उंगली कटाकर शहीदों में नाम लिखवाना
KHULASA FIRST
संवाददाता

चंद्रशेखर शर्मा 94250-62800 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दो दिन पहले बास्केटबॉल कॉम्लेक्स में मकबूल उपन्यासकार और मकबूल लेखक चेतन भगत को सुनने वालों में अपन भी शामिल थे। सामान्यतया ये देखा गया है कि हर दक्ष और मकबूल लेखक उतना ही दक्ष और मकबूल वक्ता नहीं होता।
अफसोस कि चेतन भगत इसके बिलकुल भी अपवाद न! अचरज तो इस बात का है कि बात कहने के लिए उनको जो टॉपिक मिला था, वो क्रिकेट की भाषा में कहें तो फ्री हिट था! फ्री हिट बोले तो आपके किए से कुछ हो न हो, लेकिन आपका कुछ भी बिगड़ने वाला न! यानी लूटने को आसमान और खोने को धेला भी न। जमा ये बात आपको आपके उस किए के पहले से पता!
तो बोलने के लिए भगत को टॉपिक मिला था कि ‘मैं भारत के लिए क्या कर सकता हूं?’ उधर, सुनने वालों में हर वय के लोग थे। अलबत्ता भगत को युवाओं को संबोधित करना सूझा और यह हर सूरत ठीक भी था। ये और बात है कि युवाओं से उन्होंने जो भी कहा वो बेसिक-सी बातें थीं, सरल थीं, लेकिन मानीखेज थीं! जी हां, जैसे उन्होंने युवाओं से कहा कि बच्चा जब पैदा होता है तो वो अपना ध्यान खुद नहीं रख सकता।
सो दूसरों को उसका ध्यान रखना पड़ता है, उसकी साज-संभाल करना होती है। लेकिन जब वो बड़ा हो जाता है तो फिर वो अपने माता-पिता, परिवार और दूसरों का वैसा ध्यान रखता है।
युवाओं से उन्होंने कहा, इसके लिए जरूरी है कि आप सबसे पहले अपनी शारीरिक और मानसिक फिटनेस को खातिर में लाएं। इस बात को और साफ करते हुए उन्होंने कहा, हमारे समय में मोबाइल फोन नहीं था।
मूल बात यह कि फिट रहना जरूरी है, कुछ भी करने के लिए। तो हमारे बचपन में मोबाइल फोन नाम की बीमारी नहीं थी। तब फिजिकल गतिविधि खूब थी। अब ये मुश्किल है। आप फोन पर घंटों बिता सकते हैं, लेकिन यह बिलकुल सही न है।
सो खेल और खेलना जरूरी है। बोले कि सिगरेट के पैकेट पर तो वॉर्निंग लिखी होती है, लेकिन फोन पर नहीं। नतीजे में ये आपका बहुत-बहुत सारा समय खराब कर देता है। आगे कहा कि जीवन में आगे बढ़ने का एक ही तरीका है और वो है एजुकेशन।
ये नेशन बिल्डिंग के लिए भी जरूरी है। दोस्त अच्छे होना भी जरूरी है, क्योंकि कुछ दोस्त आपको बिगाड़ने वाले होते हैं। सबसे अहम बात यह कि सबसे पहले जीवन में कुछ बनकर दिखाइए।
फिर आता है परिवार का ध्यान रखना और यह सही है कि पैसा बहुत अमेजिंग चीज है। सो पैसा भी जरूरी है, लेकिन उतनी ही जरूरी है उदारता, ताकि आप परिवार के साथ दूसरों की मदद भी कर सकें।
कई बार आपका काम भी समाज की मदद करता है। उदाहरण के लिए डॉक्टर और झाड़ू मारने का काम करने वाला भी सोसायटी में योगदान देता है। ऐसे बेशुमार काम हैं। तो आपका काम ऐसा हो कि उससे लोगों को भी फायदा मिले।
भगत आगे बोले कि देश के लिए काम करने के ढेर तरीके हैं। लेखन है, सोशल मीडिया है, और भी कई, लेकिन उसके पहले खुद को और परिवार को सेट करना व आर्थिक रूप से अपना और परिवार का भविष्य सुरक्षित करना भी जरूरी है।
आज दुबई या सिंगापुर व्यवस्थित माने जाते हैं तो इसलिए कि वहां के लोग नियमों का पालन करते हैं। हमें भी यह करना सीखना होगा। दुनिया में समस्याओं की कमी न है। प्रदूषण है, ग्लोबल वॉर्मिंग है, लड़ाइयां हैं आदि। हम भारतीय तो पूरे विश्व का भला चाहने वाले लोग हैं। यह अपने आप में बहुत सकारात्मक विचार है।
युवाओं को सिर्फ 10-20 साल मेहनत करने की जरूरत होती है और फिर जिंदगी कदरन आसान हो जाती है। इसके उलट यदि ये 10-20 साल बर्बाद कर दिए तो जीवन को उसकी भारी कीमत भी चुकानी ही पड़ती है। दरअसल, यदि अपने इंटरेस्ट को आपने नेशन के इंटरेस्ट के साथ अलाइन कर लिया तो समझो काम पूरा हुआ।
सो कुलजमा यही भगत के सारे कहने का सार था। बमुश्किल आधा-पौना घंटे में उनका लेक्चर खत्म था और साफ था कि इतने जबरदस्त टॉपिक पर बात करने के लिए उनकी तैयारी कतई न थी, गोया कनस्तर खाली! जाहिर है सुनने वालों ने खुद को लुटा-ठगा महसूस किया।
बेशक उनकी बातें बेसिक, सरल और मानीखेज थीं, लेकिन उनको वजनदार बनाने का उन्होंने कोई उपाय नहीं किया। उदाहरण के लिए जब उन्होंने युवाओं के लिए मोबाइल फोन को बीमारी बताया तो यह नहीं बताया कि उससे मुक्ति का उपाय क्या?
जब खेल और खेलने की बात की तो यह नहीं बताया कि खेल कैसे आपके चरित्र निर्माण या कैरेक्टर बिल्डिंग का काम भी करते हैं। कॅरियर की जहां तक बात है तो वो दूसरे नामचीन लेखक शिव खेड़ा के मशहूर कथन का हवाला भी दे सकते थे कि ‘सफल लोग कोई अलग काम नहीं करते, बल्कि वो काम को बस अलग तरीके से करते हैं।
इसके लिए वो इंदौर के ही चर्चित ट्रैफिक कॉप रणजीत सिंह का उदाहरण भी दे सकते थे कि चौराहों पर यातायात संभालने का काम बेशुमार ट्रैफिक पुलिस जवान करते हैं, लेकिन रणजीत सिंह ने, शिव खेड़ा के शब्दों में कहें तो उसी काम को अलग ढंग और एनर्जी के साथ किया और नतीजा सबको पता।
सो कुल मिलाकर कहा जाए तो चेतन भगत ने इतने शानदार विषय पर केवल घास ही खोदी। या मुहावरे की भाषा में कहें तो वो उंगली कटाकर शहीदों में नाम लिखवाने इंदौर पधारे थे। ऊपर से उनकी मुग्धता देखिए कि बोले, आयोजकों ने इतने बड़े कार्यक्रम के लिए किसी सिंगर को न बुलाकर उनके जैसे एक लेखक को बुलाया, जो कि बहुत अहम बात है।
अलबत्ता उनका बोलना ऐसा होना चाहिए था कि लोग आगे भी ऐसे मौकों पर लेखकों को बुलाते! वो ऐसा तो नहीं ही होना था कि कोई लेखकों को बुलाने से ही तौबा कर ले!
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