शहर में दूषित पानी से मौत का तांडव, क्या जनता की जान की कोई कीमत नहीं...?
KHULASA FIRST
संवाददाता

शुभम दुबे स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आज के आधुनिक युग में जहां हम ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘डिजिटल इंडिया’ की बातें कर रहे हैं, वहीं हमारे शहरों की एक कड़वी सच्चाई यह है कि इंदौर जैसे स्वच्छ और विकसित शहर में लोग नलों से आने वाला दूषित पानी पीने को मजबूर होकर दम तोड़ रहे हैं, क्योंकि जनहितैषी का मुखौटा पहने नेता और प्रशासन जनता की शिकायतों महत्वपूर्ण नहीं समझते।
पिछले कुछ दिनों में शहर के विभिन्न इलाकों से आई मौतों की खबरें न केवल हृदयविदारक हैं, बल्कि हमारे सिस्टम पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी लगाती हैं।
इन मौतों का आखिर जिम्मेदार कौन है? शहर की पाइपलाइनों में सीवरेज का पानी मिलना अब एक आम शिकायत बन गई है। हैजा, टायफाइड और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां घर-घर में पैर पसार रही हैं।
अस्पतालों में मरीजों की लंबी कतारें इसका प्रमाण हैं कि जल विभाग और नगर निगम अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को निभाने में पूरी तरह विफल रहे हैं।
नेताओं की जवाबदेही सिर्फ वोट के समय ही क्यों होती है। जब चुनाव आते हैं तो हर नेता के घोषणा-पत्र में ‘साफ पानी’ सबसे ऊपर होता है, लेकिन सत्ता में आते ही ये वादे फाइलों में दब जाते हैं।
इस संकट में नेताओं की जवाबदेही तय होना अनिवार्य है, क्योंकि बजट का दुरुपयोग करते नेताओं को बताना ही होगा कि जल शोधन और बुनियादी ढांचे के लिए आवंटित करोड़ों रुपए आखिर कहां जा रहे हैं?
राजसी वातावरण के शौकीन नेताओं और अधिकारियों को बताना होगा कि निगरानी का अभाव क्यों हुआ? पुराने जर्जर पाइपों को बदलने में देरी क्यों? क्या प्रशासन को किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार रहता है?
दोषियों को संरक्षण देते नेता जब लापरवाही सामने आती है, तो छोटे कर्मचारियों को सस्पेंड करके मामले को दबा देते हैं। विभाग के शीर्ष अधिकारियों और संबंधित मंत्रियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं होती?
‘साफ पानी मांगना जनता का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन आज यह एक जानलेवा संघर्ष बन गया है।’
अब क्या होना चाहिए?
त्रासदी को ‘हादसा’ कहकर नहीं टाला जा सकता। यह एक प्रशासनिक हत्या है। इसके सुधार के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाना बेहद जरूरी हैं-
स्वतंत्र जांच की जाए और मौतों के कारणों की उच्च स्तरीय जांच हो।
दोषी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक मामला दर्ज हो।
त्वरित इन्फ्रास्ट्रक्चर अपडेट कर पुरानी पाइपलाइनों को तत्काल बदलने के साथ ही सीवरेज मिक्सिंग की समस्या को जड़ से खत्म किया जाए।
प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा मिले और पूरे शहर में मुफ्त स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएं।
नेताओं को यह समझना होगा कि जनता के धैर्य की एक सीमा होती है। केवल शोक संवेदनाएं व्यक्त करने से किसी का जीवन वापस नहीं आएगा।
यदि आज हम अपने नागरिकों को एक गिलास साफ पानी नहीं दे सकते, तो बड़े-बड़े विकास के दावों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
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