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अंबेडकर जयंती पर विशेष: महू की मिट्टी का वो 'भीम' जो संविधान का 'शिखर' बन गया; अभावों के आँगन से अधिकारों के आकाश तक

KHULASA FIRST

संवाददाता

14 अप्रैल 2026, 5:11 pm
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अंबेडकर जयंती पर विशेष

खुलासा फर्स्ट, हेमंत उपाध्याय।
इंदौर की हलचल से दूर, विंध्याचल की पहाड़ियों की गोद में शांत बैठा सैन्य शहर महू (डॉ. अंबेडकर नगर) केवल एक छावनी नहीं है। यह आधुनिक भारत के उस विधाता की पालकी है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पटकथा लिखी। 14 अप्रैल,1891 की उस ऐतिहासिक सुबह, काली पल्टन के एक साधारण से फौजी क्वार्टर में सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल के घर जब 14वीं संतान ने जन्म लिया, तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि 'भीम' नाम का यह बालक एक दिन करोड़ों लोगों के अंधेरे जीवन के लिए 'सूर्य' बनकर उभरेगा। आज जब हम समानता की बात करते हैं, तो उसकी पहली गूँज इसी महू की मिट्टी से सुनाई देती है।

फौजी अनुशासन और 'हेडमास्टर' पिता की विरासत
बालक भीम जिन्हें  बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर के नाम से सारी दुनिया जानती है का शुरुआती बचपन महू छावनी के कड़े सैन्य अनुशासन के बीच बीता। उनके पिता महू के 'नॉर्मल स्कूल' में हेडमास्टर थे, और यही कारण था कि भीमराव को विरासत में अनुशासन और किताबों के प्रति अगाध प्रेम मिला। छावनी के भीतर हर सैनिक की एक समान वर्दी ने उनके मन में 'समानता' का पहला बीज बोया। पिता के कठोर अनुशासन ने भीम को सिखाया कि दुनिया को बदलने का एकमात्र अस्त्र 'शिक्षा' है।

तीन साल का बचपन और स्मृतियों का वो 'पीपल का पेड़'
डॉ. अंबेडकर महू में अपने जीवन के शुरुआती लगभग तीन साल (1891 से 1894 तक) रहे। 1894 में जब उनके पिता सेना से सेवानिवृत्त हुए, तब यह परिवार महू छोड़कर महाराष्ट्र चला गया। हालांकि समय कम था, लेकिन महू की उस सैन्य बैरक और खुले मैदानों की स्मृतियाँ उनके मन में गहरी थीं। स्थानीय जनश्रुतियों में यह उल्लेख मिलता है कि बचपन में भीम अक्सर यहाँ के शांत कोनों में बैठकर अपनी जिज्ञासाओं के उत्तर खोजा करते थे। वही छोटी सी शुरुआत आगे चलकर कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के विशाल पुस्तकालयों तक जा पहुँची।

'काली पल्टन' का कायाकल्प, जब छावनी बनी 'डॉ. अंबेडकर नगर'
समय का चक्र घूमा और जिस 'काली पल्टन' इलाके में बाबा साहब का जन्म हुआ था, वह करोड़ों लोगों के लिए तीर्थ बन गया। साल 2003 में महू का नाम बदलकर 'डॉ. अंबेडकर नगर' किया गया, जो केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि उस माटी के बेटे के प्रति कृतज्ञता थी। आज यहाँ सफेद संगमरमर से बना भव्य 'भीम जन्मभूमि स्मारक' सांची के स्तूप की दिव्यता की याद दिलाता है। हर साल 14 अप्रैल को यहाँ उमड़ने वाला लाखों का जनसैलाब गवाही देता है कि बाबा साहब के विचार आज भी महू की हवाओं में जिंदा है। यहां आने वाले बाबा साहब के अनुयायियों की सरकार मेहमानों की तरह आवभगत करती है। देश-विदेश से अनगिनत अनुयायी बाबा साहब की जयंती के दिन यहां आते हैं।

कई वर्षों बाद वापसी,अपनी ही माटी से लिपटे बाबा साहब
महू के इतिहास का सबसे भावुक अध्याय वह है जब बाबा साहब अपनी मृत्यु से दो साल पहले, 7 और 8 दिसंबर 1954 को अंतिम बार यहाँ आए थे। अपनी पत्नी डॉ. सविता अंबेडकर के साथ जब वे अपनी जन्मस्थली पर पहुँचे, तो दृश्य भावुक कर देने वाला था। जब अनुयायियों ने उन्हें वहाँ की मिट्टी भेंट की, तो बाबा साहब की आँखें नम हो गईं। उन्होंने कहा था- "इस मिट्टी में मेरे पूर्वजों का पसीना और मेरे बचपन की किलकारियाँ दबी हैं। यही वह जगह है जहाँ से मेरे जीवन का संघर्ष शुरू हुआ था। इस मिट्टी की महक मुझे आज भी अपने बचपन की याद दिलाती है।" पुराने लोग बताते हैं कि बाबा साहब काफी देर तक उस स्थान पर मौन खड़े रहे, जैसे अपने बचपन के उस 3 साल के 'भीम' से संवाद कर रहे हों।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दो शादियां की थीं। उनकी पहली पत्नी का नाम रमाबाई अंबेडकर था। उनका 1935 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो जाने के बाद उन्होंने 1948 में डॉ. सविता अंबेडकर (शारदा कबीर) से दूसरा विवाह किया था। वे पेशे से डॉक्टर थीं। उनके व्यक्तित्व और परिवार से जुड़े अनेक किस्से अलग-अलग प्लेटफार्म पर नजर आते हैं।

होलकर रियासत और मालवा का वो अटूट स्नेह
बाबा साहब का महू और इंदौर से नाता केवल जन्म का नहीं, बल्कि वैचारिक समर्थन का भी था। इंदौर के होलकर शासकों की प्रगतिशीलता और महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ के सहयोग ने उनके संघर्ष को संबल दिया। 1954 की अपनी अंतिम यात्रा के दौरान उन्होंने इंदौर के रेसीडेंसी क्षेत्र में प्रवास किया और यहाँ के पुराने लोगों से अपनी जड़ों के बारे में चर्चा की। यह मालवा के प्रति उनके प्रेम और मालवा का उनके प्रति सम्मान का एक अटूट बंधन है।

विचार जो भूगोल की सीमाओं से परे हैं
डॉ. अंबेडकर भले ही महू से बहुत छोटे होकर चले गए थे, लेकिन अपनी अंतिम यात्रा के दौरान यहाँ लौटकर उन्होंने यह संदेश दिया कि एक 'महामानव' अपने ऊँचे मुकाम पर पहुँचकर भी अपनी जन्मदात्री मिट्टी को कभी नहीं भूलता। 14 अप्रैल को जब महू की धरती 'जय भीम' के उद्घोष से गूँजती है, तो वह केवल एक नारा नहीं होता,  वह उस संकल्प की पुनरावृत्ति होती है जो 135 साल पहले एक फौजी क्वार्टर की सादगी से शुरू हुआ था।

महू की मिट्टी का वह 'भीम' आज भले ही हमारे बीच सशरीर न हो, लेकिन उनके लिखे संविधान की हर पंक्ति में महू का वह अनुशासन और समानता का सपना आज भी धड़कता है। बाबा साहब ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बौद्ध धर्म अपनाया और 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनका महापरिनिर्वाण हुआ।

बाबा साहब ने अपने कई लेखों में यह स्वीकार किया कि उनकी शुरुआती परवरिश एक 'सैन्य छावनी' में हुई थी। वे अक्सर कहते थे -"फौजी बस्तियों का माहौल आम नागरिक इलाकों से अलग होता था। बाबा साहब का मानना था कि सेना ने दलितों को आत्मसम्मान और अनुशासन सिखाया। वे महू की उस पृष्ठभूमि को श्रेय देते थे जिसने उन्हें निडर बनाया।

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