हार के बाद दीदीगीरी: बंगाल में दो दिन से मन रहा जश्न बता रहा है टीएमसी से मुक्ति का उल्लास
KHULASA FIRST
संवाददाता

देश की राजनीति में ममता ने स्वयं को हास्यास्पद बनाया, इस्तीफा न देने से कोई फर्क नहीं पड़ना
हार के बाद भी सीएम पद से इस्तीफा नहीं देने की बात कर ममता ने सबको चौंकाया
बनर्जी इस्तीफा दें या न दें, कार्यकाल खत्म होते ही स्वतः हो जाएंगी पदमुक्त
भाजपा एक्शन मोड में, शुरू की सरकार बनाने की तैयारी, अमित शाह की निगरानी में बनेगा सीएम
अभी तक शुभेंदु ही नजर आ रहे हैं बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बनने के ‘अधिकारी’, शेष मोदी-शाह जानें
चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में शुरू हुआ हिंसा का दौर, टीएमसी ने जो बोया, वही काट रही, भाजपा हुई सख्त
राहुल गांधी ने फिर अलापा वोट चोरी का राग, एक तरफ केरल की जीत पर बधाई, दूसरी तरफ चुनाव प्रक्रिया पर सवाल
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
चुनावी हार के बाद दादादीरी तो बहुत बार देखी थी इस देश ने, अब पहली बार भारत ‘दीदीगीरी’ देख रहा है। जी हां, जगत दीदी, यानी ममता बनर्जी ने बंगाल की पराजय को सिरे से न सिर्फ नकार दिया, बल्कि स्वयं को अभी भी मुख्यमंत्री मानते हुए इस्तीफा देने से दृढ़ता के साथ इनकार कर दिया है। है न हास्यास्पद बात? बस, ममता बनर्जी ने भी देश-विदेश की राजनीति में अपनी स्थिति ऐसी ही हास्यास्पद कर ली।
हार पर आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं, लेकिन पराजय को स्वीकार ही नहीं करना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ठोकर में रख देने का ये विरला उदाहरण है, जो ममता ने कर दिखाया। इसे बनर्जी की दीदीगीरी करार दिया जा रहा है।
जहां एक तरफ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, केरलम के सीएम पिनराई विजयन ने अपनी व पार्टी की हार के बाद तय प्रक्रिया के तहत तुरंत इस्तीफा देकर नई सरकार का रास्ता साफ कर दिया, वहीं ममता बनर्जी ने इनकार कर न सिर्फ अपने दल, बल्कि इंडिया गठबंधन को भी हतप्रभ किया है।
भाजपा ने ममता की दीदीगीरी को उनकी मानसिक स्थिति से जोड़कर इस्तीफे प्रकरण को एक तरफ सरका दिया। पार्टी नेताओं ने इस मामले में बस ये ही कहा कि इस मामले में भारत के संविधान में सब कुछ लिखा हुआ है।
दूसरी तरफ पार्टी एक्शन मोड पर आ गई है और उसने बंगाल में अपनी पहली सरकार बनाने की तैयारियों को एकाएक तेज कर दिया है। स्वयं अमित शाह की निगरानी व मौजूदगी में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की चयन प्रक्रिया होगी। भाजपा अध्यक्ष ने शाह को पर्यवेक्षक बनाया है।
सह पर्यवेक्षक के रूप में उनके साथ ओडिशा के सीएम मोहन मांझी को जोड़ा गया है। पार्टी के सूत्रों की मानें तो 9 मई को बंगाल को नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा। इस तारीख को बंगाल अस्मिता से जुड़े गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की जयंती है और भाजपा शपथ समारोह को लेकर इससे अच्छा दिन मान नहीं रही। ऐसा कर वह बंगाल के बाशिंदों को ‘आमार बांग्ला-सोनार बांग्ला’ का साफ संदेश देना चाहती है।
बंगाल के नए मुख्यमंत्री के लिए अभी तो शुभेंदु अधिकारी के अलावा दूर-दूर तक कोई भाजपा में नजर नहीं आ रहा, लेकिन भाजपा हमेशा सीएम के मामले में चौंकाने वाली रणनीति अपनाती रहई है।
लिहाजा अभी कोई पक्के तौर पर ये कह नहीं सकता कि शुभेंदु ही सीएम पद के ‘अधिकारी’ होंगे या पार्टी इस सूबे में भी कोई नया प्रयोग करेगी। हालांकि पार्टी सूत्रों का कहना है कि शुभेंदु ही सीएम बनेंगे।
उन्होंने दो-दो बार ममता बनर्जी को हराया है। पिछली बार नंदीग्राम में और इस बार ममता के गढ़ भवानीपुर में।
शुभेंदु अधिकारी ने बीते 5 साल में अपनी छवि योगी आदित्यनाथ व हिमंता बिस्वा सरमा की तरह कट्टर हिंदू नेता के रूप में प्रांत में बना ली है। उन्हें अमित शाह का करीबी भी बताया जा रहा है। युवा वर्ग में वे काफी लोकप्रिय हैं।
अपने जुझारू मिजाज का प्रदर्शन करते हुए वे 2021 से 2026 तक बंगाल में भाजपा का एक बड़ा व निर्विवाद चेहरा बनकर उभरे हैं। अगर उनका चयन नहीं होता है तो फिर बंगाल में किसी महिला नेता के सीएम बनने की संभावना सबसे ज्यादा है, जो ममता बनर्जी की काट के रूप में माना जाएगा।
भाजपा का एक वर्ग ‘भाजपाई डीएनए’ से सीएम की चाह रख रहा है। अधिकारी भाजपा में आने से पूर्व टीएमसी में थे, लेकिन बताते हैं कि उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत आरएसएस की शाखा से ही हुई है।
जो देश और दुनिया देख रही है, वह ममता व उनकी तृणमूल कांग्रेस को शायद नजर ही नहीं आ रहा। 48 घंटे से ज्यादा हो गए पश्चिम बंगाल के चुनाव का परिणाम आए, भद्रलोक में जश्न जो है, वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा।
बंगाल के हर हिस्से में आमजन स्वस्फूर्त सड़कों पर निकलकर उत्सव जैसा उत्साह प्रकट कर रहे हैं। रंग-गुलाल उड़ रहे हैं, ढोल-ताशे बज रहे हैं। लेकिन दीदी दिल्ली में बैठकर ‘दीदीगीरी’ पर उतारू हैं।
वह हार को स्वीकार नहीं कर रहीं और जनादेश को चुराने का आरोप लगा रही हैं। वे ये देखने की कोशिश नहीं कर रहीं कि उन्हीं के बंगाल में लोग रो-रोकर खुशियां मना रहे हैं। खुशी में छलक रही आंखों से साफ बयां हो रहा है कि बंगाल ने स्वयं बदलाव चुना है, न कि ये कोई तिकड़म से हासिल किया गया जनादेश है।
जनसामान्य की सड़कों पर मुखरता व प्रफुल्लता बता रही है कि ममता के राज में राज्य छटपटाहट महसूस कर रहा था। बावजूद दीदीगीरी कायम है और इसमें राहुल गांधी जैसे नेता भी एक बार फिर शामिल हो गए, जो ‘वोट चोर-गद्दी छोड़’ नारे के साथ बिहार में दो महीने सड़कों पर धूल फांकने के बाद भी बुरी तरह हार गए थे।
टीएमसी : ‘बोए पेड़ बबूल के, आम कहां से होए’
इस सब उठापठक के बीच बंगाल में एक बार फिर चुनाव बाद हिंसा का रूप देखने को मिल रहा है। कभी ये गलत परिपाटी कम्युनिस्ट दलों की तरफ से शुरू हुई थी। इसे बाद में टीएमसी ने अपना लिया।
2021 में जैसे हमले भाजपा नेता-कार्यकर्ता-समर्थक व पार्टी दफ्तरों पर हुए थे, हूबहू वैसे ही हिंसक हमले इस बार फिर हुए हैं। हालांकि किरदार बदल गए हैं। अब टीएमसी निशाने पर है।
न सिर्फ कोलकाता, बल्कि 24 परगना, आसनसोल, मुर्शिदाबाद, मालदा आदि जगहों से हिंसा की खबरें आती जा रही हैं। अब तक 3 हत्या भी हो चुकी है। मारे जाने वालों में टीएमसी समर्थक के अलावा भाजपा नेता के भाई भी हैं।
चुनाव आयोग ने इस ओर सख्त रुख अख्तियार किया है और राज्य में तैनात सुरक्षा बलों को ऐसी घटनाओं से कड़ाई से निपटने के आदेश दिए हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने भी दो-टूक अपील जारी की है कि जो भी हिंसा में लिप्त हैं, वे भाजपाई नहीं हैं।
भाजपाई वे ही हैं, जो 29 अप्रैल व 4 मई के पहले तक पार्टी के साथ थे। अब जो जोश में आकर सड़कों पर आए हैं, वे भाजपा के नहीं हैं। टीएमसी दफ्तरों पर हो रहे हमलों को भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस की आपस की लड़ाई भी बताया है।
बावजूद इसके राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आ रही हिंसा की खबरें बता रही हैं कि लोगों में टीएमसी के स्थानीय कैडर के प्रति गहरी नाराजगी है।
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