आखिर पंडित ही निशाने पर क्यों: मोदी सरकार का सेंसर बोर्ड क्या सो रहा है; घूसखोर पंडत को लेकर देशभर के ब्राह्मणों में जबरदस्त गुस्सा
KHULASA FIRST
संवाददाता

फिल्म निर्माता, अभिनेता, निर्देशक, नेटफ्लिक्स का विरोध
सोशल मीडिया से कानून की चौखट तक पहुंचा
‘घूसखोर’ जैसे नकारात्मक शब्द के साथ ‘पंडत’ जैसे शब्द के इस्तेमाल से भड़के गुस्से के बाद कोर्ट में याचिका
पंडित शब्द भारतीय समाज में सभ्यता, ज्ञान, नैतिकता, धार्मिक आस्था का अटूट प्रतीक, घूसखोरी से जोड़ना अपमानजनक
कानूनी व सामाजिक विरोध के बाद अभिनेता, निर्माता ने दी सफाई, योगी सरकार ने एफआईआर दर्ज करने के दिए निर्देश
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दिल्ली की हुकूमत ‘राष्ट्रवादी सरकार’ के हवाले है। सरकार के सिरमौर लोग सदियों से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रहे हैं। ये नारा विपक्ष में रहते हिंदुस्तान में खूब गूंजता था, लेकिन लगता है सत्ता में आने के बाद इस नारे के मायने बदल गए या सरकार के लिए ये नारा अब बेमानी हो गया। तब ही तो आए दिन अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशभर में विवाद खड़े हो जाते हैं या कर दिए जा रहे हैं।
ताजा मसला एक वेब सीरीज के शीर्षक से जुड़ा है। इससे पंडित बिरादरी यानी ब्राह्मण समुदाय आहत हुआ है। समाज का फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, सरकार से भी सवाल है कि हर बार पंडित ही निशाने पर क्यों? दूजा सवाल हमारा भी सरकार से है कि ये सब विवाद सेंसर बोर्ड के रहते कैसे हो जाता है? बोर्ड सो रहा है या सरकार?
ओ टीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आने वाली फिल्मों और सीरीज को लेकर अक्सर चर्चाएं होती रहती हैं, लेकिन इस बार अभिनेता मनोज वाजपेयी की आगामी थ्रिलर ‘घूसखोर पंडत’ रिलीज से पहले ही विवादों में घिर गई है। जैसे ही इस प्रोजेक्ट का टीजर सामने आया, वैसे ही इसके नाम को लेकर आपत्ति दर्ज होने लगी। मामला अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी नोटिस और कोर्ट तक पहुंच चुका है। इंदौर-भोपाल में इस मुद्दे ने आंदोलन की राह पकड़ ली है।
इस थ्रिलर सीरीज में मनोज वाजपेयी एक ऐसे पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं जो ईमानदारी से कोसों दूर है। उनका किरदार नैतिक रूप से कमजोर और भ्रष्ट दिखाया गया है, जिसे लोग एक उपनाम से जानते हैं और वह है पंडत।
कहानी एक ही रात की घटनाओं के ईर्द-गिर्द घूमती है, जहां एक घायल लड़की से सामना होने के बाद यह किरदार एक बड़े षड्यंत्र में उलझ जाता है। सीरीज में नुसरत भरुचा और साकिब सलीम भी अहम भूमिकाओं में नजर आने वाले हैं।
निर्देशन की कमान ऋतेश शाह ने संभाली है, जबकि लेखन में उनके साथ नीरज पांडे जुड़े हैं।
विवाद की जड़ इस सीरीज का टाइटल है। कुछ लोगों का कहना है कि ‘घूसखोर’ जैसे नकारात्मक शब्द को ‘पंडत’ जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जोड़ना आपत्तिजनक है। इसी आधार पर एक वकील की ओर से मेकर्स और नेटफ्लिक्स को कानूनी नोटिस भेजा गया, जिसमें दावा किया गया कि ये नाम एक पूरे समुदाय की छवि को नुकसान पहुंचाता है।
नोटिस में कहा गया है कि ‘पंडित’ शब्द भारतीय सभ्यता में ज्ञान, नैतिकता और धार्मिक आस्था का प्रतीक रहा है, ऐसे में इसे भ्रष्टाचार जैसे शब्द के साथ जोड़ना अपमानजनक है। आपत्ति जताने वालों का तर्क है कि भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति का दोष हो सकता है, न कि किसी समुदाय की पहचान।
विवाद बढ़ने के साथ ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कुछ संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। सबसे ज्यादा गुस्सा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नजर आ रहा है। आरोप लगाया जा रहा है कि इस सीरीज के जरिए एक खास वर्ग को गलत तरीके से दिखाया जा रहा है।
इसके अलावा दिल्ली हाई कोर्ट में भी एक याचिका दाखिल की गई है, जिसमें सीरीज की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस तरह की सामग्री संविधान के तहत मिले समानता, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन कर सकती है, साथ ही ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी की कमी पर भी सवाल उठाए गए हैं।
‘घूसखोर पंडत’ को लेकर उठे विवाद के बीच अब खुद मनोज वाजपेयी ने इस पूरे मामले पर चुप्पी तोड़ी है। अभिनेता ने साफ किया है कि इस प्रोजेक्ट में उनकी भागीदारी किसी समुदाय को लेकर नहीं, बल्कि एक किरदार और उसकी कहानी तक सीमित थी।
उन्होंने कहा कि लोगों की भावनाओं का वो पूरा सम्मान करते हैं और अगर किसी को ठेस पहुंची है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। एक अभिनेता के तौर पर वह हमेशा किरदार की मानसिकता और कहानी के सफर पर ध्यान देते हैं। इस सीरीज में भी उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को निभाया है, जो खामियों से भरा है और आत्मबोध की प्रक्रिया से गुजरता है। यह किसी भी तरह से किसी समुदाय पर टिप्पणी या आरोप नहीं था।
दर्शकों की भावनाओं का होगा सम्मान- वाजपेयी... मनोज वाजपेयी ने बताया कि नीरज पांडे के साथ उनके लंबे अनुभव में उन्होंने हमेशा फिल्ममेकिंग को लेकर गंभीरता और संवेदनशीलता देखी है। मौजूदा हालात को देखते हुए मेकर्स ने सोशल मीडिया से सीरीज का प्रमोशनल कंटेंट हटाने का फैसला लिया है।
अभिनेता के अनुसार यह कदम इस बात का संकेत है कि दर्शकों की भावनाओं को गंभीरता से लिया जा रहा है। नीरज पांडे ने भी सफाई दी। पांडे ने भी स्पष्टीकरण जारी किया कहा कि ये पूरी तरह से एक काल्पनिक पुलिस ड्रामा है और ‘पंडत’ शब्द सिर्फ एक काल्पनिक किरदार का बोलचाल वाला नाम है।
कहानी किसी जाति, धर्म या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि एक व्यक्ति के फैसलों और उसके कर्मों पर केंद्रित है। नीरज पांडे ने यह भी कहा कि वह हमेशा जिम्मेदारी के साथ कहानियां कहने में विश्वास रखते हैं।
मामला और गहराया, एफआईआर के आदेश... विवाद यहीं नहीं थमा। खबरों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फिल्म के निर्देशक और टीम के कुछ सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कंटेंट से सार्वजनिक भावनाएं आहत हुई हैं और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंच सकता है।
इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या सीरीज का नाम बदला जाएगा या यह प्रोजेक्ट तय समय पर रिलीज हो पाएगा। ये विवाद एक बार फिर उस बहस को हवा दे रहा है, जहां रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी आमने-सामने खड़ी नजर आती हैं। एक ओर फिल्मकार अपनी कहानी कहने की आजादी की बात करते हैं तो दूसरी ओर कुछ वर्ग इसे सांस्कृतिक भावनाओं से जोड़कर देख रहे हैं।
हर वर्ष कोई न कोई ऐसी फिल्म आती है, जो कभी सनातन धर्म को चोट पहुंचाती है, कभी राजपूत समाज को लज्जित करती है, कभी ब्राह्मण समाज को नीचा दिखाने की कोशिश करती है। सोशल मीडिया से सड़क तक विरोध करेंगे। सरकार तो आनंद में सो रही है। सेंसर बोर्ड की नाक के नीचे से ‘घूसखोर पंडत’ का बन जाना सरकारी नींद का ही परिचायक है। - विकास अवस्थी, संस्थापक, सर्व ब्राह्मण युवा परिषद
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