स्वच्छता का ताज और नागरिक सुविधाओं का पतन इंदौर का विरोधाभास
KHULASA FIRST
संवाददाता

चंचल गुप्ता वरिष्ठ एडवोकेट खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पिछले आठ वर्षों से स्वच्छता सर्वेक्षण में ‘नंबर वन’ आना इंदौर के लिए गर्व होना चाहिए था। यदि यह उपलब्धि शहर के समग्र प्रशासनिक स्वास्थ्य, नागरिक सुविधाओं और संवैधानिक जिम्मेदारियों के साथ कदमताल करती। दुर्भाग्यवश, आज यथार्थ इससे उलट दिखता है। स्वच्छता का तमगा ढाल बन चुका है-ऐसी ढाल, जिसके पीछे निगम प्रशासन, अधिकारी-कर्मचारी व कई जनप्रतिनिधि मूलभूत समस्याओं से मुँह मोड़ते नजर आते हैं।
स्वच्छता की आड़ में प्रशासनिक उदासीनता- यह धारणा लगातार मजबूत होती जा रही है कि नंबर वन का ठप्पा बाकी सभी कमियों को ढक देगा। इसी आत्मतुष्टि ने मनमानी को जन्म दिया है। आए दिन फुटपाथ पर आजीविका चलाने वाले गरीब दिहाड़ी व्यापारियों के ठेले तोड़े जाते हैं, सामान नष्ट किया जाता है, जबकि कानूनन नोटिस, वैकल्पिक व्यवस्था और पुनर्वास की प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता।
इससे मानवीय संवेदनाएं और संवैधानिक गरिमा दोनों आहत होती हैं। ऐसी कार्रवाइयों के वीडियो देश-दुनिया में वायरल हो चुके हैं, जो इंदौर के तथाकथित ‘स्वच्छता मॉडल’ पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
बुनियादी ढांचे की बदहाली- सड़कें और जलभराव: बारिश के मौसम में गड्ढे और जलजमाव आम हो चुके हैं। दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं, यातायात बाधित होता है और आपात सेवाएं प्रभावित होती हैं।
ट्रैफिक प्रबंधन: अव्यवस्थित पार्किंग, अतिक्रमण और कमजोर प्रवर्तन ने यातायात को अराजक बना दिया है।
पेयजल की गुणवत्ता: कई क्षेत्रों में गंदे पानी की आपूर्ति की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जो सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर संकट है।
भ्रष्टाचार और विश्वास का क्षरण\- समय-समय पर सामने आने वाले घोटाले, अनियमितताएं और बिना नंबर प्लेट के निगम वाहन प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। जब कोई संस्था जनता द्वारा ‘नरक निगम’ या ‘पीली गैंग’ जैसे उपनामों से पुकारे जाने लगे, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सार्वजनिक विश्वास टूट चुका है।
भागीरथपुरा कांड: मॉडल की साख पर आघात- भागीरथपुरा की घटना ने इंदौर के स्वच्छता मॉडल की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचाया। यह स्पष्ट करता है कि यदि चमकदार रैंकिंग के पीछे ज़मीनी निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर हो, तो एक घटना पूरी कहानी बदल सकती है।
निष्कर्ष- स्वच्छता का ताज तभी सार्थक है, जब शहर रहने योग्य, सुरक्षित और न्यायपूर्ण हो। इंदौर को ‘नंबर वन’ के तमगे से आगे बढ़कर नागरिक गरिमा, कानून के राज और बुनियादी सुविधाओं में भी अव्वल बनना होगा। अन्यथा, तमगे की चमक के पीछे छिपे दाग एक दिन शहर की पहचान पर स्थायी धब्बा छोड़ देंगे।
जिम्मेदारी किसकी?
नगर निगम प्रशासन और जनप्रतिनिधि—दोनों की।
महापौर और परिषद की जिम्मेदारी है नीति-निर्देशन और निगरानी।
पार्षदों का कर्तव्य है वार्ड स्तर पर समस्याओं का समाधान।
अधिकारी-कर्मचारियों को कानूनसम्मत, मानवीय और निष्पक्ष कार्यवाही सुनिश्चित करनी चाहिए।
समाधान: तमगे से आगे की राह
स्वच्छता के साथ सड़क, पानी, ट्रैफिक और पुनर्वास जैसे सेवा-गुणवत्ता सूचकांक अनिवार्य हों।
फुटपाथ व्यापारियों के लिए मानवीय प्रवर्तन नीति लागू हो।
इन्फ्रास्ट्रक्चर का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट हो।
सभी निगम वाहनों पर नंबर प्लेट, GPS ट्रैकिंग और सार्वजनिक डैशबोर्ड अनिवार्य हों।
नागरिक भागीदारी, सोशल ऑडिट और भ्रष्टाचार पर कठोर प्रहार किया जाए।
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