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मौत क्यों बन रही वोटर्स से मुलाकात: बीएलओ की मौत से उपजते सवाल; आखिर इतना कितना काम का दबाव?

Khulasa First

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संवाददाता

27 नवंबर 2025, 12:53 pm
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मौत क्यों बन रही वोटर्स से मुलाकात

एसआईआर : मौत काम का दबाव या काम करने की आदत का अभाव?

22 दिन, 7 राज्य, 25 मौत, एमपी में सबसे ज्यादा 9

एक माह की अवधि में करना है काम, एक बीएलओ के जिम्मे अधिकतम 1200 वोटर्स

एक महीने की अवधि में बीएलओ को 250 के करीब परिवारों से मिलना है

ऑफिशियल ड्यूटी के 8 घंटे से भी कम समय में हो रहा काम, फिर क्यों हैं परेशान?

बीएलओ को राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं का भी मिल रहा सहयोग, जनता भी साथ

एक बूथ के मतदाता पूरे वार्ड, विधानसभा में नहीं फैले हैं, सब बूथ अगल-बगल के रहवासी

बीएलओ की मौत का असली कारण सामने आए, दबाव बनाने वाले अफसरों पर हो कार्रवाई

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बी एलओ तो पहले भी आप और हमारे दरवाजे पर दस्तक देते थे। लगभग सालभर ही निर्वाचन आयोग के निर्देश पर मतदाता सूचियों पर काम होता रहता है। नाम जोड़ने-घटाने और दुरुस्त कराने की ये प्रक्रिया सतत गतिमान है। फिर ऐसा इस बार क्या हो गया कि इस कवायद ने इस काम में लगे अमले की सांस की गति को थाम दिया? ये सवाल मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण अभियान में आए दिन हो रही बीएलओ की मौत से उपजा है।

क्या वाकई ये मौतें एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान काम के दबाव से हो रही हैं? या काम करने की आदत का अभाव इसके लिए जिम्मेदार है? आखिर क्या कारण है कि महज 22 दिन में मतदाता सूची शुद्धिकरण अभियान में लगे 25 लोगों की मौत हो गई। ये मौत 7 राज्यों में हुई है। इनमें सबसे ज्यादा 9 मौत आपके-हमारे मध्य प्रदेश में हुई हैं।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, तमिलनाडु व केरल राज्य हैं। अब सवाल फिर वही कि ये मौतें क्या अभियान के तहत काम के दबाव के कारण हुईं? निर्वाचन आयोग इस बात को सिरे से नकार रहा है। उसका दावा है कि किसी भी राज्य से काम के दबाव से बीएलओ की मौत की पुष्टि नहीं हुई है।

अगर आयोग सही है तो फिर ये एक के बाद एक जानें क्यों जा रही हैं? इस सवाल की पड़ताल चुनाव आयोग के साथ समय रहते संबंधित राज्य सरकारों को भी करना चाहिए, ताकि शुद्धिकरण अभियान जैसी अहम प्रक्रिया सवालों के घेरे में न आए।

आखिर ऐसा कौन-सा दबाव है, जो अमले के हृदय की धड़कन को थाम दे रहा है? क्या स्थानीय अफसर इसे लेकर कोई अनावश्यक दबाव अमले पर बना रहे हैं या अमले में ऐसे कर्मचारियों की तैनाती कर दी गई, जो स्वास्थ्यगत परेशानियों से पहले से ही जूझ रहे हैं? इस काम में ज्यादातर स्कूली शिक्षा विभाग का अमला हर बार की तरह लगा है। यूं भी मैदान में काम करने वालों में अधिसंख्य उम्रदराज हैं। ऐसे में मौत का सही कारण ही प्रक्रिया को लेकर अमले में उत्साह बरकरार रख सकता है।

क्या सरकारी कर्मचारी काम करने से मर जाता है? उसे तो सरकारें जब-तब कोल्हू के बैल जैसा काम में जोत देती हैं। मतगणना, जनगणना व पशुगणना तक सरकारी कारिंदों के हिस्से में ही तो आए हैं। करोड़ों मतदाताओं वाले देश के साफ-सुथरे चुनाव व चुनाव प्रक्रिया के श्रेय का असली हकदार तो वे ही हैं।

वाहवाही भले ही चुनाव आयोग के खाते में दर्ज हो, लेकिन जमीन पर काम सरकारी महकमों से जुड़े अमले का होता है। ये अमला कोई आज से पसीना बहा रहा है? देश के पहले आम चुनाव से ये चुनाव करवा रहा है। मतदाता सूची जांच रहा है, वोट जोड़ रहा है, हटा-घटा भी रहा है। घर-घर दस्तक भी दे रहा है।

फिर इस बार हल्ला क्यों? मतदाता सूचियों की जांच में उसकी जान तक जा रही है? जबकि इस बार का काम तो देश की आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ा है। पहली बार हो रहे इस काम को लेकर कुछ परेशानियां हो सकती हैं, लेकिन ये परेशानियां जान ले लें... संभव है?

बीएलओ की देशभर में हो रही मौतें इसी सवाल को खड़ा कर रही हैं, जो मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम को कटघरे में खड़ा कर रही हैं, क्योंकि काम के दबाव में सरकारी कर्मचारियों की मौत हो जाने के मामले, निजी क्षेत्र की तुलना में अब तक नगण्य ही हैं।

बीएलओ की मौत प्रोपेगंडा या हकीकत?
बीएलओ की इतनी बड़ी संख्या में मौत को देश का एक बड़ा वर्ग एक नया प्रोपेगंडा बता रहा है। उसका कहना है कि ऐसा ही दुष्प्रचार किसान आंदोलन के वक्त भी किया था कि किसानों की मौत आंदोलन से हो रही हैं। ऐसा ही अब शोर मचा हुआ है कि देशभर में एसआईआर के कारण बीएलओ पर काम का काफी प्रेशर है और वे आत्महत्या तक कर रहे हैं।

लेकिन एसआईआर से संबंधित कुछ फैक्ट्स हैं, जो आम जनता को शायद नहीं पता हैं कि आयोग ने इस प्रक्रिया को इतना सरल बनाया है कि दबाव की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं है। इसमें सबसे अहम प्रक्रिया समय सीमा है। ये काम 4 नवंबर से लेकर 4 दिसंबर 2025 तक यानी एक महीने में पूर्ण करना है। दो-चार दिन या सप्ताह-दो सप्ताह में नहीं।

एक महीने में हजार-बारह सौ वोटर्स से होना है संपर्क
मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का काम महीनाभर चलना है और ये समय सीमा भी आगे बढ़ाई जा सकती है। आयोग की मानें तो इस एक माह में एक बीएलओ को 1000 से 1200 वोटर्स से मिलने का लक्ष्य दिया गया है। अब अगर मान लें कि एक परिवार में 3 से 4 वोटर हैं तो एक बीएलओ को एक महीने में कम से कम 250 परिवार से मिलने का टास्क दिया गया है।

यानी 30 दिन के हिसाब से हर दिन 8 से 9 परिवार के बीच पहुंचना है। अब यदि एक परिवार के साथ बिताया गया एवरेज समय 30 मिनट भी मान लिया जाए तो ये कुल मिलाकर 4 से 5 घंटे होते हैं, जो नियमानुसार किसी भी सरकारी ड्यूटी के ऑफिशियल समय (8 घंटे) से कम ही होते हैं। आयोग के सूत्रों का ये तर्क बताता है कि एसआईआर प्रक्रिया में बीएलओ पर कितना प्रेशर है।

बीएलओ को बूथ पर ही तो करना है काम, पूरी विधानसभा में नहीं
बीएलओ को ये काम एक ही बूथ पर करना है। उसे न पूरे वार्ड की जिम्मेदारी दी गई है और न विधानसभा क्षेत्र के अन्य हिस्सों की। इस लिहाज से देखा जाए तो एक बूथ के सारे मतदाता एक ही जगह या मोहल्ले में मौजूद रहते हैं, न कि पूरे विधानसभा या वार्ड में फैले रहते हैं।

दूसरी तरफ इस काम में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं का साथ भी बीएलओ को मिल रहा है। इस बार तो जनता भी जबरदस्त रूप से जागरूक है और वह स्वयं ही पहल कर बीएलओ तक पहुंच रही है। ऐसे में दबाव से मौत की बातें कई सवाल खड़े कर रही है, जिसका जवाब मरने वालों के परिजन ही नहीं, मतदाता भी चाह रहे हैं।

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