उत्तम तो सर्वोत्तम थे न: सत्ता के गलियारे के एक और अभिन्न संत निशाने पर
KHULASA FIRST
संवाददाता
‘अपने स्वामी' पर हुए ‘दुष्कर्म हमले' से सकते में ‘भाजपाई कुनबा', ‘भगवा ब्रिगेड'
उत्तम स्वामी पर एक युवती की दुष्कर्म की शिकायत से सकते में स्वामी समर्थक, भाजपा व संघ परिवार
कथित पीड़ित युवती ने राजस्थान से सीधे दिल्ली पुलिस कमिश्नर दफ्तर भेजी शिकायत, जान का खतरा भी बताया
पुलिस पर कानूनी दबाव, निर्भया केस के बाद बनी गाइडलाइन के बाद शिकायत की जांच के लिए बाध्य पुलिस
‘मामा राज' में बेहद ‘फले-फूले' थे महाराज, ‘पहलवान राज' के आने के बाद से ही ‘सहमे-सहमे' से थे ‘स्वामी'
मुख्यमंत्री से मंत्री-संतरी, अफसर, नेता व बिल्डर से फैशन डिजाइनर तक की थी जबरदस्त ‘स्वामी भक्ति'
स्वामी ने आरोपों को गैर सनातनियों का द्वेष व सनातन धर्म के खिलाफ बताया षड्यंत्र, सत्य की जीत का जताया भरोसा
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
उत्तम स्वामी तो सर्वोत्तम थे न? सत्ता के लिए, सरकार के लिए, अफसरों के लिए, मंत्रालयों के लिए। वे उन सभी नरों में उत्तम थे, जो इन दिनों भक्तों के बीच कथा बांचते हैं, प्रवचन देते हैं, ध्यान-साधना करवाते हैं। उत्तम थे, तभी तो मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री-संतरी तक की उनके दरबार में हाजिरी लगती रहती थी।
नेता-अफसर ही नहीं, बिल्डर से लेकर फैशन डिजाइनर तक उनके आश्रम में लोटपोट नजर आते थे। स्वामी सत्ता-सरकार-संगठन में पद-प्रतिष्ठा ही नहीं दिलवाते थे, बल्कि किसी को भी फर्श से अर्श तक पहुंचाने का माद्दा भी रखते थे। सरकार ही नहीं, सरकार की ‘मातृसंस्था' तक उनकी गहरी पैठ थी।
तभी तो सब उनकी भृकुटियों के तनने-बिगड़ने से डरते थे। मुख्यमंत्री तक के व्यक्ति उनसे सार्वजनिक डांट-फटकार तक खाते थे, उनके गुस्से का शिकार होते थे। न सिर्फ शिकार होते, बल्कि माफी भी मांगने को मजबूर होते थे।
अब ऐसे ही ‘सर्वोत्तम स्वामी' एक ‘भक्तन' पर ‘कुदृष्टि' के आरोपों से एकाएक घिर गए। ‘भक्तन' ने तो मामला दुष्कर्म व यौन प्रताड़ना से जोड़ दिया है। शिकायत भी राज्य की राजधानी में न कर सीधे देश की राजधानी दिल्ली में की और वह भी डायरेक्ट दिल्ली पुलिस कमिश्नर से।
सत्ता व सरकार के बेहद नजदीक उत्तम स्वामी के खिलाफ दुष्कर्म व यौन प्रताड़ना की शिकायत सामने आई है। शिकायत करने वाली युवती ने स्वामी से अपनी जान का खतरा भी बताया है। अब इस शिकायत से भूचाल आया हुआ है। सत्ता के शिखर से लेकर नीचे तक, सरकार के शीर्ष पर, भाजपाई कुनबे में और भगवा ब्रिगेड में ये कंपन बीते 36 घंटे से साफ महसूस हो रहा है।
सबके सब सकते में हैं। हों भी क्यों नहीं, जिसे सर्वोत्तम मान उत्तम सेवा-चाकरी की जा रही थी, वे भी ‘त्रिया चरित्र' से पार न पा सके। अब उंगली सिर्फ ‘स्वामी' पर नहीं उठना है। वह तो उन सब पर उठेगी, जिनका स्वामी के साथ नित्य ‘उठना-बैठना' था। मामला देश की राजधानी कमिश्नर की दहलीज पर है।
अब सबकी नजर इस बात पर ही है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी इस शिकायत को अपने दफ्तर की दहलीज के अंदर लेकर जांच के दायरे में लेती है या इसे रफा-दफा कर देगी? अव्वल तो वह रफा-दफा करने की स्थिति में नहीं है। ऐसा कानून के जानकार कहते हैं कि निर्भया केस के बाद बने नए नियम-कायदों के तहत ऐसी शिकायत पंजीबद्ध करना ही होती है।
जांच के बाद भले ही ‘प्रथम दृष्टया मामला बनता नहीं' की टीप दर्ज होकर केस खत्म हो जाए। शिकायत दर्ज नहीं करने की सूरत में पीड़ित पक्ष के पास ‘प्राइवेट कम्प्लेंट' का अहम विकल्प तो खुला ही है।
अब जो भी हो, फिलहाल तो सत्ता के गलियारों में जबरदस्त असर रखने वाले ‘सरकारी संत' व उनसे जुड़े रसूखदार सदमे में हैं। विरोधी इस मसले के जरिये संत महोदय का अंत देख रहे हैं, तो संत समर्थक ही नहीं, स्वयं स्वामीजी इस ‘त्रिया चरित्र' को गैर सनातनियों का सनातन के प्रति द्वेष व सनातन धर्म के प्रति षड्यंत्र करार दे रहे हैं। स्वामीजी को सत्य की ताकत पर भरोसा है और उनका मानना है कि इस मामले में भी सत्य की जीत होगी।
उत्तम स्वामी का एकाएक यूं आना और जबरदस्त रूप से छा जाना भी किसी किंवदंती से कम नहीं। वे कब आए, कहां से आए और कैसे सत्तारूढ़ दल व भगवा वाहिनी के खासमखास हो गए, जबरदस्त जिज्ञासा का विषय बना हुआ है।
सरल व सौम्य व्यवहार के स्वामीजी अपनी सधी हुई रहस्यमय मुस्कान के लिए भी जाने जाते हैं। शुरुआत में तो किसी ने भी उन्हें गंभीरता से नही लिया, लेकिन फिर वे देखते ही देखते सत्ता के गलियारों में चर्चा में आ गए।
सत्ता में उनके दखल का दौर मध्य प्रदेश में उस वक्त से शुरू हुआ, जब राज्य में एकछत्र ‘मामा राज' कायम था। बताते हैं ‘मामा' के वरदहस्त ने उन्हें बहुत जल्दी ‘सरकारी संत' मनोनीत कर दिया। फिर क्या था, वे जल्द ही ‘मातृसंस्था' में भी प्रवेश कर गए। ‘प्रांत व क्षेत्र' भी उनके मुरीद हो गए।
परिणाम ये रहा कि मातृसंस्था के मुखिया तक के साथ स्वामी का मंच शेयर शुरू हो गया। मुखिया तो प्रांत व क्षेत्र के भरोसे ही जो रहते हैं। उनकी ही रिपोर्ट पर मंचासीन कौन होगा, तय होता है। लिहाजा ‘परिवार के मुखिया' से नजदीकियों के बाद तो स्वामी, उत्तम से सर्वोत्तम हो गए।
उनका दरबार जनसामान्य के लिए तो यदा-कदा ही जाना-पहचाना गया। उनके इर्द-गिर्द रसूखदारों के ही पंखे झलते रहे। कभी-कभार कथा वार्ता के आयोजन भी सामने आए, लेकिन वे इतने लोकप्रिय नहीं हुए कि जनसैलाब उमड़े। जन-जन के संत के बजाय वे खासजन की भीड़ से ही सदा घिरे रहे।
सूत्रों की मानें तो ‘मामा राज' की विदाई के बाद से ही उनका ‘तेज' और ‘ओज' कम होना शुरू हुआ था। फिर भी पुराना दबदबा कायम था और सम्मान भी। लिहाजा जब सूबे में ‘पहलवान राज' आया तो ‘पहलवान' भी स्वामीजी के निशाने पर आ गए।
मसला महज वक्त पर नहीं पहुंचने का था, लेकिन ‘इत्ती' सी बात पर ‘सरकार' को मिली सार्वजनिक फटकार ने ‘सरकार' ही नहीं, जनसामान्य को भी सकते में ला दिया था। इस फटकार और उसके बाद सरकार की सार्वजनिक माफी के बाद किसी को रत्तीभर भी इल्म नहीं था कि हालात ऐसे बनेंगे कि ये सवाल खड़ा होगा- ‘उत्तम' तो ‘सर्वोत्तम' थे न?
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