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भोजशाला, रहस्य से भरा ऐतिहासिक श्वेतपत्र: मां वाग्देवी का शाश्वत सदन और आक्रांताओं का सच

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संवाददाता

21 जनवरी 2026, 2:47 pm
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भोजशाला, रहस्य से भरा ऐतिहासिक श्वेतपत्र

डॉ. तेज प्रकाश पूर्णानंद व्यास एंटी एजिंग वैज्ञानिक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य भारत के हृदय प्रदेश में स्थित धारानगरी (धार) का इतिहास सम्राट भोज के पराक्रम और उनकी विद्वत्ता से दैदीप्यमान है। भोजशाला केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का वह महापीठ है, जिसे राजा भोज ने ‘सरस्वती कंठाभरण’ के रूप में प्रतिष्ठित किया था।

यह स्थान सदियों तक वेदों की ऋचाओं, व्याकरण के सूत्रों और काव्य की सरिताओं से गुंजायमान रहा है। इतिहास के क्रूर पृष्ठों में इस विद्या के मंदिर पर जो आघात हुए, वे आज भी इसके स्तंभों पर अंकित घावों के रूप में देखे जा सकते हैं। इसे मालवा का सांस्कृतिक सूर्य माना जाता है।

भोजशाला के मंदिर होने के साक्ष्य
भोजशाला की वास्तुकला चीख-चीख कर इसके मंदिर होने की पुष्टि करती है। यहां मिले साक्ष्य किसी भी अन्य दावे को सिरे से खारिज करते हैं।

खंडित प्रतिमाएं और मूर्तियां: भोजशाला परिसर के भीतर और उसकी नींव में सैकड़ों ऐसी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, जो सनातन धर्म के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाती हैं। भोजशाला की पहचान का सबसे बड़ा प्रमाण है इसकी मूल अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की प्रतिमा, जो दुर्भाग्यवश ब्रिटिश संग्रहालय (लंदन) में है। इस प्रतिमा के आधार पर उत्कीर्ण शिलालेख स्पष्ट करता है इसे राजा भोज के शिल्पकार ‘मनथल’ ने बनाया था।

गणेश और विष्णु की प्रतिमाएं: परिसर के भीतर स्तंभों पर भगवान गणेश, विष्णु के अवतारों और अप्सराओं की खंडित आकृतियां स्पष्ट देखी जा सकती हैं। मुस्लिम काल के दौरान इन मूर्तियों के चेहरों को विशेष रूप से खंडित (डीफेस) किया गया, जो आक्रांताओं की मानसिकता को दर्शाता है। परिसर के एक हिस्से में प्राचीन हनुमान प्रतिमा का अस्तित्व हिंदू समाज की अटूट आस्था का केंद्र रहा है।

नक्काशीदार स्तंभ और नंदी का स्थान: भोजशाला के गर्भगृह और चारों ओर के गलियारों में लगे स्तंभ पूर्णतः ‘परमार कालीन’ हिंदू स्थापत्य शैली के हैं। प्रत्येक स्तंभ पर घंटियां, जंजीरें और पुष्प-कलियों की नक्काशी है, जो केवल मंदिरों में ही पाई जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यहां एक विशाल ‘नंदी’ की उपस्थिति के भी प्रमाण मिलते हैं, जो इस ओर संकेत करते हैं कि यहां महादेव की आराधना का भी विशेष स्थान था।

दस्तावेज और शिलालेख (पाली एवं संस्कृत): भोजशाला की दीवारें विश्व का सबसे बड़ा ‘शिलालेखीय पुस्तकालय’ है। इन पर ‘प्राकृत-प्रकाश’ और ‘अष्टाध्यायी’ के सूत्र उत्कीर्ण हैं। यहां ‘कूर्मचक्र’ (कछुए के आकार का यंत्र) बना है, जिसका उपयोग संस्कृत व्याकरण और खगोल विज्ञान की गणना के लिए किया जाता था। किसी मस्जिद में व्याकरण के सूत्रों का कोई स्थान हो सकता है? कदापि नहीं।

पाली और प्राकृत भाषा के दस्तावेज: महाराजा भोज स्वयं कई भाषाओं के ज्ञाता थे। भोजशाला में प्राप्त शिलालेखों में पाली और प्राकृत भाषा के अंश मिलते हैं, जो उस समय की जनभाषा और शास्त्रीय भाषा के समन्वय को दर्शाते हैं। ये दस्तावेज प्रमाणित करते हैं यह स्थान ‘विद्यापीठ’ था।

‘पारिजात मंजरी’ नाटिका: यहां के पत्थरों पर ‘पारिजात मंजरी’ नामक नाटक के अंश हैं, जिसे राजा भोज के उत्तराधिकारी अर्जुनवर्मन के काल में कवि मदन ने लिखा था। यह साक्ष्य इस बात पर अंतिम मुहर लगाता है यह स्थान सांस्कृतिक आयोजनों और साहित्य सृजन का केंद्र था।

इस प्रतिमा के महत्वपूर्ण तथ्य
शिल्प कला: यह प्रतिमा धार के प्रसिद्ध मूर्तिकार ‘मनथल’ द्वारा निर्मित है। निचले भाग पर संस्कृत में शिलालेख अंकित है, जो स्पष्ट रूप से महाराजा भोज और ‘सरस्वती सदन’ (भोजशाला) का उल्लेख करता है। प्रतिमा 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मेजर किनकैड द्वारा हटाई गई थी और अंततः लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय पहुंच गई।

प्रतिमा में मां सरस्वती को ‘वाग्देवी’ के रूप में दर्शित है, जिनके हाथों में विद्या और संगीत के प्रतीक हैं, हालांकि समय के साथ कुछ भाग खंडित हुए हैं। यह प्रतिमा भोजशाला की ऐतिहासिकता और इसकी पवित्रता का सबसे बड़ा ‘जीवंत प्रमाण’ है।

वैज्ञानिक साक्ष्य और एएसआई का सर्वेक्षण (2024-25): हाल ही में उच्च न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किए गए ‘ जीपीआर सर्वे’ और खुदाई ने ऐतिहासिक तथ्यों का खुलासा किया है। खुदाई में नीचे की परतों में प्राचीन मंदिर की दीवारें और मूर्तियां मिली हैं।

आक्रमण का काला अध्याय- ‘कमाल मौलाना’ का सच: इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता एकमत हैं ‘मौलना कमालुद्दीन मस्जिद’ नाम का कोई अस्तित्व मूल इतिहास में नहीं था। अलाउद्दीन खिलजी और बाद में मालवा के सुल्तानों (दिलावर खान और महमूद खिलजी) ने इस मंदिर की संरचना को नष्ट करने का प्रयास किया।

सामग्री का दुरुपयोग: मंदिर के ही स्तंभों को उल्टा कर या ढंककर मस्जिद का ढांचा खड़ा किया गया। आज भी मस्जिद की दीवारों के पीछे हिंदू मंदिरों के नक्काशीदार पत्थर और मूर्तियां दबी हैं।

मजार का निर्माण: परिसर के भीतर ‘मजार’ का निर्माण केवल इस उद्देश्य से किया गया ताकि हिंदू समाज के इस पवित्र स्थान पर उनके दावे को कमजोर किया जा सके। यह स्पष्ट रूप से एक ‘ऐतिहासिक अतिक्रमण’ है, जिसे वोटबैंक की राजनीति और तुष्टीकरण के कारण लंबे समय तक ढंका गया।

इस्लामी संरचना का अभाव: मस्जिद कहलाने वाली संरचना के नीचे कोई भी ऐसी आधारभूत संरचना नहीं मिली जो प्राचीन काल से इस्लामी हो। सभी सामग्री पहले से मौजूद मंदिर की है।

न्याय की प्रतीक्षा में वाग्देवी: भोजशाला का वर्तमान स्वरूप भारत की सांस्कृतिक गुलामी के अवशेषों जैसा है। एक ओर हमारी ज्ञानदात्री की प्रतिमा सात समंदर पार है और दूसरी ओर उनकी अपनी शाला में हम ‘अतिथि’ की तरह पूजा करने को विवश हैं।

कमाल मौलाना मस्जिद का दावा पूरी तरह आधारहीन और अतिक्रमण पर टिका है। भोजशाला का कण-कण, उसका पत्थर-पत्थर और वहां खुदा हुआ एक-एक शब्द केवल और केवल सनातन धर्म और राजा भोज के गौरव का उद्घोष करता है। अब समय आ गया है इस ‘विद्या के मंदिर’ को राजनीतिक बेड़ियों से मुक्त कर इसे पूर्णतः हिंदुओं को सौंपा जाए।

वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन हिंदुओं का नैसर्गिक अधिकार: 23 जनवरी (वसंत पंचमी) के दिन भोजशाला का महत्व किसी भी हिंदू के लिए अयोध्या या काशी से कम नहीं है। सदियों से हिंदू समाज यहां ‘यज्ञ’ करता आया है। यह स्थान सूर्य की किरणों के साथ मां सरस्वती के वंदन का है सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं का यहां निर्बाध अधिकार होना चाहिए। यह कोई रियायत नहीं, बल्कि पूर्वजों द्वारा विरासत में मिला ‘सांस्कृतिक उत्तराधिकार’ है।

संस्कृत व्याकरण के नियम
भोजशाला की दीवारों पर कछुए के आकार में बने चक्र उत्कीर्ण हैं। ये कोई सजावटी चित्र नहीं हैं, बल्कि संस्कृत व्याकरण के कठिन नियमों को याद रखने के लिए महाराजा भोज द्वारा तैयार वैज्ञानिक चार्ट हैं। दुनिया की किसी भी मस्जिद में व्याकरण के ऐसे वैज्ञानिक यंत्र नहीं पाए जाते।

‘पारिजात मंजरी’ के शिलालेख: परिसर के भीतर विशाल पत्थरों पर ‘पारिजात मंजरी’ (विजयश्री) नाटिका के अंश उत्कीर्ण हैं। यह नाटक राजा भोज के उत्तराधिकारी अर्जुनवर्मन के विजयोत्सव के उपलक्ष्य में लिखा गया था। इन शिलालेखों की भाषा शुद्ध संस्कृत और प्राकृत है, जो इस स्थान के हिंदू राजदरबार और मंदिर से जुड़े होने का सीधा प्रमाण है।

हवन कुंड और यज्ञ वेदी साक्ष्य: पुरातत्वविदों को सर्वेक्षण के दौरान परिसर के मध्य में प्राचीन यज्ञ वेदी के अवशेष मिले हैं। वसंत पंचमी के दिन होने वाला ‘महायज्ञ’ इसी प्राचीन परंपरा का हिस्सा है, जो सदियों से बिना रुके (बाधाओं के बावजूद) चली आ रही है।

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