राहुल का दौरा-न्याय की उम्मीद या सिर्फ ‘पॉलिटिकल टूरिज्म: मासूमों की मौत पर सियासत
KHULASA FIRST
संवाददाता

शुभम दुबे स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर जो स्वच्छता के आसमान में सातवें नंबर का सितारा टांकने का दंभ भरता है, आज उसी इंदौर की गलियों में सीवरेज का जहरीला पानी पाइप लाइनों के जरिए मौत बनकर घरों में उतर गया है। भागीरथपुरा में हुई 23 मौतें (दावे के अनुसार) केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीति समर्पित प्रशासन का किया हुआ ‘सिस्टम मर्डर’ है, जहां विकास की चमचमाती सड़कों के नीचे सड़ी-गली पाइप लाइनें जनता के सब्र और जीवन का इम्तिहान ले रही थीं।
शहर के भाग्य विधाता और सत्ता के गलियारों में बैठे ‘माननीय’ इस समय आत्ममुग्धता के उस शिखर पर हैं, जहां उन्हें आम आदमी की आवश्यक चीखें सुनाई नहीं देतीं। सत्ता पक्ष का रवैया अहंकार जनित ‘लीपापोती’ और ‘अस्विकारोक्ति’ का रहा है; वे मौतों के आँकड़ों को उलझाने और इसे तकनीकी खराबी बताकर पल्ला झाड़ने में माहिर हो चुके हैं।
उनके लिए भागीरथपुरा का संकट केवल एक म्युनिसिपल फाइल है, जिसे मुआवजे की चंद किस्तों से बंद किया जा सकता है। सत्ताधीशों की यह बेरुखी इंदौर के उस अहंकार को दर्शाती है, जो केवल ‘पुरस्कारों’ की गिनती करता है, श्मशान में जलती चिताओं की नहीं।
इसी बीच राहुल गांधी का दौरा इस मुद्दे पर विपक्ष की भूमिका की जड़ें मज़बूत करने का प्रयास हो सकता है, कांग्रेस नेता राहुल गांधी का इंदौर दौरा सियासत की तपिश को बढ़ाने वाला है। लेकिन यहां सवाल विपक्ष की नीयत पर भी उठता है।
क्या यह दौरा वाकई पीड़ितों के आँसू पोंछने के लिए है या फिर आगामी चुनावों के लिए एक ‘फोटो-ऑप’ मात्र? विपक्ष, जो सालों तक नगर निगम की कुंभकर्णी नींद को जगाने में नाकाम रहा, आज अचानक जागकर शोर मचा रहा है।
राहुल गांधी के आने से सुर्खियां तो बनेंगी, लेकिन क्या विपक्ष सत्ता पक्ष को उन बुनियादी सुधारों के लिए मजबूर कर पाएगा जो पाइपलाइनों में घुलते जहर को रोक सकें? विपक्ष का दोष यह है कि वह ‘प्रतिक्रियावादी’ (Reactive) है, ‘निवारक’ (Preventive) नहीं,वे लाशों के गिरने का इंतज़ार करते हैं ताकि राजनीति की जा सके।
इंदौर के ‘सफेदपोश’ आज उस डॉक्टर की तरह हैं जो मरीज के मरने के बाद उसकी रिपोर्ट पर चर्चा कर रहे हैं। एक तरफ सत्ता पक्ष है जो गंदे पानी को ‘अमृत’ बताने की जिद पर अड़ा है, और दूसरी तरफ विपक्ष है जो उस गंदे पानी की बोतलों के साथ सेल्फी लेने में व्यस्त है।
भागीरथपुरा की जनता इस समय दो पाटों के बीच पिस रही है- एक तरफ सत्ता का ‘सिस्टम’ है जो उनकी सुध नहीं लेता और दूसरी तरफ विपक्ष का ‘दौरा’ है जो सिर्फ धूल उड़ाकर चला जाता है।
जब सीवरेज का पानी पेयजल की नसों में दौड़ने लगे, तो समझना चाहिए कि शहर का ड्रेनेज सिस्टम नहीं, बल्कि राजनीति का ‘नैतिक सिस्टम’ चोक हो चुका है। राहुल गांधी का दौरा अगर सत्ता को आईना दिखा सके तो सार्थक है, वरना इंदौर की जनता यह बखूबी जानती है कि जब प्यास लगती है, तो न सत्ता पानी पिलाती है और न विपक्ष; उन्हें तो बस अपनी राजनीति की ‘पाइप लाइन’ बिछानी होती है। इंदौर को आज ‘नेता’ नहीं, ‘नीयत’ की ज़रूरत है।
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