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न भूतो-न भविष्यति: धरा पर दूजा कोई सत्तन नहीं

Khulasa First

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संवाददाता

07 फ़रवरी 2026, 12:42 pm
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न भूतो-न भविष्यति

मालवा-निमाड़ की शान, प्रदेश की पहचान मान्यवर सत्तन गुरु का आज जन्मदिन, गद्‌गद् इंदौर

जन-जन के गुरुदेव, राष्ट्रकवि, अटलजी के लाड़ले सत्तन गुरु के जन्मोत्सव पर तंबोली बाखल में उमड़ा उत्सवी सैलाब

इंदौर के भाल का गौरव सत्तन, हिंदी भाषा के मानबिंदु सत्तन, काव्य जगत की आन-बान-शान सत्तन

जिनकी वाणी में साक्षात विराजती हैं मां वीणावादिनी, जो सदा सत्य का पक्षकार, ऐसे साहित्य मनीषी की जय-जयकार

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अब अहिल्या नगरी इंदौर में ऐसे कितने व्यक्तित्व बचे हैं, जिन्हें चौराहे पर खड़ा देख राह चलता भी अपनी साइकिल-वाहन एक तरफ टिकाए और नजदीक जाकर उस शख्सियत के पांव छुए और बिना कुछ कहे, प्रत्युत्तर सुने काम पर निकल जाए? निःस्पृह भाव से ये मान पाता अब कोई शहर में नजर आता है?

तमाम झंझावातों के बाद भी आम आदमी का अंतर्मन से आदर भाव गुरुवर सत्तनजी के खाते में दर्ज है। शिक्षक, पहलवान, शस्त्रकला पारंगत, काव्य-साहित्य जगत के महारथी, कथाकार, सफल मंच संचालक, नेता, पिता, गुरु आदि-आदि। एक व्यक्ति में कितने व्यक्तित्व... है कोई और? नहीं न?

इसलिए दूसरा सत्तन अब इस धरा पर नहीं हो सकता। न भविष्य में। गुरुवर सत्तन अहिल्या नगरी, मालवा-निमाड़ अंचल व मध्य प्रदेश की थाती हैं, बल्कि वे समूचे भारत वर्ष में एक समान जाने-पहचाने और सम्मानित होने वाले व्यक्तित्व हैं। यह कोई मिथक नहीं। न किंवदंती हैं।

न व्यक्ति विशेष के लिए आत्मीयता का अतिरेक। लेकिन यह सोलह आने सच है कि भारत में दूसरी लता मंगेशकर, दूसरा सचिन तेंदुलकर व दूसरा अमिताभ बच्चन अब नहीं हो सकता। ठीक ऐसा ही सच माननीय गुरुवर पंडित सत्यनारायण सत्तन को लेकर। जैसे दूसरा बच्चन नहीं, वैसे ही अब इस जगत में दूसरा सत्तन नहीं।

जुग-जुग जिएं, मंच सम्राट मालवा शिरोमणि
मंच सम्राट मालवा शिरोमणि सत्तन जुग-जुग जिएं। मां शारदा के सच्चे उपासक सत्तन देशभर में अखिल भारतीय स्तर के काव्य मंचों का एक सशक्त चेहरा हैं। वे काव्य मंचों पर संचालन करने की अपनी अभिनव कौशल कला के लिए ही पहचाने जाते हैं। उनका ओजपूर्ण काव्यपाठ श्रोताओं के अंतर्मन को झकझोरता हुआ मंत्रमुग्ध कर देता है।

देश के हर हिस्से में उनकी वाणी व लेखनी सम्मानित हुई है। साहित्य रत्न की उपाधि से अलंकृत सत्तन को देश में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, गोपाल सिंह नेपाली, श्रीकृष्ण सरल, डॉ. चंद्रप्रकाश वर्मा, हरिशंकर परसाई आदि स्वनामधन्य कवि-साहित्यकारों के नाम पर स्थापित कई पुरस्कार मिले हैं। हिंदी साहित्य समिति ने तो उन्हें अपना साहित्य महोपाध्याय माना है।

आप कहां से लाएंगे वाणी की ऐसी मुखरता, जो बगैर डरे सच कहने को मुखर हो जाए। यह जानते हुए भी कि इस वक्तव्य से राजनीतिक व आर्थिक, दोनों नुकसान तय हैं। फिर भी जो कहना है, मुंह पर, वह भी बगैर किसी लागलपेट के। पराई पीर में अपनी पीर तलाशने वाले सत्तनजी जैसे अब कहां हैं? सत्ता, संगठन को सीधी राह दिखाने वाला... सब कौन हैं? पहले भी कौन था, सिवाय सत्तन के।

कौन है जो हिंदू को भी प्यारा लगे और मुसलमान के दुःख-दर्द को साझा कर सके। कहां से लाएंगे ऐसा व्यक्तित्व, जो मंदिर की समिति में भी मुखिया बने और मस्जिद की मीनार की तामीर में भी हाथ बंटाए? जिसका कहा दोनों समुदाय झट-से मान लें और गुस्से के गुबार को धूल-धूसरित कर परस्पर गले लग जाएं।

कौन होगा, जो कला-साहित्य के मंच पर भी दैदीप्यमान सितारे की तरह चमके और राजनीतिक जाजम का मंच भी बारंबार लूट ले जाए। गुरुवर सत्तनजी का व्यक्तित्व एक विशाल सागर है, जिसे शब्द रूपी छोटी-सी नौका के माध्यम से पार किया नहीं जा सकता। पार आखिर कैसे पाएं?

यात्रा 1940 से शुरू होती है मेरे अपने, आप-हम सबके गुरुवर सत्तनजी की। उसके बाद से आज तक का उनका सफर संघर्ष, त्याग, बलिदान, समर्पण, सेवा भाव के साथ आगे बढ़ रहा है। राष्ट्र निर्माता शिक्षक के रूप में एक पारी तो दूसरी अखाड़े की मिट्टी वाली पहलवानी।

लाठी, बनेठी, पटा के रूप में शस्त्रकला की तीसरी पारी तो काव्य साहित्य जगत की साधना वाली चौथी और लंबी व अनवरत पारी। संघ की शाखा के स्वयंसेवक भी गुरुवर तो मालवा-निमाड़ अंचल के शुरुआती चंद टिमटिमाते दीपक के रूप में जनसंघ के सिपाही भी गुरुवर।

आज वाली भाजपा को तो ये पता भी नहीं कि गुरु ने अपने सहयोगियों को साथ लेकर इस सत्ता वाली भाजपा के लिए कैसा संघर्ष, त्याग, बलिदान किया। प्रदेश की सत्ता पर विराज रही पार्टी के कई कर्ताधर्ता भले ही खम ठोंकें कि ये उपलब्धि हमारे दम पर है, लेकिन हकीकत ये ही है कि सत्ता की इस ऊंची व बुलंद इमारत की नींव के पत्थर, बल्कि चंद शिल्पकारों में एक गुरुवर सत्तन भी हैं।

जब जनसंघ के जमाने में पार्टी को चुनाव लड़ने-लड़ाने के लिए भी लोग नहीं मिलते थे, तब सत्तन अपने परिश्रम, निष्ठा और समर्पण रूपी तेल की एक-एक बूंद निचोड़कर जनसंघ के दीपक को रोशन रखते थे। वे विधायक भी चुने गए, लेकिन ऐसे नहीं, जैसे आज चुने जाते हैं।

शायद ही किसी को याद हो, एमवाय अस्पताल के बाद शहर का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी जिला अस्पताल (गोविंदवल्लभ पंत चिकित्सालय) सत्तन की देन है। आज तो एक गली में इंटरलॉकिंग टाइल्स लगाने मात्र में फोटो खिंचवाकर खबर छपवाई जाती है।

गुरुवर इस अस्पताल के लिए 9 दिन आमरण अनशन पर बैठे और उस विरोधी सरकार से अस्पताल मंजूर करवा लाए, जिसके नक्कारखाने में उस वक्त भाजपा जैसी विपक्षी पार्टी की आवाज तूती के समान होती थी। 1980 से 85 तक वे इस शहर से अकेले भाजपा विधायक थे।

1983 में जब नगर निगम चुनाव की बारी आई, तो सत्तन ने ऐसे लोगों को बुलाकर टिकट दिए, जो जमीन से जुड़े थे और गरीब तबके से थे। तांगा चलाने वाले लच्छू पहलवान तो इसका उत्कृष्ट उदाहरण बने। लेकिन आज की भाजपा को लच्छू पहलवान ये याद दिलाने से नहीं चूकते कि गुरु के वक्त की भाजपा जमीनी कार्यकर्ता की सुध लेती थी।

चाहे व सक्षम हो या नहीं। आज किसी को चुनावी टिकट मिल जाए तो वह अपने चुनाव के अलावा किसी दूसरे की सोच ही नहीं सकता, लेकिन सत्तन ऐसे व्यक्तित्व थे कि अपना चुनाव छोड़ दूसरों के लिए सभाएं करने व वोट मांगने चले जाते थे।

स्व. विष्णुप्रसाद शुक्ला ‘बड़े भैया’ का चुनाव हो या सांवेर में स्व. प्रकाश सोनकर का चुनाव, वे अपने चुनाव की चिंता न करते हुए पार्टी के लिए दौड़ जाते थे। पार्टी, संगठन व राजनीतिक सखाओं के प्रति ऐसा समर्पण भाव अब कहां? आज भी चुनावी बेला में मुख्य किरदार सत्तनजी होते हैं।

अंचल में ही नहीं, प्रदेश में उनकी डिमांड रहती है। मैं नहीं, तू... वाला भाव गुरुवर का सदैव रहा। उपलब्धियों का श्रेय दूसरों को देना व नाकामी अपने माथे मढ़ लेना। कभी कोई पद-प्रतिष्ठा की चाह नहीं की। न मान-सम्मान की। वे सदैव निर्लिप्त भाव से राष्ट्र-समाज-साहित्य जागरण के काम मे लगे रहे।

गुरुवर कहते हैं- दान की कमाई पर जीते हैं अपाहिज लोग... तुम मुझे मान की कमाई पर जीने दो... कर्म की प्रकाशक मेरे उर में है... साधना अगर विष है, तो मुझे विष ही पीने दो। इस मिजाज ने उन्हें देशभर में लोकप्रिय बनाया। चाहे वह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हों या फिर महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जैसी साहित्य जगत की अनेकानेक हस्तियां।

सबके चहेते गुरुवर रहे हैं। निर्भय हाथरसी तो उन्हें अपना पुत्र ही मानते थे। सत्तन ने शस्त्र व शास्त्र दोनों में समान अधिकारिता पाई। वे राजनेता जरूर रहे, लेकिन उनका साहित्यकार मन सदा राजनीति पर हावी रहा। नाम के अनुरूप वे सदैव सत्य के पक्ष में ही खड़े रहे।

ऐसे कला-साहित्य, राजनीति-समाजसेवा, शस्त्र-शास्त्र के मनीषी ऋषि का आज 7 फरवरी को जन्मदिन है। ये समूचे मालवा-निमाड़ अंचल के लिए गद्‌गद् होने का दिन है। खुलासा फर्स्ट गुरुवर सत्तनजी के शतायु-दीर्घायु होने की कामना करता है।

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