प्रभारी नहीं..! सब पर भारी तो आप ही हैं ‘श्रीमान’: मुख्यमंत्री से आज इंदौर को बहुत आस; सबकी नजरें सीएम के इंदौरी विजन पर
पड़ोसी होने के नाते मुख्यमंत्री से इंदौर ने पाल रखी थी बहुत- सी उम्मीदें, क्या अब परवान चढ़ेंगी? दो बरस में आना-जाना तो कई बार हुआ, शहर की जरूरत का कामकाज न के बराबर दर्ज हुआ इंदौर के प्रति उज्जैन जैसे
Khulasa First
संवाददाता

पड़ोसी होने के नाते मुख्यमंत्री से इंदौर ने पाल रखी थी बहुत- सी उम्मीदें, क्या अब परवान चढ़ेंगी?
दो बरस में आना-जाना तो कई बार हुआ, शहर की जरूरत का कामकाज न के बराबर दर्ज हुआ
इंदौर के प्रति उज्जैन जैसे अनुराग की दरकार, अहिल्या नगरी में अब तक हो रहा इंतजार
‘जगत मामा’ भी 2021 में ऐसे ही कर चुके इंदौर विकास विजन की तामझाम वाली बैठक, नतीजा शून्य ही रहा
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दो बरस बाद ये सुनकर बहुत हैरत हुई कि आप इस इंदौर जिले के प्रभारी मंत्री नहीं, यानी हम यूं ही जबरिया गद्गद् थे कि चलो पहली बार स्वयं सरकार इस शहर की पालक बनी है। सरकार के मुखिया की निगहबानी के कारण क्या हम जबरन ही ‘पोमा’ रहे थे? अहिल्या नगरी तो इतरा ही रही थी कि ‘सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का…’।
आपने तो एक ही झटके में हमारा ‘पोमना’ खत्म कर दिया। अब हम जगत को क्या मुंह दिखाएंगे? अब तक गली मोहल्ले, चौक-चोबारों पर हेकड़ी दिखाते फिरते थे कि इंदौर के प्रभारी मध्यप्रदेश के मुखिया स्वयं हैं, लेकिन आपने तो ये बोलकर हमारा दिल ही तोड़ दिया कि आप कोई इंदौर जिले के अरभारी-प्रभारी नहीं।
साथ ही कहकर और अचंभे में डाल दिया कि इंदौर जिले के प्रभारी मंत्री की कुर्सी खाली है। अब इस बात के पीछे क्या राजनीतिक ‘गणित-ज्ञान’ है, हम भोले-दयालु इंदौरी नहीं समझते। हम तो बस इतना जानते हैं कि आप भले ही प्रभारी नहीं, लेकिन सब पर भारी तो हैं ही ‘श्रीमान’। लिहाजा यह शहर आपसे बहुत भारी उम्मीदें पाले बैठा है। आपसे बस एक ही इल्तिजा है कि आप इन उम्मीदों को ‘परभारे’ मत छोड़ देना।
अहिल्या नगरी को भी श्रीमान आपसे अवंतिकापुरी के अनुरूप अनुराग की नितांत जरूरत है। जैसे आपका पूरा फोकस आपके गृहनगर पर है, वैसे ही इस पड़ोसी इंदौर को भी मिलने की बहुप्रतीक्षित आस है। अरसा हो गया, मध्य प्रदेश की इस आर्थिक राजधानी का कोई धणी-धोरी नहीं। जो थे, उनका आज कोई धणी-धोरी नहीं, न उन्हें इस कुटिल राजनीति ने इस लायक छोड़ा कि वे इस शहर के धणी हो जाएं।
खैर, ये आपके राजनीतिक घराने के अंदर की बातें हैं, इससे औसत इंदौरी का क्या लेना-देना? वो बापड़ा इतने अंदर की राजनीति को कहां समझता? उसे तो बस अपने इंदौर से प्यार है और वह अपन के इस शहर को फलता-फूलता, बढ़ता-अकड़ता देखना चाहता है।
वह चाहते हैं कि इंदौर हर दौर में प्रदेश का ही नहीं, देश के सिरमौर के रूप में शुमार हो। देश के प्रधानमंत्री भी अपन के इंदौर की तारीफो में गाहे-बगाहे कशीदे काड़ते रहते हैं। आप पंतप्रधान के ‘डायरेक्ट प्रतिनिधि’ हैं। लिहाजा आपसे एक नहीं, अनेकानेक उम्मीदें हम सबने पाल रखी हैं।
श्रीमान आपके पूर्ववर्ती श्रीमान भी इस इंदौर को अपने सपनों का शहर मुकर्रर किए हुए थे। ‘मेरे सपनों का शहर’ शब्द उनकी जुबां पर जब-तब बना ही रहता था। वे जगत मामा थे। उनका भी दिन-रात इस शहर में खूब आना-जाना था।
तब भी हम इंदौरियों ने कई सपने पाल लिए थे, लेकिन अंततः वे सब सपने ही साबित हुए। मेरे सपनों का शहर महज जुमला निकला और ये शहर राजनीतिक व प्रशासकीय रूप से ‘जमूरा’ ही साबित हुआ।
शहर के सर्वांगीण विकास के नाम का डमरू इस शहर पर कम से कम डेढ़ दशक तक बजता रहा, लेकिन डेवलपमेंट के शंखनाद को ये शहर तरसता ही रहा। 2021 में भी इसी तरह इंदौर विकास विजन का तामझाम जुटा था। ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर इसका गवाह बना था। महीना जनवरी का था और शहर के बाशिंदों को बहुत से विजन दिखाए-जंचाए गए थे, लेकिन एक भी पूरा नहीं हुआ।
न लकड़ी मंडी व रेती मंडी शहर से दूर गई, न किराना, अनाज, लोहा मंडी शहर से बाहर हुई। तब भी ट्रैफिक का बड़ा भारी प्लान बनाया था, लेकिन अब ये ट्रैफिक शहर की सबसे बड़ी व विकराल समस्या हो गई है। अब तो शहर तो दूर बायपास व रिंगरोड जैसे इलाके भी ट्रैफिक जाम के रोज शिकार हैं। इंदौर वालों को आपके उज्जैन आने में ही पसीने छूट रहे हैं। देवास ही नहीं, महू-राऊ जाना भी दुश्वार हुआ पड़ा है। खेड़ी घाट और ओंकारेश्वर तो दूर सागर कुटी-पीथमपुर तक के हाल बेहाल हैं।
इंदौर को भी उज्जैन जैसे अनुराग की बेहद दरकार
पड़ोसी होने के नाते अपन के इंदौर ने आपसे पहले ही दिन से बहुत सी उम्मीदें पाली हुई हैं। अरसे बाद मालवा से कोई सरकार का मुखिया हुआ तो हम बहुत खुश हुए। ये खुशफहमी तब और भी बढ़ गई जब देखा कि प्रदेश का मुखिया ठेठ मालवी भी है। ऐसे में हम सब मालवे फूले न समाए।
आपकी चाल-ढाल, हाव-भाव, खान-पान, शौक-मौज बिल्कुल हमारे इंदौर जैसे ही हैं। वैसे भी इंदौर-उज्जैन में कोई फर्क नहीं। आम इंदौरी उज्जैन को भी अपना ही घर मानता है, इसलिए आपका सीएम बनना इंदौर का भी मान बढ़ा गया। अब आपकी बारी है। आप इस शहर का मान बढ़ाएं।
इस शहर ने जो उम्मीदें आपकी ताजपोशी के साथ लगा ली थीं वे सब पूरी करें। ये शहर भी आपके उस अनुराग का आकांक्षी है जो उज्जैन को आपसे मिल रहा है।
‘घराने’ की ऊंच-नीच से इंदौर का क्या लेना-देना?:
आपसे बड़ा कौन? मुख्यमंत्री से बड़ा क्या प्रभारी मंत्री होता है? आपकी ये सदाशयता व साफगोई है कि आप स्वयं को प्रभारी मंत्री नहीं मानते और न इस शहर को पूर्ववर्ती श्रीमान की तरह सपने दिखाते हैं, लेकिन उस आस का मान रखना अब आपकी अहम जिम्मेदारी है जो इंदौर ने एक मालवावासी और अपने पड़ोसी से लगा रखी है।
इस शहर को आपके राजनीति घराने की ऊंच-नीच से क्या लेना-देना? अगर कुछ मसला है भी तो उसमें इंदौर और इंदौरियों का क्या कसूर? वह तो आपको प्रदेश का मुखिया बनते देख व जिले का प्रभारी बनने पर गदगद हुआ था।
लिहाजा आप आज भी और कल भी सब पर भारी ही हैं। अब इंदौर की भारी भरकम समस्याओं के निराकरण की जवाबदेही आपकी ही है। नैतिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक रूप से भी।
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