भोपाल से लिखी जा रही इंदौर की किस्मत
KHULASA FIRST
संवाददाता

मनोज खांडेकर वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर की वर्तमान बेबसी को समझने के लिए कुछ ‘घंटे’ नहीं, बल्कि लाखों घंटे पीछे मुड़कर इतिहास के पन्नों को देखना होगा। आज जो संकट खड़ा है, उसकी नींव बाबरी विध्वंस के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल में रखी गई। पटवा सरकार की बर्खास्तगी के बाद जब चुनाव हुए, तो प्रदेश की सत्ता पर ‹पंजे› की पकड़ मजबूत हुई लेकिन इंदौर में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया।
शहर की सभी आठों सीटों पर ‹कमल› खिलते ही इंदौर के मुरझाने की शुरुआत हो गई। भोपाल की सत्ता से इंदौर का सीधा संपर्क टूटा और प्रदेश के सबसे मजबूत शहर की राजनैतिक उल्टी गिनती शुरू हो गई।
फिर आया 1998 का वह दौर, जब नतीजों से पहले ही भाजपा नेता मंत्री पद बांट रहे थे लेकिन पासा पलटा और दिग्विजय सिंह फिर सत्तासीन हुए। यह कार्यकाल कांग्रेस के आंतरिक संघर्ष का गवाह बना, जहां क्षेत्रीय संतुलन के लिए जमुनादेवी और सुभाष यादव जैसे दिग्गजों को उपमुख्यमंत्री तो बनाया गया, लेकिन एक ‹चतुर राजनेता› ने सत्ता के सूत्र अपने हाथ में रखने का नया प्रयोग किया।
मंत्रियों और कद्दावर नेताओं को दरकिनार कर सीधे कलेक्टर और एसपी को ‹पॉवर› दे दिया। नेताओं का रसूख कागजों तक सिमट गया। असली हुकूमत अफसरों के हाथ आ गई। अधिकारी वही करने लगे जो भोपाल से तय होता था।
इंदौर प्रदेश की ‘सोने की चिड़िया’ है, भला इसे कौन अपने हाथ से जाने देता? भोपाल ने इंदौर को रिमोट कंट्रोल से चलाना शुरू किया। 1999 के पहले प्रत्यक्ष महापौर चुनाव में एक दिलचस्प खेल हुआ। भाजपा ने कैलाश विजयवर्गीय को मैदान में उतारा, तो दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी के बजाय सुरेश सेठ को समर्थन देकर खेल को ‹फ्री फॉर ऑल› बना दिया।
यहीं से विजयवर्गीय और दिग्विजय सिंह के बीच वह प्रगाढ़ राजनैतिक केमेस्ट्री शुरू हुई, जिसने भविष्य की राजनीति तय की। आलम यह था कांग्रेसी खुद कहने लगे थे विजयवर्गीय की शिकायत का कोई लाभ नहीं, क्योंकि उनका ‹तालमेल› सीधे सत्ता के शिखर से है।
अफसरशाही को टूल बनाने का काम दिग्विजय सिंह ने शुरू किया। उन्होंने जिला सरकार की अवधारणा दी तो दूसरे अपने पास कोई विभाग नहीं रखा लेकिन नौकरशाही पर इतना कठोर नियंत्रण था कि राजधानी से लेकर जिलों तक पत्ता भी उनके बिना नहीं हिलता था।
कलेक्टर और एसपी सीधे मुख्यमंत्री से निर्देश लेते थे। किसी स्थानीय राजनेता की अहमियत तय होती भी थी तो दिग्विजय सिंह के इशारे के बाद या उनके इशारे पर ही। ऐसे नेताओं में इंदौर के महेश जोशी और रीवा के श्रीनिवास तिवारी जैसे दिग्गज शामिल थे।
दिग्विजय सिंह के इसी ‘सत्ता के विकेंद्रीकरण’ के छलावे ने इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय को असीमित शक्ति दे दी। दिग्विजय सिंह ने जो ‘अधिकारी-राज’ शुरू किया था, शिवराज सिंह चौहान ने उसे खत्म करने के बजाय और खाद-पानी दिया। नतीजा हुआ पिछले 20 साल से इंदौर के नेता ‘शोले के ठाकुर’ बनकर रह गए हैं।
दिखने में कद्दावर, लेकिन हाथ (अधिकार) कटे हुए। जिस ‘अफसरशाही’ और कांग्रेसी नेताओं की ‘बेबसी’ का इस्तेमाल कर कैलाश विजयवर्गीय ने अपनी ऊंचाई तय की थी, आज विडंबना देखिए खुद को उसी सिस्टम का शिकार बता रहे हैं।
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