खबर
Top News

महाकाल के दरबार में ‘जन’ आखिरी कतार में: दर्शन में भेदभावट; सुप्रीम कोर्ट का नहीं मिला साथ, वीआईपी दर्शन का फैसला कलेक्टर के ही हाथ

KHULASA FIRST

संवाददाता

28 जनवरी 2026, 8:18 पूर्वाह्न
202 views
शेयर करें:
महाकाल के दरबार में ‘जन’ आखिरी कतार में

गर्भगृह में वीआईपी व रसूखदारों का बना रहेगा सत्कार, जनसामान्य की महाकाल से दूरी बरकरार

‘प्रजा' नहीं कर पाएगी ‘राजा' के विग्रह को स्पर्श, ये अधिकार सिर्फ खास लोगों को ही

सुप्रीम कोर्ट ने महाकालेश्वर मंदिर में ‘वीआईपी दर्शन' व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका की खारिज

वीआईपी व सामान्य श्रद्धालुओं के बीच भेदभाव के खिलाफ कोर्ट से लगाई थी गुहार, कोर्ट ने कहा- ये हमारा विषय नहीं

लंबे समय से गर्भगृह में जनसामान्य के प्रवेश पर लगी हुई है रोक, वीआईपी बिरादरी का प्रवेश, पूजन-दर्शन बदस्तूर जारी

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सूबे के मुखिया के गृहनगर में आम और खास के बीच का अंतर पट नहीं सका। ये अंतर श्री महाकालेश्वर मंदिर में स्थापित कर दिया गया है। ये प्रदेश व अंचल आए दिन वीआईपी के नाम पर दर्शन के दो स्वरूप देख रहा है।

एक दर्शन में दर्शनार्थी इष्टदेव के विग्रह को मल-मल के स्नान करा रहा है और एक दर्शनार्थी धक्के खाते हुए 50 फीट दूर से लोटे के जल को पाइप में डाल रहा है।

एक दर्शनार्थी भगवान का सामीप्य पा रहा है तो दूजा धकियाया जा रहा है। एक दर्शनार्थी कान में मंत्र फूंक रहा है तो दूसरे की फजीहत पर व्यवस्था कान ही नहीं धर रही।

सरेआम हो रहा ये भेदभाव जनसामान्य को असहज ही नहीं, उद्वेलित भी कर रहा है कि ये आम और खास का चलन सिर्फ सनातन की ही व्यवस्था कैसे और कब बन गया? गिरिजाघर, गुरुद्वारा, इबादतगाह आदि में तो सब श्रद्धालु एक समान होते हैं। वे भी, जो सिर्फ मंदिर में आते ही वीआईपी हो जाते हैं।

ऐसे वीआईपी मंदिर के अलावा अन्य धर्मों के उपासना स्थल पर एक कतार में ही दर्शन करते हैं। उम्मीद की एक किरण माननीय न्यायालय से थी कि वह दूध का दूध और पानी अलग कर देगा, लेकिन उसने इनकार कर दिया। अब उम्मीद सूबे के मुखिया से है।

उज्जैन उनका गृहनगर है। व्यवस्था सरकारी है। लिहाजा अब ‘सरकार' ही ये वीआईपी ‘सत्कार' पर रोक लगा सकती है। कोर्ट ने भी ये ही कहा है कि ये हमारे दखल का नहीं, मंदिर प्रशासन का मामला है। मृत्युंजय भगवान महाकाल राजा के दरबार में जनसामान्य आखिरी कतार में ही बना रहेगा।

उसे दूर से ही अपने इष्टदेव को निहारना होगा, जबकि वीआईपी व रसूखदार तबके की प्रभु से निकटता बरकरार रहेगी। ये तबका न सिर्फ गर्भगृह में प्रवेश करेगा, बल्कि पूजन, दर्शन, विग्रह स्पर्श व अभिषेक वर्तमान के हिसाब से करता रहेगा।

विश्वप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में आम श्रद्धालुओं और वीआईपी के बीच का ये ‘सरकारी भेदभाव' फिलहाल तो दूर नहीं होगा। इस भेदभाव को दूर करने की जिस चौखट से जन-जन को ‘सर्वोच्च न्याय' की आस थी, उस दर से जनसामान्य की ये गुहार दरकिनार कर दी गई कि हमें भी तो हमारे इष्टदेव का सामीप्य प्राप्त हो।

न्याय की गुहार ये कहकर दुत्कार दी गई कि आज प्रवेश, कल मंत्र के हक की मांग शुरू हो जाएगी। क्या सभी मौलिक अधिकार गर्भगृह के अंदर ही लागू किए जाएंगे? बड़ी अदालत ने उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

इसमें मांग की गई थी कि मंदिर के गर्भगृह में दर्शन व पूजा के लिए वीआईपी और सामान्य श्रद्धालुओं के बीच कोई भेदभाव न हो। सभी को समान अवसर मिले। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान साफ किया इस तरह के विषय अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते।

जो प्रशासन चला रहे हैं, वे इस पर फैसला लें। हम केवल न्यायिक योग्यता से जुड़े सवाल देखते हैं। सुनवाई के दौरान सीएजेआई ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा महाकाल के सामने कोई वीआईपी नहीं होता। याचिका पर वकील विष्णुशंकर जैन ने पैरवी की।

‘प्रजा' अपने ‘राजा' से दूर ही रहेगी, कायम रहेगा वीआईपी कल्चर

‘प्रजा' की अपने ‘राजा' से दूरी बरकरार रहेगी। नेता, अफसर, मंत्री, संतरी व धन्नासेठों का भगवान के समक्ष ‘भगवान' सा ‘ट्रीटमेंट' उस दरबार में अनवरत जारी रहेगा, जो देवों का देव हैं। भक्त और भगवान के बीच की ऊंच-नीच का ये चलन अब प्रचलन में कर दिया गया है।

माननीय न्यायालय ने भी ये कहकर अपने हाथ झटक लिए कि ये मंदिर प्रशासन से जुड़ा विषय है और उसी के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किसे वीआईपी माने और किसे सामान्य। मामला ज्योतिर्लिंग नगरी उज्जयिनी का है। यहां स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में बीते कुछ बरस से जनसामान्य को गर्भगृह से दूर कर दिया गया है।

आमजन की भी ये उत्कट इच्छा बनी हुई है कि उसे भी भले ही प्रतिदिन नहीं, लेकिन सप्ताह के कुछ चुनिंदा दिनों में पूर्व की तरह गर्भगृह में प्रवेश मिले। कोरोनाकाल के पूर्व ये व्यवस्था थी। सोमवार व शनिवार-रविवार और उत्सव-त्योहार के दिन छोड़कर आमजन का गर्भगृह में प्रवेश होता रहा है।

ये व्यवस्था दशकों से थी, लेकिन महाकाललोक के अस्तित्व में आने के बाद से सामान्यजन का गर्भगृह में प्रवेश व पूजन-अर्चन पूरी तरह रोक दिया गया। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित अथॉरिटी के समक्ष अपील का अधिकार दिया है।


संबंधित समाचार

टिप्पणियाँ

अभी कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी करें!