‘चमड़े के सिक्के’ चलाने वाले 'भाई साहब’ आखिर कब तक: ‘कैलाश' की भोपाल ‘समिधा’ में दस्तक; इंदौर सुदर्शन में एक्शन
KHULASA FIRST
संवाददाता

आरएसएस की शीर्ष नहीं, टोली बैठक में ही हो गया रवानगी का फैसला
संगठन मंत्री के सत्ता में लगातार बढ़ते दबाव-प्रभाव से त्रस्त हो गए थे प्रदेश अध्यक्ष से लेकर सीएम तक
प्रदेश इकाई के बाद अब निगम, मंडल, प्राधिकरण की नियुक्तियों में भी बना था दबाव-दखल, इसलिए टल रही थीं घोषणाएं
सत्ता-संगठन, नेता-कार्यकर्ता के बीच समन्वय की जगह गुटबाजी को बढ़ावा देने के भी लग रहे थे आरोप, इंदौर उदाहरण बना
बिदाई तो तय थी, पर ऐसी रवानगी की उम्मीदें न थीं, नए संगठन मंत्री की तैनाती के बिना ही कट गया ‘रिटर्न टिकट’
पूर्व संगठन मंत्री सी ही गति को प्राप्त हुए मौजूदा संगठन मंत्री भी, दायित्व, वही जबलपुर बना ठिकाना
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आरएसएस की तरफ से भाजपा को आखिर कब तक ऐसे ‘भाई साहब’ मिलते रहेंगे, जो पार्टी में ‘चमड़े के सिक्के’ चलन में लाएंगे ? क्या ‘मातृ संस्था’ के पास अपनी राजनीतिक शाखा के लिए ऐसे कोई ‘भाई साहब’ बचे नहीं, जो भाजपा में जाने के बाद दायित्व के अनुकूल कर्म करें?
संघ की रीति के अनुकूल संगठन मंत्री का दायित्व भाजपा में सत्ता व संगठन और नेता व कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की बजाय सत्ता में हिस्सेदारी का कब से हो गया? आरएसएस की नजर से ये छुपा थोड़े ही है कि संगठन मुखिया की सत्ता में हिस्सेदारी की ये ललक, लाड़ के नेताओं को ‘आउट ऑफ ऑर्डर’ प्रमोट कर रही है।
ऐसे प्रमोशन से पार्टी के लिए बरसों से ‘मर-खप’ रहे कार्यकर्ता-नेता के हक पर संघ की आड़ में एक तरह से सरेआम डाका है, जहां पराक्रम नहीं, ‘भाई साहब’ की परिक्रमा व प्रदक्षिणा ही अहमियत रखती है। बीते कुछ सालों से सत्ता वाली भाजपा में ये विकृति तेजी से घर कर गई।
अन्यथा इस प्रदेश ने ऐसे संगठन मंत्री भी देखे हैं, जिनके लिए आरएसएस की गाइड लाइन ही सब कुछ रहती थी। मौजूद संगठन मंत्री की बिदाई के बाद क्या ये उम्मीद करें कि अब मातृ संस्था भाजपा को कम से कम ऐसा ‘भाई साहब’ तो न देगी जो पार्टी में मोहम्मद बिन तुगलक की तरह अच्छी मुद्रा को परे रख, चमड़े के सिक्के को चलन में लाए।
‘समिधा’ में एंट्री, ‘सुदर्शन’ से ‘एक्जिट’
संगठन मंत्री की बिदाई क्या आरएसएस के भोपाल दफ्तर समिधा से जुड़ी है?, ये सवाल ‘कोपभवन’ में मौन होकर बैठे, अब पुनः मुखर हो चुके मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की ‘समिधा’ की ‘एंट्री’ से उपजा है। बताते हैं कि ये एंट्री भी दो-चार दिन पूर्व की है।
विजयवर्गीय ‘समिधा’ गए थे। गए तब किसी को भी खबर नहीं थी, लेकिन दफ्तर से बाहर आते कैमरे की जद में आ गए। मंत्री विजयवर्गीय क्यों गए थे और किससे मिलने? इसका खुलासा तो नहीं हुआ, लेकिन मंत्री विजयवर्गीय के गृह नगर इंदौर की टोली बैठक में बताते ये संगठन मुखिया की घर वापसी का फैसला हुआ।
सूत्र बताते हैं कि ये तुरत-फुरत छोटी बैठक आरएसएस के मालवा प्रांत मुख्यालय सुदर्शन में हुई। अब इस बात में कितना दम है, इसका खुलासा तो होने से रहा, लेकिन अगर इसे संयोग भी माना जाए तो विजयवर्गीय की समिधा मुलाकात के बाद अकस्मात संगठन शीर्ष पर बिना किसी की तैनाती के वर्तमान मुखिया की बिदाई होना हैरतभरा तो है। खासकर भाजपा की मान्य परिपाटी व संघ की रीति-नीति के तहत।
आ खिरकार प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री की अकस्मात व असमय बिदाई हो ही गई। समय तो विदाई का तय था, क्योंकि दायित्व को संभाले 4-5 बरस होने आए थे और नए प्रदेश संगठन के अस्तित्व में आने के बाद समकालीन सभी दायित्ववान नेता हट चुके थे।
बस संगठन मंत्री ही बने हुए थे। लिहाजा रवानगी तो तय थी, लेकिन ये रवानगी आरएसएस की टोली बैठक में तय होगी, इसकी किसी को भी उम्मीद न थी। आमतौर पर इस स्तर पर फेरबदल के फैसले आरएसएस की शीर्ष यानी बड़ी संगठनात्मक बैठकों में लिए जाते रहे हैं, लेकिन मौजूदा संगठन मंत्री की घर वापसी का निर्णय टोली बैठक में तय हो जाना कई सवाल खड़े कर रहा है।
उम्मीद तो ये भी नहीं थी कि मंत्री महोदय को ‘घर’ ही बुला लिया जाएगा। आस थी कि पार्टी स्तर पर ही कोई प्रमोशन होगा, लेकिन मौजूदा संगठन मंत्री भी उसी गति को प्राप्त हुए, जो उनके पूर्ववर्ती संगठन मंत्री को मिली थी। वही दायित्व, वही जबलपुर।
पूर्ववर्ती संगठन मंत्री पर भी अपने ‘भगतों’ के लिए जिद का नुकसान उठाना पड़ा था, मौजूदा पर भी अपने ‘हित’ को साधने का आरोप लगा। सत्ता-संगठन, नेता-कार्यकर्ता के बीच समन्वय की जगह गुटबाजी को बढ़ावा देने के भी आरोप लग रहे थे। इंदौर इसका उदाहरण बना।
आखिरकार सत्ता व संगठन कितना व कब तक संगठन मंत्री का दबाव-प्रभाव-दखल स्वीकारता? नए प्रदेश अध्यक्ष व पुराने सीएम, दोनों ही त्रस्त हो चुके थे। प्रदेश इकाई में ये दबाव व दऱ्ल साफ झलका। प्रदेश अध्यक्ष को अपनी ही टीम चुनने की वो स्वतंत्रता नहीं मिली, जिसके वे पार्टी संविधान के हिसाब से हकदार थे।
अव्वल तो प्रदेश इकाई का गठन ही, इसलिए टलता जा रहा था कि संगठन मुखिया के मनोनुकूल नियुक्तियां न सरकार को हजम हो रहीं थी, न अध्यक्ष के गले उतर रही थीं। बावजूद इसके संघ की गरिमा का मान रखा गया और प्रदेश इकाई अस्तित्व में आई।
नई प्रदेश इकाई के दायित्वों से साफ झलका कि भाजपा में अब संगठन मंत्री नाम का भी ‘खेमा’ होने लगा है। पहले ये परिपाटी नहीं थी। प्रदेश अध्यक्ष व मुख्यमंत्री मिलकर समन्वय बनाते थे। संगठन मंत्री उस पर ठोक बजाकर मुहर लगाते थे।
कभी हुआ तो इक्का-दुक्का उनकी पसंद-नापसंद तरजीह पाती थी, लेकिन बैतूल की कार्यकारणी ने गठित होते ही तूल पकड़ लिया। प्रदेश अध्यक्ष की सहजता, सरलता व सदाशयता का बेजा इस्तेमाल इस कार्यकारिणी में साफ झलका, जो आज तक चर्चा का विषय है।
आखिरकार ये जिद क्यों कि अब प्रदेश के निगम, मंडलों व प्राधिकरणों में होने वाली नियुक्तियों में भी ‘मेरे अपने’ को तरजीह मिले? सरकार, सीएम को चलाना है, संगठन, प्रदेश अध्यक्ष को, लेकिन नियुक्तियां वे अपनी मर्जी से न कर सकें तो भावी संकट तो सत्ता व संगठन पर ही आना है न?
इसी कारण बार-बार सब कुछ तय होने के बाद भी मध्यप्रदेश में लाभ के पद पर होने वाली नियुक्तियों की तारीखें तय नहीं हो रही थीं। इंदौर भाजपा कैसे भूल सकती है इंदौर विकास प्राधिकरण की नियुक्ति? शिवराज सरकार में इस शहर के साथ ऐसा ही खेला हुआ था और इंदौर के विकास से जुड़ी संस्था की कमान बगल के देवास को सौंप दी गई।
शहर भाजपा के तमाम धुरंधर नेता मन मसोसकर रह गए। कम से कम इस बार सरकार ने अपनी रीढ़ झुकाई नहीं। अब वो कम से कम अपने हिसाब से उन नेताओं को एडजस्ट कर सकेगी, जिनके जरिये सरकार व संगठन की गति निर्बाध रूप से गतिमान रह सके।
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