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विध्वंस का दंश झेल सनातन का गौरव लौटाता भगवान सोमनाथ का मंदिर

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संवाददाता

13 जनवरी 2026, 4:05 pm
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विध्वंस का दंश झेल सनातन का गौरव लौटाता भगवान सोमनाथ का मंदिर

रामनाथ मुटकुळे वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारतवर्ष में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं। इनमें से प्रथम ज्योतिर्लिंग भगवान सोमनाथ को माना जाता है। भगवान सोमनाथ का मंदिर भारत की हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति, संकल्पशक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है। यहां की भव्यता और दिव्यता अद्भुत तथा अलौकिक है।

ऐसे पुण्य धाम पर ठीक 1000 वर्ष पहले विधर्मियों की कुदृष्टि का वज्रपात हुआ और विध्वंस का एक न थमने वाला दौर शुरू हुआ, जो मुगल शासनकाल तक चलता रहा। देश की आजादी के साथ ही भगवान सोमनाथ के मंदिर की स्थापना

और ज्योतिर्लिंग की प्रतिष्ठा के गौरवपूर्ण कार्य हुए।

व र्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए खास है। यह 1000 वर्ष पहले हमले की याद और 1951 के पुनर्निर्माण के 75 साल होने की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण से जोड़ते हैं। इसी याद में स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है, जिसमें आध्यात्मिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने इसकी शुरुआत को विशेष बनाया।

भगवान सोमनाथ का मंदिर बार-बार टूटा, लेकिन भारतीय आस्था की तरह अटूट रहा। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, यह भारत माता के करोड़ों बच्चों के अटूट साहस का प्रतीक है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मंदिर पर 1026 में हुए पहले बड़े हमले की 1000वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इसको लेकर लिखा है कि 1026 में महमूद गजनवी के हमले से शुरू हुई विनाश की शृंखला के बावजूद बार-बार मंदिर का निर्माण हुआ। यह भारत की आत्मा की शाश्वत घोषणा है।

गुजरात के तट पर, जहां अरब सागर की लहरें प्रभास क्षेत्र की रेत को छूती हैं, वहां खड़ा सोमनाथ मंदिर एक ज्योतिर्लिंग नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता का प्रतीक है। महाभारत और पुराणों में वर्णित यह मंदिर अपनी भव्यता और चमत्कारिक वास्तुकला के लिए कभी पूरी दुनिया में विख्यात था।

इस ज्योतिर्लिंग को भगवान चंद्रदेव ने स्थापित किया था, इसीलिए इस सोमनाथ कहा जाता है। चंद्रदेव का एक नाम सोम भी है। प्राचीन काल में यह मंदिर वास्तुकला का एक अजूबा था। जानकारों के अनुसार, मंदिर का शिवलिंग चुंबकीय शक्ति के सहारे हवा में तैरता था।

यह तकनीक आज भी शोध का विषय है कि कैसे सदियों पहले भारतीय वास्तुकारों ने गुरुत्वाकर्षण और चुंबकत्व का ऐसा संतुलन बनाया था। इस शिवलिंग को तोड़ दिया गया था। सदियों तक सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के इन टुकड़ों को महान संतों और आध्यात्मिक संरक्षकों द्वारा छिपाकर रखा गया था।

वर्ष 2007 में जब वैज्ञानिकों ने इन टुकड़ों की सामग्री संरचना का अध्ययन किया तो उन्हें कुछ आश्चर्यजनक तथ्य मिला जिसने इस लिंगम् के रहस्य को और गहरा कर दिया। उन्होंने पाया कि इसके केंद्र में एक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र है, जो बहुत ही असामान्य है। इसकी रचना आज भी रहस्य है। वर्तमान में श्रीश्री रविशंकरजी के माध्यम से उन्हें जनता के सामने लाया गया है।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चंद्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है। दक्ष प्रजापति के शाप के चलते चंद्रदेव क्षय रोग का शिकार हो गए। इससे उनका तेज और कांति क्षीण होने लगी थी।

इस पर चंद्रदेव ने यहां भगवान सोमनाथ की स्थापना कर तपस्या की, जिससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और शाप के प्रभाव को कम किया। चंद्रदेव की प्रार्थना पर भगवान यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए और उनका नाम चंद्रदेव के एक नाम सोम के आधार पर सोमनाथ पड़ा।

लोककथाओं के अनुसार यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का महत्व और भी बढ़ गया। ऐसी मान्यता है कि श्री कृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे, तभी शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पद्मचिह्न को हिरण की आंख जानकर अनजाने में तीर मारा था। इससे यहीं भगवान श्री कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुण्ठगमन किया।

सोमनाथ की अपार धन-संपदा और ख्याति ही कई बार उसके संकट का कारण बनी। इसे बार-बार तोड़ा और लूटा गया, लेकिन हर बार यह अपनी राख से फिर जी उठा। प्रथम ज्योतिर्लिंग होने के चलते सोमनाथ मंदिर पूरे भारतवर्ष में ख्यात था।

कहा जाता है कि यहां कई टन वजनी सोने का बड़ा घंटा था, जिसके नाद के साथ भगवान की आरती की जाती थी। मंदिर में कई खंभे निर्मित थे, जिनमें तत्कालीन राजा-महाराजाओं ने अपने वैभव को प्रदर्शित करते हुए कीमती पत्थर जड़वा रखे थे। कहा जाता है कि यहां अपार सोना-चांदी और हीरे-मोती जवाहरात आदि थे। इसकी ख्याति दुनियाभर में थी, जिसके फलस्वरूप आक्रमणकारी इस ओर आकर्षित हुए।

एक मंदिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था, जिस जगह पर मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिंध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी।

गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया। मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक थी। वैल्लभी के राजाओं द्वारा निर्मित इस मंदिर को पहली बार 725 ईस्वी में सिंध के सूबेदार अल जुनैद ने तोड़ा।

प्रतिहार राजा नागभट्ट ने फिर से इसे भव्यता दी। अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया।

1024-25 ईस्वी के दौरान महमूद गजनवी का क्रूर हमला हुआ। इतिहास का सबसे काला अध्याय तब लिखा गया जब गजनवी ने अपनी सेना के साथ मंदिर पर धावा बोला। उसने न केवल यहां की अमूल्य संपत्ति लूटी, बल्कि मंदिर के भीतर पूजा कर रहे हजारों निहत्थे भक्तों का बेरहमी से कत्ल भी कर दिया।

ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग को बचाने के लिए तब मंदिर में लगभग 50 हजार बच्चे-बूढ़े और महिलाएं मौजूद थे, जिन सभी का गजनवी की सेना ने रक्त बहा दिया और मंदिर परिसर को खून से लाल कर दिया। वहीं गजनवी यहां की सारी अकूत संपत्ति लूटकर ले गया।

खिलजी और सल्तनत काल के दौरान वर्ष 1297 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां और बाद में मुजफ्फरशाह व अहमद शाह ने बार-बार इस आस्था के केंद्र को चोट पहुंचाई।

इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद 1665- 1706 ईस्वी के दौरान मुगल बादशाह औरंगजेब की क्रूरता शुरू हुई। औरंगजेब ने इसे दो बार तोड़ने का आदेश दिया। जब उसने देखा कि लोग खंडहरों में भी पूजा करने आ रहे हैं, तो उसने वहां कत्लेआम करने के लिए सेना भेज दी।

इन विधर्मियों के आक्रमणों से भगवान सोमनाथ के मंदिर का बार-बार विध्वंस हुआ और बार-बार हिंदुओं की आस्था को चोट पहुंचाई गई। इस मंदिर का जब-जब विध्वंस हुआ, तब-तब भारतीय राजाओं ने इस आस्था के केंद्र को पुन: खड़ा किया।

इनमें मालवा के राजा भोज, गुजरात के राजा भीमदेव और बाद में मराठों ने इसका पुनर्निर्माण किया। जब भारत का एक बड़ा हिस्सा मराठों के पास आया, तो इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने मूल स्थान के पास ही पूजा के लिए वर्ष 1783 में एक नया सोमनाथ मंदिर बनवाया।

आजादी के बाद, सरदार वल्लभभाई पटेल ने वर्ष 1950 में समुद्र का जल हाथ में लेकर इस मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरम्भ भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और पहली दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

आधुनिक सोमनाथ मंदिर कैलाश महामेरू प्रासाद शैली में निर्मित है। सोमनाथ मंदिर हमें सिखाता है कि सत्ताएं बदलती हैं, सेनाएं आती-जाती हैं, लेकिन श्रद्धा और सत्य को कभी मिटाया नहीं जा सकता।› आज सोमनाथ मंदिर अपनी पूरी दिव्यता के साथ खड़ा होकर भारत के गौरवशाली अतीत की गवाही दे रहा है।

1948 में प्रभासतीर्थ, ‹प्रभास पाटण› के नाम से जाना जाता था। यह जूनागढ़ रियासत का मुख्य नगर था। मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा, लेकिन सन् 1026 में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खण्डित किया, वह वही आदि शिवलिंग था। बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनवी सन् 1026 में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था। मूल मंदिर स्थल पर ही नवीन मंदिर स्थापित है।

पुरातत्व विभाग के उत्खनन में प्राप्त ब्रह्मशिला पर ज्योतिर्लिंग स्थापित किया गया है। दक्षिण में समुद्र के किनारे स्तंभ है। उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है। इस स्तम्भ को बाणस्तम्भ कहते हैं। मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर है।

यहां उल्लेखनीय है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन से दूरी बनाई थी। वे नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति या संवैधानिक पद पर बैठा कोई व्यक्ति धार्मिक आयोजन से जुड़े। उन्होंने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर सलाह दी कि इस उद्घाटन से जुड़ना ठीक नहीं है।

हालांकि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की सलाह नहीं मानी और समारोह में शामिल हुए। सरदार पटेल के संकल्प से समुद्र तट पर निर्मित भगवान सोमनाथ का मंदिर हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। सरदार पटेल के करकमलों से हिंदुओं का गौरव लौटा और जिसे अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऊंचे गगन तक ले जा रहे हैं।

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