ये किस रफ्तार पर सवार हो मेरे बच्चो: नवधनाढ्य वर्ग ने अपनी नजरों से दूर क्यों कर दिए अपने नौनिहाल
KHULASA FIRST
संवाददाता
पढ़ने-लिखने, कुछ बनने की आस में माता-पिता बच्चों को घर से करते दूर, बदले में क्या दे रहे बच्चे?
बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के कितने अरमान पालते हैं परिजन, क्या ये दिन देखने कि बच्चा नशे व रफ्तार की गिरफ्त में है?
सुबह तक के नशे के सतत सेलिब्रेशन का युवाओं में ये कैसा आया दौर? पाल रहे बेतहाशा स्पीड का जानलेवा शौक
पढ़ने-लिखने के बहाने शहरों का रुख करने वाली पीढ़ी गलत आदतों के कारण पीछे छोड़ जा रही रोते-बिलखते मां-बाप
बच्चो! कुछ तो रहम खाओ, बंद करो ये देर रात तक की पार्टियां, परिजन के भरोसे को यूं न तोड़ो, कुछ उनका भी सोचो
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कुछ तो रहम खाओ बच्चो। बंद करो ये देर रात तक की पार्टियां। ये सुबह तक चलने वाले जश्न से बाज आओ। परिजन के भरोसे को यूं मत तार-तार करो। कितने भरोसे से तुम्हें उन्होंने परदेस में रख छोड़ा है। बड़ी शान से वे सबको बताते हैं कि हमारे बच्चे इंदौर में पढ़ रहे हैं।
क्या बीतती है उन पर जब तुम अखबारों के पन्नों की रक्तरंजित सुर्खियां बनते हो। कार के बोनट पर बिखरे पड़े तुम्हें देख जान जाते-जाते ही बची होगी मां-बाप की। फिर भी उन्होंने ईश्वर से ये ही कहा होगा कि ये दिन दिखाने से पहले प्रभु, तूने हमें ही क्यों न मौत दे दी। तुम तो मर गए बच्चो, लेकिन अपने जन्मदाताओं को तुम जीते-जी एक जिंदा लाश में बदल गए।
प्रेरणा, प्रखर, मन संधू व अनुष्का की गति देख युवा कुछ सबक सीखेंगे कि वे भी अपने परिजन को जीते-जी मार देंगे? ये इंदौर में नशे व रफ्तार के गठजोड़ से हुआ क्या पहला हादसा है? ये आए दिन की बात हो गई है। परिजन अब बच्चों को सुख-सुविधा व संसाधन के साथ-साथ अपनी निगरानी भी दें। नजरें गड़ाएं कि आपके बच्चे इस शहर में क्या कर रहे हैं?
ये किस रफ्तार पर सवार हो मेरे बच्चो? ये कैसा नशा, जो पूरी दुनिया ही उजाड़ रहा है। पढ़ने-लिखने, कुछ बनने-संवरने के दौर में ये कैसे शौक पाल लिए बच्चो कि माता-पिता परिजन के पास सिवाय हाथ मलने के कुछ न बचे। ये कैसे जख्म दे रहे हो अपने मां-पापा, परिजन को, जो जीवनभर भरा ही नहीं सकते।
जानते हो, मां-बाप के जीवन का सबसे बड़ा दुःख-संताप-अभिशाप क्या है? अपनी बांहों में नौजवान बच्चे की पार्थिव देह, अपने कंधे पर जवान बच्चों की अर्थी तुम्हें जन्म देने वालों के जीवन का सबसे बड़ा दुःख होता है। ऐसा दुःख, जिससे वे मरते दम तक उबर नहीं पाते।
असमय तुम्हारा काल-कवलित होने का उनके अंतस् पर हुआ जख्म ताजिंदगी भराता नहीं है। हर पल तुन्हें याद कर उनकी आंखें भर जाती हैं, आंसुओं से। ये आंसू उनके लिए नासूर बन जाते हैं, जो तुम्हारे बिछोह में मरते दम तक रिसते रहते हैं।
कुछ तो रहम करो बच्चो! तुम्हें दी गई आजादी का ऐसा बेजा इस्तेमाल मत करो। तुम पर किए भरोसे को यूं मत तोड़ो। उस विश्वास की हत्या मत करो बेटा, जो हमने तुम पर आंख मींचकर किया है। जानते हो न, तुम हमारे कलेजे के टुकड़े हो। तुम बिन हम एक पल नहीं रह सकते।
फिर भी हमें आजीवन तुम बिन जीने, रहने का ये कैसा गम दे जा रहे हो? तुम तो एक पल में चल दोगे, फिर हमारा क्या? सुबह-शाम, उठते-बैठते, खाते-पीते, सब जगह तुम और तुम्हारी यादें ही आती-जाती हैं। रोना-बिलखना छूट जाता है, लेकिन तुम्हारे साथ बिताए पल नहीं छूटते।
इतनी-सी दया भी नहीं तुममें कि तुम बिन मम्मी-पापा कैसे जिएंगे? छोटी बहन का क्या होगा? किससे वह रूठेगी, मनाएगी? भाई किससे बात करेगा, लड़ेगा-झगड़ेगा? उसका कौन भाई जैसा फिर मित्र होगा? दादा-दादी तो जीते-जी ही मर जाएंगे न?
बुआओं का क्या हाल होगा? बड़े पापा-मम्मी, चाचू-चाची की चहचाहट का क्या होगा? एक हंसता-खेलता घर-आंगन, परिवार तुम्हारी एक गलती से उजड़ जाएगा बेटा? पढ़े-लिखे हो, कुछ तो रहम करो।
पढ़ने-लिखने, कुछ बन जाने के लिए कितने अरमानों से मां-पापा तुम्हें कलेजे से दूर करते हैं, घर से दूर भेजते हैं। ये आस रहती है कि तुम बड़े आदमी बन जाओ। जिद भी तो तुम्हारी रहती है न कि हम इंदौर, मुंबई, पुणे, चैन्नई, बैंगलुरु या सात समंदर पार के शहरों में जाकर पढ़ेंगे-लिखेंगे? तुम्हारी इच्छा का वे मन मारकर भी पूरा मान रखते हैं।
तुम भी तो उनके इस भरोसे का, उनके इस त्याग का कुछ सम्मान करो बच्चो! परदेस में कोई देखने वाला नहीं, तो क्या स्वयं को इतना बेलगाम कर लोगे कि फिर चाहकर भी लगाम लग न पाए? ये पढ़ने-लिखने की उम्र में क्या शौक पाल लिए? ये कैसा नशा कि अपना भविष्य ही बिसरा दिए जा रहे हो?
ये कैसी आदतें कि परिवार के सदस्यों के चेहरे भी आंखों के सामने नहीं आते। मित्रता निभाना, मित्र बनाना बुरी बात नहीं, लेकिन संगति कैसे लोगों की करना है, ये थोड़ी-सी भी समझ नहीं तुममें? तुम तो एमबीए, बीबीए, एमटेक, बीटेक आदि पढ़ रहे हो, तो फिर इतनी भी अक्ल नहीं कि स्वयं के जीवन को किस दिशा में ले जा रहे हो?
कार के ब्रांड, बैलून की क्वालिटी के दम पर दांव पर न लगाएं जिंदगी
ये सुबह तक चलने वाली कैसी पार्टियां हैं बेटा? ये कैसे जन्मदिन तुम मनाने लगे, जो बिना नशे के पूरे नहीं होते? ये नशा भी कैसा, जो तुम्हें होश-ओ-हवास में रखता ही नहीं। ये अपने रूम से निकलकर तुम कब से फार्म हाउस, पब-बार, होटल्स व हाईवे पर जश्न मनाने निकलने लगे?
ये जन्मदिन मनाने की जगहें हैं? शाम से रात और फिर पूरी रात से सुबह तक की कैसी पार्टियां मनाने लगे तुम? वह भी नशे में। नशा भी अब शराब से आगे ड्रग्स का, जिसमें होश ही नहीं रहता। होश रहता तो कार में सवार हो रफ्तार की सवारी करते? ये 100-120-140 की स्पीड बढ़ाते वक्त ख्याल नहीं आता कि अकस्मात कुछ हो गया तो हम सबके हाल क्या होंगे?
जिन महंगी गाड़ियों और बैलून के भरोसे तुम रफ्तार पर सवार होते हो, वे क्या तुम पर मां-बाप के किए भरोसे से ज्यादा मजबूत हैं? तुमसे पहले तो गाड़ी और बैलून दोनों दम तोड़ देते हैं।
फिर तुम किस ब्रांड के भरोसे अपनी जिंदगी दांव पर लगा देते हो? अपना कॅरियर, परिजन को रफ्तार के जश्न में कैसे भूल जाते हो? इतना नशा भी मत करो बच्चों कि हम सबकी जिंदगी आजीवन गम में डूब जाए।
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