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गरीबों की ‘बलि’ ले रही मेट्रो की रफ्तार: पट्टों को ‘रद्दी’ बना रही प्रशासनिक हठधर्मिता; लाखों के आशियानों के बदले ‘फ्लैट’ का झुनझुना थमा रहा निगम

KHULASA FIRST

संवाददाता

21 जनवरी 2026, 8:00 पूर्वाह्न
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गरीबों की ‘बलि’ ले रही मेट्रो की रफ्तार

पीलियाखाल में तानाशाही फरमान- घर खाली करो या जेल जाओ!

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
विकास का जो पहिया मेट्रो के रूप में घूमने को तैयार है, वह पीलियाखाल के 16 परिवारों की खुशियों को कुचलने पर आमादा है। बड़ा गणपति क्षेत्र के पीलियाखाल में मेट्रो की पटरी बिछाने के नाम पर प्रशासन ने संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दी हैं। विकास का मुखौटा ओढ़े तंत्र का क्रूर चेहरा अब जेल की धमकी के रूप में सामने आया है।

मल्हारगंज अपर तहसीलदार कार्यालय से जारी नोटिस ने रहवासियों की नींद उड़ा दी है। प्रशासन ने 23 जनवरी की समय-सीमा तय कर साफ कर दिया है मेट्रो की रफ़्तार के आगे उन गरीबों की चीखें बेमानी हैं, जो दशकों से राजीव गांधी के समय मिले पट्टों को अपनी सुरक्षा का कवच मानते आए थे।

आज उसी सरकारी तंत्र के कारिंदे इन वैध पट्टों, वर्षों पुराने बिजली कनेक्शनों और राशन कार्डों को अतिक्रमण बताकर लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं।

इस प्रशासनिक दमन चक्र में पिस रहे रहवासियों में कैलाश खींची, कमल यादव, निशा यादव, भरत वर्मा, अशोक यादव, कैलाश पाल, रमेश यादव, राजू बाहुनिया, राजू यादव, नन्द किशोर आर्य, रामसेवक सप्रे, बीजू सप्रे, प्रशांत कबाड़िया, कैलाश कसेरा, उमा गोयल और जगदीश सारे जैसे नाम शामिल हैं, जो आज अपने ही शहर में शरणार्थी बनने की कगार पर हैं।

मेट्रो ट्रेन कॉर्पोरेशन और नगर निगम की जुगलबंदी ने मुआवजे का जो भद्दा गणित बैठाया है, वह इन परिवारों के साथ किसी क्रूर मजाक से कम नहीं है। शहर लगभग मध्य में स्थित बेशकीमती दुकानों और पक्के मकानों को अतिक्रमण बताकर उन्हें शहर के सुदूर कोने में स्थित ताप्ती परिसर के सस्ते फ्लैटों में फेंकने की साजिश रची गई है।

कौन सुनेगा सिसकी
विडंबना देखिए चुनाव के समय वोट मांगने आने वाले जनप्रतिनिधियों और पार्षद मनोज मिश्रा के झूठे आश्वासन मलबे में तब्दील होते नजर आ रहे हैं। दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा और मजदूरी कर पाई-पाई जोड़कर आशियाना बनाने वाली महिलाओं की सिसकियां सुलगते आक्रोश में बदल रही हैं।

रहवासी निशा यादव द्वारा दी गई सामूहिक आत्महत्या की चेतावनी ने प्रशासन की अंधी संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल है क्या विकास की चमक केवल रईसों के लिए है? क्या अपने हक का वाजिब मुआवजा मांगना इतना बड़ा गुनाह है कि सीधे जेल की धमकी दी जाए?

इंदौर का यह बुलडोजर कल्चर सामाजिक न्याय को छलनी कर रहा है। यदि इन 16 परिवारों की छत छिनी और उन्हें न्याय नहीं मिला, तो यह मेट्रो प्रोजेक्ट विकास का गौरव नहीं, बल्कि गरीबों के आंसुओं पर खड़ा विनाश का प्रतीक कहलाएगा।

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