नर्मदा जयंती पर विशेष: नर्मदे हर; मध्य प्रदेश की अमृतमयी जीवनरेखा और आस्था का शाश्वत प्रवाह
KHULASA FIRST
संवाददाता

मोक्ष और विकास का सेतु, जिसने मालवा की माटी को बनाया स्वर्ण
आस्था की अजस्र धारा, जब महादेव के पसीने से जन्मी ‘रेवा’ बनी इंदौर की जीवनरेखा
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
‘त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे’ आदि शंकराचार्य के इस उद्घोष में मां नर्मदा के प्रति वह समर्पण है, जो इसे अध्यात्म के शिखर पर बैठाता है। आदि शंकराचार्य मानते थे कि नर्मदा नदी का पानी केवल लोगों की प्यास नहीं बुझाता, बल्कि अंतर्मन के विकारों को धोकर उनमें विवेक का उदय करता है।
इंदौर और नर्मदा
देवी अहिल्या की नगर इंदौर पूरी तरह से नर्मदा नदी के पानी पर निर्भर कहा जा सकता है। नर्मदा प्रोजेक्ट के माध्यम से नर्मदा नदी का पानी ऊंचाई पर स्थित इंदौर तक पहुंचाया जाता है। ‘मालवा के पठार’ पर बसे इस शहर में नर्मदा नदी का पानी लाना आधुनिक इंजीनियरिंग का एक चमत्कार कहा जाता है।
इसमें कितनी दिक्कतें आईं और उन्हें कैसे दूर किया गया यह अधिकांश लोग जानते हैं। तीन चरणों के बाद अब आगे का सफर तय हो रहा है। अगर एक दिन भी नर्मदा नदी की पाइपलाइन में खराबी आ जाए, तो पूरे इंदौर शहर की रफ्तार मानों थम जाती है। नर्मदा नदी पर बनी बहुउद्देशीय परियोजनाओं इंदिरा सागर, ओमकारेश्वर और सरदार सरोवर परियोजना ने हमारे राज्य को बिजली उत्पादन और कृषि में भी आत्मनिर्भर बनाया है।
ज्योतिषीय अनुसार जानिए राशियों के लिए महत्व
मेष, सिंह और धनु राशि के राशियों के जातकों के लिए मां नर्मदा की पूजा ‘मानसिक शांति’ देगी। पंडितों के अनुसार इस दिन गुड़ या लाल वस्त्र का दान करना शुभ रहेगा। वहीं वृषभ, कन्या और मकर राशि वालों के लिए नर्मदा जयंती का दिन रुके हुए कार्यों’ को गति देने वाला होगा। इस दिन अनाज का दान करना हितकर होगा।
मिथुन, तुला और कुंभ राशि के जातकों लिए यह पर्व स्वास्थ्य लाभ देने वाला है। ज्योतिषियों के अनुसार इस दिन सफेद चंदन या मिश्री का दान करने से मानसिक शांति मिलेगी। कर्क, वृश्चिक और मीन राशि वालों के लिए इस दिन ‘आध्यात्मिक उन्नति’ का योग है। दूध या चांदी की वस्तु का दान करना लाभकारी होगा।
दीपदान से दूर होते हैं दोष
पंडितों और ज्योतिषियों के मुताबिक अगर किसी जातक की कुंडली में कालसर्प दोष अथवा चंद्र दोष है, तो नर्मदा जयंती के दिन नर्मदा नदी के किनारे दीपदान करने और ‘नर्मदे हर’ का जाप करने से इस तरह दोषों का प्रभाव कम हो जाता है।
नर्मदा जयंती हमारे अस्तित्व और प्रकृति के बीच के गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। आइए आज के दिन हम न केवल मां नर्मदा का विधि-विधान से पूजन करें, बल्कि इसे सभी तरह के प्रदूषण से मुक्त रखने का दृढ़ संकल्प भी लें।
आ ज हम नर्मदा जयंती मना रहे हैं। इस दिन पूरे मध्य प्रदेश में उत्सव का माहौल रहता है। धार्मिक और पौराणिक महत्व के साथ ही पर्व का यह दिन हमें जल संरक्षण और अपनी नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प लेने का भी स्मरण कराता है।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष नर्मदा जयंती पर सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। यह दान और स्नान के महत्व को कई गुना बढ़ा देता है।
नर्मदा नदी को अपनी पदयात्राओं से जीवंत करने वाले साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित और नर्मदा पुरुष के नाम से विख्यात प्रसिद्ध लेखक और चित्रकार अमृतलाल वेगड़ ने लिखा है- “नर्मदा वह नदी है जिसके किनारे बैठकर आदमी कभी अकेला नहीं होता।’
मां नर्मदा का स्थान अनुपम... इतिहासकारों के अनुसार हमारे देश में नदियां केवल भूगोल का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि सभ्यता की धड़कनें भी हैं। इन सबमें मां नर्मदा का स्थान अनुपम कहा जाता है।
इसका कारण यह है कि नर्मदा नदी धर्म और जीवन का दुर्लभ संगम हैं। तभी नर्मदा को पुण्यसलिला और जीवनदायिनी कहा जाता है। नर्मदा हमारे शहर इंदौर की रगों में दौड़ता हुआ जीवन है।
नर्मदा नदी इस देश की वह धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द हजारों वर्षों की तपस्या, संस्कृति और जीवन दर्शन घूमता है। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि अमरकंटक के शिखर से बहती हुई भगवान शिव की करुणा है, जो कंकर-कंकर को शंकर बनाने की सामर्थ्य रखती है।
‘भगीरथ संकल्प’ का उत्सव... नर्मदा जयंती केवल एक पंचांग की तिथि नहीं, बल्कि उस भगीरथ संकल्प का उत्सव है, जिसके कारण विंध्याचल की दुर्गम ऊंचाइयों को चुनौती देकर मां रेवा का जल इंदौर के घर-घर तक पहुंचा।
यह पर्व मां नर्मदा की उस पवित्र जलधारा के प्रति नतमस्तक होने का दिन भी कहा जाता है, जो न केवल फसलों को सींचती है, उद्योगों के पहिये घुमाती है, बल्कि इंदौर जैसे महानगर को रेगिस्तान बनने से बचाकर उसे मिनी मुंबई के रूप में जीवंत रखती है।
अमरकंटक की गोद से निकलकर खंभात की खाड़ी तक की यह यात्रा असल में हमारे विश्वास की यात्रा भी है—जहाँ जल ही संस्कृति है और जल ही भविष्य।
माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को जन्मोत्सव.... देश की सात पवित्र नदियों में से एक माँ नर्मदा का जन्मोत्सव हिंदू पंचांग के अनुसार प्रतिवर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। नर्मदा जयंती केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह उस जलधारा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है जिसने सदियों से सभ्यता को सींचा है।
क्या है पौराणिक मान्यता... पुराणों में उल्लेख है कि माघ शुक्ल सप्तमी के दिन ही माँ नर्मदा का इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। नर्मदा को ‘रेवा’ भी कहा जाता है और इन्हें भगवान शिव की पुत्री माना गया है।
मान्यता है कि जब अंधकासुर के संहार के समय महादेव के पसीने की बूंदें अमरकंटक की पहाड़ियों पर गिरीं, तब एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ, जो ‘नर्मदा’ (नर्म यानी सुख, दा यानी देने वाली) कहलाईं।
एक और रोचक किस्सा.... इतिहास बताता है कि लोक कथाओं में नर्मदा और सोनभद्र (नद) की एक प्रेम कथा बहुत प्रचलित है। कहा जाता है कि नर्मदा और सोनभद्र का विवाह होने वाला था, लेकिन सोनभद्र नर्मदा की सखी ‘जोहिला’ के प्रति आकर्षित हो गए।
जब नर्मदा को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने क्रोध में आकर अपना रास्ता बदल लिया और आजीवन कुंवारी रहने का संकल्प लेकर विपरीत दिशा (पश्चिम) की ओर चल पड़ीं। आज भी भौगोलिक रूप से नर्मदा अन्य बड़ी नदियों के उलट दिशा में बहती है। यह देश की उन दुर्लभ नदियों में से भी एक है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।
कहां से उद्गम और कहां तक सफर... मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित अमरकंटक की पहाड़ियों से उद्गम के बाद नर्मदा पश्चिम दिशा की ओर बहते हुए एक हजार से अधिक किलोमीटर की यात्रा तय करके खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में विलीन हो जाती है।
जानिये नर्मदा के महत्व के बारे में... शास्त्रों में उल्लेख है कि गंगा नदी में स्नान से, सरस्वती नदी के तीन दिन के स्मरण से और यमुना नदी के सात दिन के स्नान से जो पुण्य मिलता है, वह केवल नर्मदा नदी दर्शन मात्र से ही हासिल हो जाता है। मोक्षदायिनी नर्मदा के तट पर की गई तपस्या और दान का फल अक्षय होता है।
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