पुलिसिया रौब की भेंट चढ़ा जनता की सुरक्षा के लिए बना डिवाइडर
KHULASA FIRST
संवाददाता

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
स्वच्छता के आसमान पर चमकता इंदौर क्या प्रशासनिक गुलामी के अंधेरे में खो गया है? यह सवाल आज शहर के प्रबुद्ध नागरिकों की जुबान पर है। मामला किसी वीआईपी मूवमेंट का नहीं, बल्कि पुलिस उपायुक्त जोन 4 और यातायात पुलिस नियंत्रण कक्ष के ठीक सामने सरकारी अहंकार की पूर्ति के लिए सार्वजनिक संपत्ति की बलि चढ़ाने का है।
जिस डिवाइडर को कुछ साल पहले लाखों की लागत और ट्रैफिक विशेषज्ञों की राय के बाद जनता की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, उसे आज पुलिसिया रौब की भेंट चढ़ा दिया गया। आश्चर्य की बात यह है कि कुछ ही कदम की दूरी पर सराफा विद्या निकेतन के सामने से वाहनों के आने-जाने का सुगम मार्ग पहले से मौजूद है, लेकिन शायद डीसीपी आनंद कलंदगी और उनके विभाग के अति-महत्वाकांक्षी स्वाभिमान को चंद कदम की अतिरिक्त दूरी तय करना अपनी शान के खिलाफ लगा। क्या एक वर्दीधारी की सुविधा शहर के व्यवस्थित यातायात ढांचे से बढ़कर हो गई है?
नगर निगम: स्वाभिमान खो चुका एक कठपुतली विभाग
इस पूरे घटनाक्रम में नगर निगम की भूमिका किसी लाचार और रीढ़विहीन संस्था जैसी नजर आई। वहीं नगर निगम, जो शहर के छोटे व्यापारियों और दुकानदारों के सामने नियमों की पोथी खोलकर बैठ जाता है, पुलिस के एक इशारे पर घुटनों के बल खड़ा दिखा।
जिन डिवाइडरों के कारण सैकड़ों व्यापारियों का धंधा चौपट हो गया, जहां ग्राहकों की पहुंच खत्म होने से दुकानें बंद होने के कगार पर आ गईं, वहां निगम ने नियम और तकनीकी अड़चनों का हवाला देकर कभी राहत नहीं दी, लेकिन जैसे ही पुलिस विभाग का दबाव पड़ा निगम ने बिना किसी शर्मिंदगी के अपनी जेसीबी, ट्रैक्टर और मजदूरों की फौज भेजकर आनन-फानन में डिवाइडर को मलबे में तब्दील कर दिया।
जनता पूछती है सवाल, क्या नियम सिर्फ आम लोगों के लिए हैं?
इंदौर की सड़कों पर यह मंजर निगम की दोहरी कार्यप्रणाली का प्रमाण है। क्या निगम के पास इस तोड़फोड़ के लिए कोई ठोस तकनीकी ऑडिट रिपोर्ट थी? या फिर यह पुलिसिया धौंस के आगे निगम के नेता-अफसरों का आत्मसमर्पण है? जब आम नागरिक सुविधा के लिए एक पत्थर भी हटाने की गुहार लगाता है तो उसे कार्रवाई का डर दिखाया जाता है, लेकिन जब रसूखदार अपनी विलासिता के लिए सार्वजनिक संपत्ति को ध्वस्त करवाते हैं तो नगर निगम उनके दरबारी की तरह काम करने लगता है।
यह केवल एक डिवाइडर का टूटना नहीं है, बल्कि यह इंदौर की उस व्यवस्था का टूटना है जो खुद को निष्पक्ष और जन-हितैषी होने का दावा करती है। पुलिस का यह शॉर्टकट और निगम की यह जी-हुजूरी शहर की जनता के बीच चर्चा और आक्रोश का केंद्र बन गई है।
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