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हजारों तोतों का घर बचाने की लड़ाई: मेट्रो स्टेशन के लिए पेड़ काटने पर लगी रोक

KHULASA FIRST

संवाददाता

30 जनवरी 2026, 1:04 अपराह्न
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हजारों तोतों का घर बचाने की लड़ाई

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर में मेट्रो प्रोजेक्ट के तहत रीगल चौराहा स्थित रानी सराय में प्रस्तावित स्टेशन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस स्टेशन के निर्माण के लिए 200 से अधिक पेड़ों की कटाई की तैयारी की जा रही थी, जिन पर हजारों तोते वर्षों से बसे हुए हैं।

हाईकोर्ट में हुई सुनवाई
इस मुद्दे को लेकर पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार आंदोलन किया जा रहा है। मामले में शुक्रवार, 30 जनवरी को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई।

अगली तारीख 16 फरवरी तय की
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने याचिकाकर्ता प्रियांशु जैन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अगली तारीख 16 फरवरी तय की है।

नगर निगम से विधिवत अनुमति नहीं ली
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभय सारस्वत और अधिवक्ता लवीश सारस्वत ने तर्क रखते हुए बताया कि पेड़ों की कटाई के लिए नगर निगम से विधिवत अनुमति नहीं ली गई है।

कटाई और ट्रांसप्लांटेशन पर रोक लगा दी है
साथ ही इन पेड़ों के कटने से हजारों तोतों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाएगा, जो पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर खतरा है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए अगली सुनवाई तक पेड़ों की कटाई और ट्रांसप्लांटेशन पर रोक लगा दी है और सभी संबंधित पक्षकारों से जवाब तलब किया है।

इन विभागों को बनाया गया पक्षकार
याचिका में मध्यप्रदेश सरकार, मेट्रो प्रबंधन, नगर निगम, पर्यावरण विभाग, कलेक्टर और एसपी को पक्षकार बनाया गया है। उल्लेखनीय है कि रानी सराय एक पुरातन और ऐतिहासिक भवन है, जहां वर्तमान में तीन डीसीपी कार्यालय भी संचालित हो रहे हैं।

जनहित पार्टी का आरोप
इस मुद्दे पर जनहित पार्टी लंबे समय से आंदोलन कर रही है। पार्टी अध्यक्ष अभय जैन ने कहा, एक तरफ सरकार ‘एक पेड़ मां के नाम’ का अभियान चला रही है, वहीं दूसरी तरफ विकास के नाम पर कुल्हाड़ी चलाई जा रही है।

2600 पेड़ों के ट्रांसप्लांट पर भी सवाल
मेट्रो प्रबंधन का दावा है कि पिछले दो वर्षों में इंदौर में 2600 पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन किया गया है, जिसके लिए नगर निगम को 3 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया।

हालांकि पर्यावरणविदों का आरोप है कि इनमें से 50 प्रतिशत से अधिक पेड़ सूख चुके हैं, जिससे ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।

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