इंदौर में नियमों का खुला उल्लंघन अफसरों की चुप्पी सवालों के घेरे में: सरकारी जमीन से सटे क्षेत्र में खड़ा हो गया बहुमंजिला भवन
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर में अवैध निर्माण और सरकारी जमीन पर कब्जे के मामलों के लगातार खुलासों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी अब संदेह को जन्म देने लगी है। ताज़ा मामला इंदौर के कास्बा क्षेत्र का है, जहाँ स्वीकृत लेआउट, राजस्व नक्शों और मौके की वास्तविक स्थिति में ज़मीन-आसमान का अंतर साफ दिखाई देता है। हैरानी की बात यह है कि शिकायतें और दस्तावेज़ सामने होने के बावजूद प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
स्वीकृत लेआउट कुछ और, निर्माण कुछ और दस्तावेज़ों में प्रस्तुत स्वीकृत लेआउट प्लान के अनुसार जिस क्षेत्र में सीमित निर्माण और खुली भूमि का प्रावधान था, उसी स्थान पर मौके पर बहुमंजिला इमारत खड़ी कर दी गई। भवन की ऊँचाई, कवर्ड एरिया और सेटबैक—तीनों ही नियमों का खुला उल्लंघन दिखाई देता है। सवाल यह है कि जब स्वीकृत सीमाएं स्पष्ट थीं, तो नियमों को ताक पर रखकर यह निर्माण आखिर कैसे खड़ा हो गया?
राजस्व नक्शों और मौके की वास्तविक स्थिति में ज़मीन-आसमान का अंतर साफ दिखाई देता है।
सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे का संदेह
राजस्व नक्शे और खसरा विवरण संकेत देते हैं कि निर्माण स्थल से सटी अथवा उसमें शामिल कुछ भूमि सरकारी श्रेणी में दर्ज है। इसके बावजूद वहां पक्का निर्माण कर लिया। यदि यह भूमि निजी नहीं थी, तो निर्माण अनुमति कैसे दी? और यदि अनुमति नहीं थी, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मौके की स्थिति खोल रही है पूरी पोल
स्थल निरीक्षण में साफ नजर आता है कि भवन का बड़ा हिस्सा स्वीकृत योजना से बाहर जाकर बनाया गया है। आसपास के खाली और हरित क्षेत्र में सीधा हस्तक्षेप किया गया है। यह स्थिति न केवल नगर एवं ग्राम निवेश नियमों का उल्लंघन है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
प्रशासनिक चुप्पी से मिलीभगत की आशंका
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े निर्माण कार्य के दौरान नगर निगम, तहसील और राजस्व विभाग की नजर आखिर कहां थी? स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना प्रशासनिक संरक्षण के इस स्तर का निर्माण संभव नहीं है। अब तक कोई कार्रवाई न होना इस आशंका को और मजबूत करता है कि कहीं न कहीं मिलीभगत का खेल चल रहा है।
यह भूमि तहसील राऊ, जिला इंदौर के अंतर्गत खसरा नंबर 1397/मिन-1, रकबा 0.202 हेक्टेयर है। भूमि स्वामी के रूप में मेसर्स राघव एसोसिएट्स (भागीदारी फर्म), 519 नर्सिंग वार्ड जबलपुर—तर्फे शकुंतलाबाई पति कन्हैयालाल बड़े, अनिल पिता एस.के.डी. सोनी, मनीष व मनोज पिता के.डी. सोनी तथा धर्मेंद्र पिता के.एल. बड़े के नाम दर्ज हैं।
वर्ष 2019 में हक त्याग पत्र के आधार पर तहसीलदार द्वारा नामांतरण स्वीकार किया गया, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो भूमि पूर्व में नदी क्षेत्र में और वर्तमान में नाले से लगी हुई बताई जा रही है, वहां बहुमंजिला निर्माण की अनुमति किन आधारों पर दी गई?
अब जवाब जरूरी
दस्तावेज़, नक्शे और ज़मीनी सच्चाई सामने आने के बाद भी यदि प्रशासन मौन है, तो यह कानून के साथ मज़ाक से कम नहीं। सवाल उठता है—
क्या नियम सिर्फ आम नागरिकों के लिए हैं?
क्या प्रभावशाली बिल्डरों के लिए अलग कानून है?
और कब तय होगी जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही?
यदि शहर में अवैध निर्माण इसी तरह अनदेखे किए जाते रहे, तो आने वाले समय में इंदौर का शहरी ढांचा और कानून व्यवस्था दोनों ही गंभीर संकट में पड़ सकते हैं।
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