॉलिंग और साइबर ठगी से जुड़ा यह डेटा खुले तौर पर डेटा बाजारों में बिकता है। सूत्रों के मुताबिक कॉलिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला ऐसा डेटा 5 से 10 हजार रुपए में आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इसमें केवल मोबाइल नंबर ही नहीं, बल्कि बैंक से जुड़े कई संवेदनशील विवरण शामिल होते हैं।
बताया जाता है कि यह डेटा कई बार बैंकिंग नेटवर्क से जुड़े थर्ड पार्टी एजेंटों, जैसे डीएसए (डायरेक्ट सेलिंग एजेंट) और डीएसटी के जरिये लीक होता है। इन एजेंटों को बैंक अपने ग्राहकों की जानकारी काम के लिए उपलब्ध कराते हैं।
इसी दौरान कुछ जगहों पर लापरवाही या मिलीभगत के चलते यह डेटा गलत हाथों तक पहुंच जाता है। इस लीक हुए डेटा में ग्राहक का मोबाइल नंबर, जन्मतिथि, माता-पिता के नाम, स्थायी पता, आधार और पैन से जुड़ी जानकारी तक शामिल रहती है।
ठग इसी जानकारी के दम पर कॉल करते हैं और सामने वाले को यह भरोसा दिला देते हैं कि वे बैंक से ही बात कर रहे हैं। यही वह मोड़ होता है, जहां ठगी की कहानी शुरू होती है। कॉल करने वाला पहले आपकी पूरी जानकारी बताकर विश्वास जीतता है, फिर किसी तकनीकी समस्या, केवाईसी अपडेट या खाते की सुरक्षा का बहाना बनाकर ओटीपी मांग लेता है। जैसे ही ओटीपी साझा किया जाता है, कुछ ही मिनटों में खाते से रकम गायब हो जाती है।
ऐसे मिलती है फर्जी मोबाइल सिम
ठगी की चेन में मोबाइल सिम सबसे अहम कड़ी होती है। साइबर ठग फर्जी पहचान-पत्रों, पुराने आधार कार्ड की कॉपी या मजदूर-गरीब तबके के लोगों को लालच देकर उनके नाम पर सिम निकलवाते हैं। कई बार सिम एजेंटों की मिलीभगत से भी बिना सही केवाईसी के एक्टिव कर ली जाती है।
इन सिम का इस्तेमाल कुछ ही दिनों या हफ्तों के लिए किया जाता है। जैसे ही ठगी की रकम हाथ लगती है, उक्त सिम बंद कर ठग नया नंबर सक्रिय कर लेते हैं। इसी वजह से पुलिस को ट्रैकिंग में दिक्कत आती है।
डिमैट खाते से अपने खाते में ऐसे डलवाते हैं रुपए
शेयर बाजार में निवेश का झांसा देकर ठग पहले पीड़ित से उसका डिमैट खाता खुलवाते हैं या पहले से खुले खाते की जानकारी हासिल कर लेते हैं। इसके बाद फर्जी ट्रेडिंग एप या वेबसाइट के जरिये पीड़ित को मुनाफा दिखाया जाता है। जैसे-जैसे पीड़ित भरोसे में आता है, उससे बड़ी रकम डिमैट खाते में डलवाई जाती है।
फिर ठग उस रकम को शेयर खरीद-फरोख्त के नाम पर अपने बताए गए खातों में ट्रांसफर करवा लेते हैं या फर्जी ट्रेड दिखाकर पैसे निकाल लेते हैं। अंत में जब पीड़ित रकम निकालना चाहता है, तो एप बंद, वेबसाइट गायब और संपर्क टूट चुका होता है।
(4) किराए के खाते: ठगी का सबसे सुरक्षित हथियार
ठग सीधे अपने नाम के बैंक खाते का इस्तेमाल नहीं करते। इसके लिए वे किराए के खाते लेते हैं। ये खाते बेरोजगार युवकों, गरीब मजदूरों या पैसों के लालच में फंसे लोगों के नाम पर खोले जाते हैं। बदले में उन्हें हर ट्रांजेक्शन पर कमीशन दिया जाता है।
ठगी की रकम इन खातों में आने के कुछ ही मिनटों बाद दूसरे खातों में डाल दी जाती है या एटीएम से निकाल ली जाती है। जांच के दौरान जब पुलिस संबंधित खाते तक पहुंचती है, तो असली ठग तक पहुंचने से पहले ऐसी कई परतें सामने आ जाती हैं।
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