बादलों में दुबके ऋतुराज वसंत: गुमशुदा है वासंती बयार; सर्द हवा का बना हुआ राज
KHULASA FIRST
संवाददाता

खबर भी नहीं हुई, दबे पांव फागुन भी आ गया, होली का डांडा भी गड़ गया
वसंत आगमन को पखवाड़ा होने को आया, ऋतुओं का राजा मन-मयूर में अब तक छा न पाया
ऋतुराज के आगमन पर प्रकृति का शृंगार भी अब तक अधूरा, सब तरफ सर्द मौसम का पहरा
खेतों में भी इस बार कम ही चटकी सरसों की पीली आभा, आम्र-मंजरी को तरसते आम के वृक्ष
बादलों का लिहाफ ओढ़े बैठे हैं भगवान भुवन भास्कर, रूमानी मौसम की जगह बरस रहा मावठा
हवा भी आए दिन बदल रही दिशा, कभी पहाड़ तो कभी रेगिस्तान का रुख
बदन पर अब तक लदे-फंदे हैं शॉल-दुशाले, टोपे-मोजे, मफलर-जैकेट
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागते-दौड़ते दौर में अब किसे फिक्र कि कब ऋतुराज का आगमन हुआ और हुआ भी तो खबर क्यों नहीं हुई? खबर हुई भी तो ऋतुओं के राजा नजर क्यों नहीं आ रहे? वे आए तो हैं, लेकिन गायब कहां और क्यों हैं? अब कौन करता है इसकी पड़ताल?
आ तो रंगों का रंग-रंगीला महीना फागुन भी गया, लेकिन जब आत्मा को वसंत ही महसूस न हुआ तो देह को फागुन कैसे महसूसता? अब तो होली के डांडे का कहीं शोर भी नहीं मचता, जबकि वह अभी दो दिन पूर्व ही माघ पूर्णिमा पर चुनींदा देवालयों में रोपित भी हो गया।
कभी वह महीनेभर पहले गली-मोहल्लों, चौक-चौबारों में जोर-शोर से जगह बनाता था। अब वे दिन लद गए। ऋतुओं व उससे जुड़ी परंपराओं से जैसे इंसान बेखबर-बेईमान हुआ, वैसे ही कुदरत भी हो गई। इस बार प्रकृति भी इशारा करना भूल गई कि ऋतुराज आ गए हैं, फागुणियो छा गयो है।
न कोयल की कुहूक सुनाई दी, न चातक-मोर-हंस का शोर गूंजा। पंछियों का कलरव कुल-गान भी गुंजायमान नहीं हो पाया। वसुंधरा ने भी नूतन शृंगार नहीं किया। नीलगगन पर घुसर बादलों का बेमौसम कब्जा बना हुआ है। वे दिनकर को दमकने ही नही दे रहे।
नतीजे में वसंत आ तो गए, लेकिन आते ही बादलों में दुबक गए। एक पखवाड़ा होने को आया उनके आगमन को, लेकिन वे अब तक वे दुबके ही हैं। इसलिए आपके इस पक्के इंदौरी अखबार खुलासा फर्स्ट ने बीते साल की तरह आप सबसे मनुहार नहीं की- चलो री वृंदावन... वसंत आयो..!! मन-मयूर में वसंत-फागुन छाएगा, निश्चिंत रहिए, बुलावा भी आएगा।
ऋतुराज वसंत का आगमन तो अपने तय समय पर ही हो गया, लेकिन उनके आने की आहट इस बार वैसी नजर नहीं आई, जैसा ऋतुराज का मिजाज है। वासंती बयारों की जगह इस बार वसंत महोदय सर्द हवा पर सवार होकर आए और आते ही गुमशुदा-से हो गए।
तलाशने पर वे बादलों में दुबके नजर आ रहे हैं, लेकिन मन-मयूर में महसूस नहीं हो रहे। ऋतुराज को धरा पर आए एक पखवाड़ा होने को आ रहा है, लेकिन उनकी मौजूदगी घर-आंगन से लेकर मन-आंगन तक तलाशी जा रही है। अन्यथा वे आते ही इन दोनों स्थानों पर ऐसी दस्तक देते थे कि अंतर्मन एक अनकहे आनंद के साथ कुलांचें मारने लग जाता था। वसंत ही नहीं, वासंती बयार तक नदारद है। माहौल में सर्द हवा का ही राज है।
भगवान भुवन भास्कर भी ऋतुराज का स्वागत करने के बजाय बादलों का लिहाफ ओढ़े बैठे हैं। यदा-कदा लिहाफ से बाहर झांक रहें है दिनकर और फिर अपने साथ वसंत को लेकर बादलों में दुबक-दुबक जा रहे हैं। जैसे वसंत के आने की खबर नहीं हुई, वैसे ही मिजाज फागुन ने भी धारण कर लिए।
किसी को पता ही नहीं चला और रंग-रंगीला फागुन भी आ गया। पूजन-अर्चन के साथ एक दिन पूर्व होली का डांडा गड़ गया, लेकिन ‘फागुणियो' कहीं दूर-दूर तक दिख ही नहीं रहा। जीवन की आपाधापी में अब किसे फिक्र कि ऋतुराज आए कि नहीं? फागुन छाया कि नहीं? होली का डांडा रोपित हुआ कि नहीं?
ऋतुराज के आगमन पर प्रकृति का साज-शृंगार भी इस बार अधूरा ही है। दूल्हे के रूप में आने वाले ऋतुओं के राजा के लिए नववधू-सी सजने वाली वसुंधरा ने भी इस बार जैसे बे-मन से धानी चुनरिया ओढ़ी। खेत-खलिहानों में पीली सरसों की चटक भी कम ही चटकी।
अन्यथा सरसों की पीली आभा से दमकते खेत-खलिहान के नजारे हर तरफ दृश्यमान हो जाते हैं। लता-पताकाओं में वैसी सरसराहट नहीं, जैसी ऋतु आगमन पर होती है। फलों के राजा आम के वृक्ष पर भी आम्र-मंजरियों का इंतजार हो रहा है। माहौल से सर्दी खत्म हो तो प्रकृति भी नूतन शृंगारित हो। सब तरफ तो सर्द हवा का पहरा बना हुआ है।
ऋतुराज के आगमन व फागुन की दस्तक के बाद भी बदन पर अब तक शॉल-दुशाले लदे-फंदे हैं। टोपे-मोजे साथ-हाथ नहीं छोड़ रहे, न मफलर-जैकेट देह से दूर हो रहे हैं। मौसम रह-रहकर अपना मिजाज बदल रहा है और जनसामान्य को ही नहीं, ऋतुराज को भी हैरान-परेशान कर रहा है। जिस हवा पर वसंत की दस्तक व धमक का दारोमदार है, वह तो जैसे मदहोश-सी हो चली है।
उसे सूझ ही नहीं पड़ रही कि कौन-सी दिशा पकड़े? कभी पहाड़ों के रास्ते मैदानी इलाकों में आ धमकती है, तो कभी शुष्क रेगिस्तान की राह पकड़ लेती है। लगता है जैसे ठंड विदा हो गई। तभी तो ये हवा यू टर्न लेकर दक्षिण के समुंदर को छूती चली आती हैं और माहौल में पानी-छींटे का मौसम ला रही हैं। लिहाजा दिसंबर-जनवरी में आने वाला मावठे का मौसम फरवरी में दस्तक दे रहा है। बेमौसम पानी ही नहीं, टप-टपाटप ओले भी गिर रहे हैं।
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