बसंत पंचमी से पहले फिर गरमाया भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, धार।
बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा हिंदू धर्म के प्रमुख और पावन पर्वों में से एक माने जाते हैं। यह पर्व ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है और हर वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
लेकिन इस वर्ष बसंत पंचमी से पहले मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर विवाद एक बार फिर गहरा गया है।
भोजशाला को लेकर दो पक्ष, दो दावे
धार की लगभग 1100 साल पुरानी भोजशाला को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का वाग्देवी मंदिर मानता है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौलाना मस्जिद बताता है। बसंत पंचमी से पहले यह विवाद और भी संवेदनशील हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
इस बार 23 जनवरी (शुक्रवार) को बसंत पंचमी और जुमे की नमाज एक ही दिन पड़ने के कारण मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। हिंदू पक्ष ने कोर्ट से बसंत पंचमी के दिन पूजा की अनुमति और उस दिन मुस्लिम पक्ष के प्रवेश पर रोक की मांग की है। इस मामले में 22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सहमति दी गई है।
ASI की वर्तमान व्यवस्था
वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा तय व्यवस्था के अनुसार, हिंदू पक्ष को मंगलवार और बसंत पंचमी के दिन पूजा की अनुमति है। मुस्लिम पक्ष शुक्रवार को नमाज अदा करता है। इसी साझा व्यवस्था के कारण भोजशाला पर दोनों पक्षों का आंशिक अधिकार माना जाता है।
भोजशाला का ऐतिहासिक महत्व
भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि परमार वंश के प्रतापी राजा भोज (1000–1055 ई.) ने इसे ज्ञान और शिक्षा के महान केंद्र के रूप में स्थापित किया था।यहाँ शास्त्र, भाषा, साहित्य, संस्कृति, संगीत जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता था।
राजा भोज के काल में यहां देवी सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिन्हें वाग्देवी कहा जाता था। बाद के काल में इसे मस्जिद का रूप दिए जाने की बात कही जाती है। आज भी भोजशाला परिसर में मंदिरनुमा अवशेष मौजूद हैं।
पौराणिक ग्रंथों में मां सरस्वती का स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों में मां सरस्वती को वाग्देवी, ब्रह्मस्वरूपा और विद्या की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में उन्हें चार भुजाओं वाली, आभूषणों से सुसज्जित देवी बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, मां सरस्वती जटाजूट धारण किए, मस्तक पर अर्धचंद्र और कमल के आसन पर विराजमान होती हैं यह स्वरूप ज्ञान, सृजन और कला का प्रतीक माना जाता है।
बसंत पंचमी का धार्मिक महत्व
मान्यता है कि माघ शुक्ल पंचमी के दिन ही मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसी कारण यह दिन बसंत पंचमी कहलाता है। इस दिन विद्यार्थी, विद्वान, कलाकार संगीत और साहित्य से जुड़े लोग मां सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना कर ज्ञान, बुद्धि और सफलता की कामना करते हैं।
बढ़ी प्रशासन की सतर्कता
बसंत पंचमी और जुमे की नमाज एक साथ पड़ने के कारण प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क मोड में है। सभी की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं।
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