भाजपाई पार्षद पांव जमीन पर नहीं: विधायकों के लाड़के पार्षद अब जनसेवा से कोसों दूर, अधिकांश धंधेबाज
KHULASA FIRST
संवाददाता

शहर में सक्रिय ‘चाय से गरम केटलियां'
दिन उगते ही लग जाते हैं ‘गणित-ज्ञान' में पार्षद, जनता से जुड़े मुद्दे से अब कोई लेना-देना नहीं
कहां आ रहा गंदा पानी, कहां जाम है ड्रेनेज लाइन, कोई लेना-देना नहीं, अर्दलियों के हवाले कर रखी जनसमस्याएं
विधायकों के वरदहस्त के कारण स्वयं को विधायक से भी ऊपर मानकर काम कर रहे पार्षद, किसी पर कोई लगाम नहीं
विवादित जगहों पर अपने दफ्तर ऐसे खोलकर बैठ गए पार्षद, जैसे वार्ड के राजा-महाराजा हों
खुद की कमाई के काम पर कभी अफसरों के न सुनने का नहीं रोया रोना, वार्ड के अवैध काम पर दिनभर फोकस
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भाजपा के लगभग तमाम पार्षद आजकल ‘चाय से गरम केटली' वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। ज्यादातर पार्षद विधायकों की पसंद के ही हैं। लिहाजा इनके रंग-ढंग विधायकों से भी ऊपर हो चले हैं। आखिर हों भी क्यों नहीं? विधायकों ने ही इन्हें अपने-अपने वार्ड में जनता का रहनुमा नहीं, मालिक बनाकर ‘छुट्टा' छोड़ रखा है।
इलाके के हर ‘काले-पीले' के लिए माननीयों ने इन्हें ही जवाबदारी सौंप रखी है, ताकि बदनामी अगर हुई भी तो पार्षद तक आकर सिमट जाएगी। लिहाजा पार्षद एक तरह से ‘छुट्टे बैल' हो गए हैं। सुबह आंख खुलते ही इन्हें जनता की समस्याओं से जुड़े काम नहीं, गणित-ज्ञान के काम नजर आते हैं और पूरा दिन उसी पर फोकस रखते हैं।
इन पार्षदों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं। न स्थानीय भाजपा संगठन का, न दीनदयाल भवन का, न प्रदेश नेतृत्व का। विधायक तो इनका टिकट संगठन से ही लड़-झगड़कर, दबाव-प्रभाव बनाकर लाए हैं तो उनसे इन पर लगाम कसने की उम्मीद करना बेमानी है। उलटा ये विधायकों की शह पर ही किसी को कुछ नहीं समझते। कौन महापौर, कौन नगर अध्यक्ष? ठेंगे पर। जो विधायक कहेंगे, पार्षद उससे हटकर कुछ नहीं करेगा।
न कर सकता है। लिहाजा इंदौर और इंदौर की जनता को लपककर ‘चूसा' जा रहा है। रही-सही कसर नगर निगम की मनीष सिंह द्वारा बना दी गई धाक से पूरी हो गई। उन्होंने तो ये काम शहर के आमूलचूल परिवर्तन के लिए किया। सिंह नगर निगम इंदौर की वो धमक स्थापित कर गए हैं कि उसकी फसल निगम के छुटभैये कारिंदे और इलाके के पार्षद मिलकर काट रहे हैं।
एक पार्षद की सुस्ती से जिस तरह से पूरे इंदौर की नाक कटी, वैसे ही सभी पार्षद की कार्यशैली हो गई है। भागीरथपुरा का पार्षद धरने पर बैठ जाता तो अफसरों की नाकामी उसी दिन उजागर हो जाती। लेकिन अब जनता के लिए कौन ऐसे सड़क पर उतरता है? सबको अपना देखना है न? जनसेवा यानी जनता से जुड़े रोजमर्रा के काम से इनका कोई लेना-देना नहीं। गटर, नाली, पीने का पानी, सीवरेज आदि के काम के लिए अब ये पसीना नहीं बहाते।
न इन्हें कभी निगम की सीढ़ियों पर इस काम के लिए जद्दोजहद करते देखा जाता है। इसके लिए इन चाय से गरम केटलियों ने अर्दली रख लिए हैं। ठीक वैसे ही, जैसे आरटीओ में एवजी काम करते हैं। अब पार्षद भी अपने-अपने वार्ड में आरटीओ के ‘कमाऊ पूत' हो गए हैं।
जैसे आरटीओ के ‘कमाऊ पूत' अपने ‘ऊपर' हिस्सा देकर सिस्टम का स्थायी हिस्सा हो गए हैं, ठीक इसी तरह भाजपा जैसे राजनीतिक दल में अब पार्षद हो गए हैं। उनका ‘कमाया' सबके काम आ रहा है। लिहाजा अब जनता किस चिड़िया का नाम है?
पार्षद खुद की कमाई के काम पर कभी अफसर नहीं सुन रहे का रोना नहीं रोते। उसके लिए बाकायदा एक सिस्टम बन गया है और उस सिस्टम का सब ऐसे पालन करते हैं मानों ये नगर निगम के अधिनियम तहत अनिवार्य रूप से लिखा हुआ है। इसमें इलाके के दरोगा से लेकर बिल्डिंग ऑफिसर व इंजीनियर से लेकर पार्षद-विधायक तक एक समान शामिल हैं। एमआईसी सदस्य को कैसे छोड़ सकते हैं? तभी तो एमआईसी मेंबर बनने के लिए भाजपा में ‘जूते में दाल’ बंटती है।
वार्ड में कहीं भी निर्माण के लिए गिट्टी का ट्रक/डंपर खाली हुआ नहीं कि असल काम शुरू। आप कितने ही नियम-कायदों से काम करें, पार्षद से बच नहीं सकते। निजी निर्माण शुरू होते ही पार्षद सहित इस पूरे कॉकस की बांछें ऐसे खिल जाती हैं, जैसे ग्राहक को देखकर दुकानदार की कि हुआ ‘बोनी-बट्टा'।
एक वार्ड के एक मोहल्ले में जिस तरह भाजपा के समूचे राजकाज पर कालिख पोत दी, वह एक पार्षद के हवाले था। न तो उन मोहल्ले की समस्या से विधायक का कोई सीधे लेना-देना था, न विभागीय मंत्री-मेयर की कोई सीधी-सीधी जवाबदेही बनती थी। लेकिन एक पार्षद की नाकामी ने न सिर्फ इंदौर नगर निगम, बल्कि प्रदेश की डॉ. मोहन सरकार को देशभर में बदनाम कर दिया।
केंद्र की मोदी सरकार तक जहरीले जल से मौत की आंच पहुंच गई, क्योंकि जनता के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े ऐसे कामकाज से अब पार्षदों का कोई लेना-देना रहा हीं नहीं। अगर होता तो भागीरथपुरा कांड होता और यूं इंदौर की जगत में थू-थू होती? अब पार्षदों के काम की प्राथमिकताएं बदल गईं हैं, जिस पर किसी की कोई लगाम नहीं।
ट्रिपल इंजिन सरकार यानी ‘पांचों उंगलियां घी में, सिर कड़ाही में'
ऐसा नहीं कि जनता से जुड़े काम नहीं होते। आजकल तो खूब होते हैं, क्योंकि वो भी असल कमाई का अहम जरिया हैं। अच्छी-भली सड़क उखाड़कर फिर बनाई जाती है। बनी-बनाई को उखाड़ दिया जाता है। पेवर ब्लॉक जब-तब लगते रहते हैं। ‘आटे में नमक' का लिहाज भी किया जाए तो जनता के ये काम पार्षदों को ‘ऊर्जावान' रखते हैं।
इस सब ‘ऊर्जा' का इस्तेमाल विधायक जब-तब करते रहते हैं। पार्टी का कोई भी अभियान हो या आंदोलन, पार्षद पर ही जिम्मेदारी डाल दी जाती है। लिहाजा वह क्यों पीछे रहे? वह अपनी जेब से क्यों करने लगा खर्च? ‘घर लुटाकर' राजनीति करने का दौर कब से ही गया। अब तो ‘ट्रिपल इंजिन सरकार' का दौर है।
यानी ‘पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में...'। जनता मरे तो मरे। जैसे भागीरथपुरा में मर गई, जैसे स्नेह नगर की बावड़ी में मर गई, जैसे शिकायत करने पर कल, यानी सोमवार को मल्हारगंज थाने में बंद कर दी गई...!!
नगर निगम पानी की टंकी पर कब्जा कर भागीरथपुरा के भाजपा पार्षद कमल वाघेला ने बनाया अपना निजी दफ्तर।
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