क्या साख बचाने बोरिंगों को कातिल घोषित कर दिया था प्रशासन ने: भागीरथपुरा का सरकारी कत्लगाह; 32 लाशों पर खड़े इंदौर का स्वच्छता का ढोंग
KHULASA FIRST
संवाददाता

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर की स्वच्छता की चमक के पीछे भागीरथपुरा की गलियों में जो सड़ांध दफन है, उसने अब तक 32 जिंदगियों को निगल लिया है। प्रशासन की संवेदनहीनता और अमानवीयता का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आया जब एक महीने तक अस्पताल के बिस्तर पर तड़पने के बाद बुजुर्ग एकनाथ सूर्यवंशी को केवल इसलिए घर भेज दिया गया ताकि अस्पताल के रिकॉर्ड में मौत का आंकड़ा न बढ़े। उन्होंने घर में दम तोड़ दिया।
अब भी दो बुजुर्ग महिलाएं आईसीयू में वेंटिलेटर पर हैं, जिनके मल्टी-ऑर्गन फेलियर का असली गुनाहगार कोई बीमारी नहीं, बल्कि सरकारी नलों से निकला सफेद जहर है।
शर्मनाक पहलू यह है कि जब 32 अर्थियां उठ चुकी हैं, तब प्रशासन खुद को बचाने के लिए जनता के बीच पानी उबालकर पीने का ढिंढोरा पीट रहा है। यह उन परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है, जिन्होंने सरकारी नलों पर भरोसा करके अपनों को खो दिया।
नगर निगम के अफसर आज कागजी रिपोर्ट बांट रहे हैं कि पानी शुद्ध है। अगर पानी शुद्ध है तो अफसर भागीरथपुरा के उन नलों से सीधा पानी पीकर दिखाएं? क्या ये अपनी संतानों को वह पानी पिलाएंगे जिसने 32 मासूमों और बुजुर्गों की जान ले ली? यह चुनौती उन बिलखती मांओं और विधवाओं की तरफ से है, जिनका संसार इन अफसरों की फाइलों के नीचे कुचल दिया गया।
निगम के भ्रष्टाचार पर डाल रहे पर्दा
प्रशासन द्वारा अपनी नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने के लिए बोरिंग के पानी की जांच का नाटक रचा गया है। जिन निजी बोरिंगों ने संकट के समय लोगों की प्यास बुझाई उन्हें रातोरात सरकारी प्रमाण पत्र के जरिए खतरनाक घोषित कर दिया गया ताकि सारा दोष जमीन के नीचे मढ़ दिया जाए और पाइप लाइनों में छिपे निगम के भ्रष्टाचार पर पर्दा पड़ा रहे।
यह साजिश सिर्फ इसलिए है ताकि जनता का ध्यान उस गटरनुमा पानी से हट जाए जो निगम की जर्जर लाइनों से घरों तक पहुंचा था। 32 मौतें हो जाने के बाद पाइप लाइन बदलने का जो अंतिम दौर चल रहा है, वह दरअसल प्रशासन की नैतिकता का अंतिम दौर है।
शहर के बीचोबीच मौत का यह तांडव और प्रशासन की यह लीपापोती साबित करती है कि इंदौर का नंबर वन का खिताब उन 32 चिताओं की राख पर खड़ा एक शर्मनाक झूठ है। स्वास्थ्य केंद्रों पर 24 घंटे की तैनाती और पिछले दिनों सड़कों पर दौड़ते एम्बुलेंस के सायरन उन सिसकियों को नहीं दबा सकते, जो आज भी भागीरथपुरा की हर गली से आ रही हैं। यह रिपोर्ट उन 32 परिवारों की चीख है, जिन्हें व्यवस्था ने सरेआम ठगा और फिर मरने के लिए छोड़ दिया।
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