स्लीपर बसों के लिए नियम नए या खेल पुराना: कानून, गजट और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल; कानूनी प्रावधान के बिना लागू करने का आरोप, 25 साल में अरबों के राजस्व नुकसान की भरपाई कब
KHULASA FIRST
संवाददाता

अंकित शाह 99264-99912 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
केंद्रीय परिवहन मंत्री ने स्लीपर बसों के निर्माण को लेकर नए नियमों की घोषणा की है लेकिन इनकी कानूनी बुनियाद को लेकर अब तक कोई स्पष्ट जानकारी का खुलासा नहीं हुआ है। परिवहन विभाग में आज भी बसों का पंजीयन केवल दो श्रेणियों- साधारण और डीलक्स में ही किया जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है स्लीपर कोच की श्रेणी आखिर कब लागू हुई, मोटरयान अधिनियम में संशोधन कब हुआ और उसका गजट नोटिफिकेशन कब जारी किया गया?
इन बुनियादी सवालों पर न केंद्र सरकार न परिवहन विभाग ने कोई दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं। स्लीपर बसों के पुराने निर्माण नियम क्या थे और कब लागू हुए, इस पर भी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी जा रही है।
आरोप है यह पूरी प्रक्रिया जनता और मीडिया को असली मुद्दों से भटकाने के लिए अपनाई जा रही है। जिस तरह पहले केंद्र में कोई कानून न होने के बावजूद विभागीय अधिकारियों ने स्लीपर कोच के पंजीयन पर रोक लगाई थी, उसके बाद आज तक कोई नया स्पष्ट कानून नहीं लाया गया। अब आरोप है केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी स्वयं भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
ऑडिट आपत्ति के बावजूद कार्रवाई नहीं
तत्कालीन महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट में इसे अवैध बताते हुए कहा गया इससे राज्य सरकार को टैक्स के रूप में अरबों रुपए का नुकसान हुआ। इसी रिपोर्ट पर परिवहन विभाग ने 31 अक्टूबर 2009 को संकल्प पत्र क्रमांक 166 को निरस्त कर दिया।
इस आदेश में स्पष्ट किया गया था राज्य परिवहन प्राधिकरण को स्लीपर बर्थ लगाने का अधिकार नहीं है और जब तक मोटरयान नियमों में प्रावधान नहीं होगा, तब तक ऐसा पंजीयन वैधानिक नहीं माना जाएगा। इसके बावजूद जनहित का हवाला देकर जिम्मेदारों ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
25 वर्षों में 180 अरब रुपए का नुकसान
खुलासा फर्स्ट ने 26 अप्रैल 2024 को खुलासा किया था बस मालिकों और परिवहन अधिकारियों की मिलीभगत से पिछले लगभग 25 वर्षों से सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। पहले 52 सीटों वाली बसों का डीलक्स में पंजीयन कर 10% सीट घटाकर स्लीपर बर्थ लगाई जाती थी, लेकिन अब पूरी बस ही स्लीपर बनाई जा रही है।
2×1 लेआउट वाली बसों में वास्तविक क्षमता लगभग 35 यात्रियों की होती है, जबकि पंजीयन 52 सीटों का कराया जाता है। इससे प्रति बस करीब 15 सीटों के टैक्स की चोरी हो रही है। अनुमान के मुताबिक एक बस से 25 वर्षों में लगभग 18 लाख रुपए का नुकसान और केवल मप्र में ही लगभग 1000 स्लीपर बसों से 180 अरब रुपए का राजस्व नुकसान हुआ।
डीलक्स के नाम पर सामान्य बसें, किराया वसूली अलग
खुलासा फर्स्ट ने 4 मई 2024 की रिपोर्ट में बताया था सामान्य बसों को डीलक्स बताकर चलाया जा रहा है। यात्रियों से डीलक्स का किराया वसूला जाता है, लेकिन सुविधाएं सामान्य बस जैसी ही दी जाती हैं।
कई बसों में नीचे सीटें और ऊपर बर्थ हैं। ऐसे वाहनों का रजिस्ट्रेशन, परमिट और फिटनेस किस श्रेणी में किया गया, यह बड़ा सवाल है। इससे शासन को अरबों रुपये का नुकसान जारी है।
बीमा और फाइनेंस कंपनियों की भूमिका पर सवाल
खुलासा फर्स्ट द्वारा 22 जनवरी 2026 को किए खुलासे में सामने आया बीमा और फाइनेंस कंपनियों की शह पर अवैध स्लीपर बसों का पंजीयन होता रहा। अधिक प्रीमियम और ब्याज के लालच में नियमों की अनदेखी की गई।
दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले यात्रियों के परिजन मुआवजे से वंचित रह जाते हैं, जबकि फाइनेंस कंपनी ब्याज और बीमा कंपनी प्रीमियम कमा लेती है। नियमों के अनुसार किसी भी वाहन में संरचनात्मक बदलाव अवैध है फिर भी स्लीपर बसों में अंदर की लंबाई और डिजाइन बदली जाती रही।
किराए का प्रस्ताव भी अवैध
परिवहन विभाग समय-समय पर स्लीपर बसों के किराए में 10% से 75% तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव लाया। 2012 में एमपी राजपत्र में यह प्रस्ताव पारित हुआ, लेकिन मोटर व्हीकल एक्ट 1988 और नियम 1989 में प्रावधान न होने के कारण स्वीकृति नहीं मिल सकी।
2001 के संकल्प से फैला स्लीपर कोच का जाल... खुलासा फर्स्ट ने 25 अप्रैल 2024 को प्रकाशित खबर में बताया था पर्यटन के लिए केवल ओमनी बसों (स्लीपर कोच) में ही बर्थ का प्रावधान था। इसी आधार पर प्रदेश सरकार ने 24 अप्रैल 2001 को संकल्प पत्र क्रमांक 166 पारित कर डीलक्स बसों में व्हील बेस के अनुसार 10% सीट कम कर बर्थ लगाने की अनुमति दे दी।
इसके बाद देशभर में स्लीपर कोच बसों की बाढ़ आ गई। हालांकि केंद्रीय मोटरयान नियम 1989 के रूल 128 में केवल पर्यटक यानों की बैठक क्षमता का प्रावधान है, स्लीपर कोच को लेकर न केंद्रीय नियमों न मप्र मोटरयान नियम 1994 में कोई स्पष्ट व्यवस्था है।
पहले कानून बनाए सरकार: अग्रवाल... परिवहन विधिक सलाहकार सूरजप्रकाश अग्रवाल का कहना है सबसे पहले शयनयान की परिभाषा और उसकी विशिष्टताएं संसद द्वारा कानून बनाकर तय करनी होंगी।
उसके बाद ही निर्माण, उपयोग, कर, किराया, परमिट और सुरक्षा के नियम बनाए जा सकते हैं। बिना कानूनी प्रावधान के बनाए गए नियम विधिसम्मत नहीं हैं। देशभर में पहले से पंजीकृत सभी शयनयान बसों का पंजीयन और फिटनेस निरस्त कर, सुधार के बाद ही अन्य श्रेणियों में पुनः पंजीयन किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष साफ है जब कानून और गजट ही स्पष्ट नहीं, तो स्लीपर कोच बसों पर नए नियम किस आधार पर लागू किए जा रहे हैं? और अगर यह सब अवैध था, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
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