श्रम की पवित्रता और सामाजिक समरसता का इंदौर मॉडल: इंदौर की रगों में संत रविदास; वैचारिक एकात्मता का संगम, स्वच्छता की सिद्धि और ‘मन चंगा’ का मंत्र
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सदा निरासा माहि इक आसा, तूं समरथु मैं तेरा दासा।’ भक्ति और सामाजिक सुधार के अग्रदूत संत रविदास की इस पंक्ति का अर्थ है- “जीवन की घोर निराशाओं और दुखों के बीच भी हे प्रभु! आप ही मेरी एकमात्र आशा हैं।
आप हर कार्य को करने में सक्षम, यानी सर्वशक्तिमान हैं और मैं आपका विनम्र सेवक हूं।’ यहां संत रविदास समझा रहे हैं कि जब इनसान संसार से निराश हो जाता है, तब ईश्वर पर उसका विश्वास ही उसे संबल देता है।
सिक्खों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देवजी ने जब आदिग्रंथ (गुरु ग्रंथ साहिब) का संपादन किया, तो उन्होंने संत रविदास की वाणी को वही स्थान दिया, जो अन्य महान गुरुओं को प्राप्त था। मध्यकाल के महान संत नाभादास ने अपनी रचना ‘भक्तमाल’ में लिखा था- “रविदास खलु जग विदित, हरि पद भजहिं अनन्य गति।’ अर्थात् रविदासजी इस संसार में प्रसिद्ध हैं और उनकी भक्ति अनन्य है।
ऐसे ही संत रविदास अथवा संत रैदास की जयंती आज पूरी श्रद्धा से मनाई जा रही है। माघ पूर्णिमा का यह दिन भक्ति आंदोलन के इस महान संत की समानता, करुणा और सामाजिक न्याय की शिक्षाओं को विनम्रता से याद करने का दिन है।
भक्ति और सामाजिक सुधार के अग्रदूत संत रविदास की जयंती रविदासिया धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण त्योहार है। अनेक राज्यों में इस दिन अवकाश भी रहता है। यह दिन संत रविदास की सीख के अनुसार समानता के संदेश के साथ मनाया जाता है
काशी से इंदौर तक श्रद्धा का सेतु
अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे कि इंदौर की धरती पर संत रविदास के आगमन का उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन स्वच्छता कर्मयोगियों अथवा सफाई मित्रों के श्रम और पसीने की बदौलत लगातार आठ बार देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की तासीर हमेशा से समरसता की रही है।
यही वजह है कि काशी के इस संत की गूंज इंदौर सहित मालवा के कण-कण में सुनाई देती है। काशी, यानी वाराणसी के गोवर्धनपुर गांव में स्थापित संत रविदास की 5 टन वजनी व 25 फीट ऊंची धातु प्रतिमा को इंदौर के कलाकार महेंद्र कोडवानी ने बनाया है। एक साल में दस अन्य कलाकारों के सहयोग से बनी इस प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 में किया।
एक रोचक प्रसंग भी पढ़ लीजिए
कहा जाता है कि एक बार कुछ लोग गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। उन्होंने संत रविदास से भी चलने का आग्रह किया। संत रविदास ने विनम्रता से मना कर दिया। इसका कारण यह है कि उन्होंने किसी को जूते समय पर बनाकर देने का वचन दिया था।
जब लोगों ने जोर दिया, तो उन्होंने अपनी वह ‘कठौती’ (लकड़ी का बर्तन, जिसमें वे चमड़ा भिगोने के लिए पानी रखते थे) उठाई और कहा- “मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ मान्यता है कि उनकी अटूट श्रद्धा के कारण उस छोटी-सी कठौती के जल में ही मां गंगा ने उन्हें दर्शन दे दिए थे।
संत रविदास ने सिखाया कि कर्म ही पूजा है। एक चर्मकार के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने जिस गरिमा के साथ ईश्वर को पाया, वह आज के ‘स्टार्टअप और वर्क कल्चर’ वाले इंदौर के लिए प्रेरणा है। यह बताता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, जब उसे ईमानदारी से किया जाए।
शहर के ‘रविदासिया समाज’ और ‘कबीर पंथियों’ के बीच का गहरा संबंध इस शहर की आध्यात्मिक बुनावट का अहम हिस्सा है। संत रविदास की शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी भक्ति आंदोलन के दौर में थीं। श्रम की गरिमा, समानता का भाव और मन की शुचिता- ये मूल्य किसी एक काल या वर्ग तक सीमित नहीं हैं।
इंदौर जैसे कर्मप्रधान और सेवाभाव से जुड़े शहर में संत रविदास की ‘बेगमपुरा’ की कल्पना आज भी जीवंत दिखती है। यहां इनसान को उसके कर्म से पहचाना जाता है, न कि उसकी पहचान से। यही संत रविदास का संदेश है और यही समाज की सच्ची समृद्धि का आधार भी।
जीवित है ‘बेगमपुरा’ की परिकल्पना
संत रविदास ने एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की थी, जिसे उन्होंने ‘बेगमपुरा’ कहा। एक ऐसा शहर, जहां ‘गम’ यानी दु:ख न हो। अपनी स्वच्छता और सेवाभाव के लिए विश्वविख्यात यह शहर भी संत रविदास के इसी आदर्श को चरितार्थ करता है।
शहर के विजय नगर, रुस्तम का बगीचा, रविदास नगर के साथ अन्य इलाकों में संत रविदास के मंदिर सामाजिक समानता के जीवंत केंद्र हैं। रविदास जयंती पर यह शहर भी चल समारोह के साथ विविध आयोजनों का उत्साह और श्रद्धा से साक्षी बनता है। सदियों पहले गंगा के घाटों पर गूंजा- “मन चंगा तो कठौती में गंगा’ भी इसी के साथ सार्थक होता है।
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