‘अक्खी’ मुंबई का ‘भाई’ भाजपाई: धुरंधर बनकर उभरे देविंदर
KHULASA FIRST
संवाददाता

महाराष्ट्र में फिर लहराया भगवा, 29 में से 25 महानगरपालिका में महायुति की जीत
तीन दशक से मुंबई की सत्ता पर काबिज ठाकरे परिवार का गढ़ ढहा, पहली बार भाजपा का मेयर
नायक बनकर उभरे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, शिंदे के साथ मिलकर मुंबई में रचा इतिहास
महाराष्ट्र में भाजपा ने वर्षों से स्थापित सियासी घरानों के किले ढहाए, कांग्रेस के हिस्से फिर मायूसी
‘ठाकरे परिवार' एक होकर भी मुंबई को बचा नहीं पाया, बीएमसी में नहीं चल पाया ‘मराठी' मानुष का मुद्दा
पवार परिवार की एकजुटता भी हुई धूल-धूसरित, पुणे व पिंपरी चिंचवड़ में भाजपा से मिली करारी मात
मुंबई की जीत से प्रधानमंत्री मोदी गद्गद्, बोले- पंचायत से पार्लियामेंट तक भाजपा पर भरोसा
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इसी मुंबई में आज से 46 साल पहले भारतीय राजनीति के युगदृष्टा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने एक स्वप्न देखा था और इसी मायानगरी में उन्होंने इस स्वप्न का खुलासा किया था। उन्होंने मुंबई के मशहूर शहीद पार्क की महती सभा में अपने नूतन राजनीति दल भाजपा के गठन के मौके पर कहा था- अंधेरा छंटेगा... कमल खिलेगा।
कमल यूं तो देशभर में 2014 से ही खिल गया, लेकिन स्वप्नदृष्टा नेता ने जहां अपने स्वप्न का रहस्योद्घाटन किया था, उस मुंबई में कमल कल, यानी शुक्रवार को खिला। भाजपा का कमल वृहन्मुंबई महा नगरपालिका में पहली बार खिला और भाजपा के गठन के बाद पहली बार मुंबई में कमलदल का मेयर भी बनने जा रहा है।
अटल के स्वप्न एक-एक कर साकार हो रहे हैं। महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनाव में कांग्रेस फिर हंसी का पात्र बन गई। अटलजी ने कहा था- एक दिन देश कांग्रेस पर हंसेगा।
महाराष्ट्र, भाजपा का नया ‘पॉवर हाउस' बन गया। नगरीय निकाय के चुनावों में एक बार फिर समूचे महाराष्ट्र में भगवा लहरा गया। असली शिवसेना के ‘तीर-कमान' को साथ ले सब तरफ बस कमल ही कमल ही खिल गया। 29 महानगरपालिकाओं में से भाजपा महायुति ने 25 पर प्रचंड विजय प्राप्त की।
इसमें मुंबई सबसे अहम है। यहां ठाकरे परिवार की तीन दशक की सत्ता को परास्त कर दिया। अब वृहन्मुंबई पालिका में पहली बार भाजपा का मेयर बनेगा। यानी ‘अक्खी' मुंबई का ‘भाई' भाजपाई बन गया है। भाजपा ने इस स्थानीय निकाय के चुनाव में महाराष्ट्र की राजनीति में वर्षों से स्थापित सियासी घरानों के किले ढहा दिए।
इस चुनाव में मुख्यमंत्री ‘देविंदर' असली ‘धुरंधर' बनकर उभरे। एकनाथ शिंदे के साथ ने ‘देवा भाऊ' को योगी आदित्यनाथ के समकक्ष खड़ा कर दिया है। शिंदे भी शिवसेना के ‘असली बॉस' बनकर स्थापित हो गए।
आपके पक्के इंदौरी अखबार खुलासा फर्स्ट ने शुक्रवार को इंदौरी मसलों से परे जाकर महाराष्ट्र, खासकर मुंबई तक नजरें दौड़ाई थीं। कारण था नगरीय निकायों के चुनावों की काउंटिंग, जिसमें प्रारंभिक रुझान आना शुरू हुए थे। काउंटिंग सुबह 8 के बजाय 10 बजे से शुरू हुई थी।
लिहाजा अखबार के वक्त तक स्थिति स्पष्ट नहीं थी कि हाल क्या रहेंगे? खासकर मुंबई में। क्योंकि मुंबई सब दलों की प्रतिष्ठा का मसला था। रुझानों में भाजपा महायुति व शिवसेना महाअघाड़ी के बीच कांटे की टक्कर चल रही थी, लेकिन खुलासा फर्स्ट ने ये खुलासा कर दिया कि मुंबई की किंग भाजपा बनने जा रही है। शाम तक ये साफ भी हो गया और भाजपा पहली बार मुंबई की सत्ता पर काबिज हो गई।
227 नगर सेवकों वाली वृहन्मुंबई पालिका में भाजपा गठबंधन ने 118 सीट जीती। इसमें 89 सीट के साथ भाजपा सबसे बड़ा दल बनकर उभरी। शिवसेना उद्धव को 64 सीटें मिलीं व कांग्रेस 24 तक आकर रुक गई। अब मुंबई में देवेंद्र फड़णवीस की खम ठोंककर की गई घोषणा के मुताबिक हिंदू व मराठी मेयर बनने जा रहा है।
फड़णवीस ने इस जीत को मोदी के विकास के विजन से जोड़ते हुए कहा, एक बार फिर ये स्पष्ट हो गया कि अब मुंबई व महाराष्ट्र में विभाजन की राजनीति नहीं चलेगी। भाजपा ने नागपुर, पुणे, ठाणे, नाशिक, संभाजी नगर आदि बड़े शहरों में ऐतिहासिक जीत हासिल की।
खास बात ये रही कि भाजपा ने ये चुनाव पूरी तरह स्थानीय नेताओं के दम पर लड़े और जीते। एक भी राष्ट्रीय नेता को नगरीय निकाय चुनावों में मैदान में न उतारकर भाजपा ने बाहरी का मुद्दा बनने ही नहीं दिया।
ठाकरे-पवार परिवार के किले ढहे, ‘मराठी मानुष' भी बेअसर
इस चुनाव में भाजपा ने एक साथ तीन जवाब दिए और तीनों लाजवाब दिए। पहला जवाब हिंदू हृदय सम्राट स्व. बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर दावा करने वाले ठाकरे बंधुओं को दिया। 22 साल बाद दोनों भाई उद्धव ठाकरे व राज ठाकरे एक साथ आए थे, लेकिन वे मुंबई को बचा नहीं पाए और 30 साल से भी ज्यादा समय से मुंबई में बने एकछत्र राज को खो बैठे।
मुंबई को तमाम उतार-चढ़ाव के बाद ठाकरे परिवार की एक तरह से जागीर माना जाता था। भाजपा ने वह अब छीन ली। भाजपा ने दूसरा जवाब मराठा क्षत्रप शरद पवार को दिया। पवार परिवार भी तमाम मतभेद छोड़ लगभग एक दशक बाद एकजुट हुआ था।
काका-भतीजे यानी शरद व अजित पवार ने साथ मिलकर उस पुणे व पिंपरी चिंचवड़ में चुनाव लड़ा, जो पवार परिवार की राजनीतिक विरासत का हिस्सा रहा है। इन दोनों महानगर में पवार परिवार भाजपा के हाथों बुरी तरह हारा। तीसरा जवाब भाजपा ने अपनी चिरप्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को दिया, जिसने एक अलग रणनीति से चुनाव लड़ा, लेकिन उसे भी मात मिली।
रशीद मामू-इकबाल मूसा ले डूबे बालासाहेब की ‘विरासत का जहाज'
उद्धव ठाकरे को मुंबई पर खूब भरोसा था। इसलिए उन्होंने राज ठाकरे से भी हाथ मिलाया था। वे इतने आश्वस्त थे कि इंडी गठबंधन में होने के बावजूद उन्होंने इस चुनाव में कांग्रेस को भी दूर कर दिया था और हाथ नहीं मिलाया।
अकेले चुनाव इसलिए लड़े कि उन्हें उम्मीद थी कि मुस्लिम वोट उन्हें ही मिलेंगे। इसके लिए उन्होंने इकबाल मूसा व रशीद मामू जैसे नेताओं का साथ लेने में भी गुरेज नहीं किया। दोनों नेताओं का 1993 के मुंबई बम धमाकों से नाता रहा है।
विचारधारा से इस समझौते का ही परिणाम रहा कि उद्धव संभाजी नगर तो दूर, ‘आमची मुंबई' भी नहीं बचा पाए। संभाजी नगर में उन्होंने रशीद मामू को पार्टी में लेकर सबको चौंका दिया था, लेकिन परिणामों ने उन्हें चौंका दिया।
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