बड़ा सराफा में धड़ल्ले से अवैध निर्माण: मामला जगदीश भवन का; सारे नियम रखे ताक में, नगर निगम की भूमिका पर भ्रष्टाचार की आशंका
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सराफा क्षेत्र में अवैध निर्माण का मामला गहराता जा रहा है। शक्कर बाजार क्षेत्र स्थित धरोहर मार्ग पर नियमों को ताक में रख जिस तरह से निर्माण कार्य चल रहा है, उसने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 44, बड़ा सराफा स्थित ‘जगदीश भवन’ में बेखौफ हो रहा व्यावसायिक निर्माण भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
नगर निगम ने कैसे दी हरी झंडी?
एफएआर की सीमा 1.50, स्वीकृत किया 1.83! दस्तावेजों के अनुसार सुजाता जैन पति मधु कुमार जैन भूखंड क्रमांक 45 (पुराना 44), बड़ा सराफा, राजमोहल्ला जोन क्रमांक 2, वार्ड क्रमांक 69 में वाणिज्यिक उपयोग हेतु निर्माण की अनुमति दी गई। नियमानुसार अनुमेय एफएआर 1.50 है, वहीं स्वीकृत नक्शे में कंज्यूम्ड एफएआर 1.830 दर्ज किया गया है। यानी साफ तौर पर नियमों से अधिक निर्माण को हरी झंडी दे दी गई।
कानून की खुली अवहेलना या ‘सेटिंग’ का खेल?
शक्कर बाजार क्षेत्र विरासत भवनों के कारण धरोहर मार्ग घोषित है। इसके बावजूद यहां प्लॉटों का संयुक्तिकरण कर बहुमंजिला व्यावसायिक भवन खड़ा किया जा रहा है। खुलासा फर्स्ट पहले ही इस अवैध संयुक्तिकरण का खुलासा कर चुका है, जिसमें एक प्लॉट श्रीनाथ एंटरप्राइजेस (भागीदार श्रेय जैन) से जुड़ा बताया गया था। अब दूसरे प्लॉट के दस्तावेज सामने आने से यह साबित हो गया है कि नियमों के विरुद्ध प्लॉट मर्जिंग कर निर्माण को वैध दिखाने की कोशिश की गई।
छोटा भूखंड, बहुमंजिला व्यावसायिक निर्माण
महज 150.90 वर्गमीटर के भूखंड पर चार मंजिला व्यावसायिक भवन (ग्राउंड + 3 फ्लोर) की अनुमति दी गई है। इतने छोटे प्लॉट पर इस स्तर का निर्माण न सिर्फ नियमों के विपरीत है, बल्कि यातायात, अग्नि सुरक्षा और आसपास की संरचनाओं के लिए भी बड़ा खतरा है।
दान की जमीन, फिर भी करोड़ों का सौदा!
सूत्रों के मुताबिक यह भूमि मूल रूप से पूजा-पाठ हेतु पुजारी परिवार को दान में दी गई थी, जिसे कानूनन बेचा नहीं जा सकता। इसके बावजूद कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर जमीन का सौदा किए जाने के आरोप सामने आए हैं।
बताया जा रहा है कि यह संपत्ति अविनाश शास्त्री और उनके परिवार से लगभग 40 करोड़ रुपए में खरीदी गई। करीब 30 करोड़ रुपए अविनाश शास्त्री को, शेष राशि परिवार के अन्य सदस्यों को दी गई। सौदे की शर्तों के अनुसार भवन से जुड़े सभी कानूनी विवाद नए खरीददारों के जिम्मे थे।
पुराने बाजार क्षेत्र में भारी निर्माण, खतरे की घंटी
बड़ा सराफा इंदौर के अत्यंत संकरे और भीड़भाड़ वाले बाजार क्षेत्रों में गिना जाता है। ऐसे इलाके में न्यूनतम फ्रंट एमओएस 2.00 मीटर, रियर एमओएस मात्र 1.50 मीटर रखकर बहुमंजिला कमर्शियल निर्माण को मंजूरी देना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा है।
पगड़ी-पैठे खत्म, रास्ता साफ
निर्माण शुरू करने से पहले वर्षों से पगड़ी-पैठे के आधार पर व्यापार कर रहे दुकानदारों को अलग-अलग रकम देकर हटाया गया। यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि निर्माण से पहले हर अड़चन योजनाबद्ध तरीके से हटाई।
निगम की चुप्पी संदेह बढ़ा रही: शहर के सामाजिक संगठनों और व्यापारियों ने मांग की है कि मामले की स्वतंत्र जांच हो, दोषी अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई हो, अवैध अनुमति तत्काल निरस्त की जाए, भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच एजेंसी स्वयं संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करें।
सवाल अब भी कायम
क्या धरोहर क्षेत्रों में नियम सिर्फ दिखावे के लिए हैं? { क्या करोड़ों के सौदे के आगे कानून बौना पड़ गया? { क्या नगर निगम में एफएआर उल्लंघन अब रूटीन प्रोसेस बन चुका है? { नगर निगम की चुप्पी इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार की आशंका को और गहरा रही है।
अफसरों की भूमिका संदिग्ध
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एफएआर सीमा से अधिक निर्माण साफ दर्ज है, स्पेशल एफएआर केस नहीं है, इलाका धरोहर और अति-संवेदनशील है, तो किसके दबाव में अनुमति दी गई? क्या यह तकनीकी मिलीभगत, कागजी खानापूर्ति या फिर भारी लेन-देन के बाद मिली ‘क्लीन चिट’ है?
नियमों का ‘गला घोंटकर’ जारी की अनुमति
मप्र भूमि विकास नियम 2012 की खुली अवहेलना करते हुए जिन नियमों का पालन अनिवार्य था, उनकी शर्तें कागजों तक सीमित रह गईं- अग्निशमन अनुमति, पार्किंग प्रावधान, स्ट्रक्चर इंजीनियर की निगरानी, पौधारोपण, ऑनलाइन निरीक्षण सूचना सब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए।
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