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मौत से किसकी रिश्तेदारी है: आज कैलाश विजयवर्गीय, तो कल किसी और विधायक के क्षेत्र में होंगे हाल बेहाल, फिर क्या?

जनता मरे तो मरे: भागीरथपुरा क्षेत्र में जहां आमजन दूषित पानी पीकर मर रहे हैं, वहीं मंत्रीजी क्षेत्र का दौरा करते हुए अपने घर का शुद्ध पानी पीते हैं। आज कैलाश विजयवर्गीय, तो कल किसी और विधायक के क्षेत्र में होंगे हाल बेहाल, फिर क्या? मुख्यमंत्री जिस शहर के सरमायेदार, उस शहर की ब्यूरोक्रेसी क्यों बेलगाम?

KHULASA FIRST

संवाददाता

02 जनवरी 2026, 7:53 पूर्वाह्न
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मौत से किसकी रिश्तेदारी है

जनता मरे तो मरे: भागीरथपुरा क्षेत्र में जहां आमजन दूषित पानी पीकर मर रहे हैं, वहीं मंत्रीजी क्षेत्र का दौरा करते हुए अपने घर का शुद्ध पानी पीते हैं।

मुख्यमंत्री जिस शहर के सरमायेदार, उस शहर की ब्यूरोक्रेसी क्यों बेलगाम?

विधानसभावार हुई बैठक में भी हर पार्षद यही बोला था- अधिकारी नहीं सुनते

महापौर भोपाल चिट्ठी भी लिख चुके कि शहर में तैनात बड़े अधिकारी काम नहीं कर रहे

मुख्यमंत्री इंदौर के प्रभारी मंत्री, फिर भी जनप्रतिनिधियों की एक ही शिकायत- जनता के काम नहीं हो रहे

प्रदेश के जल संसाधन मंत्री सिलावट भी इंदौर के ही, उनसे भी तो हो सवाल-जवाब

भागीरथपुरा का टेंडर अफसर रोके बैठे थे, निगम जलकार्य प्रभारी बबलू शर्मा क्या कर रहे थे?

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट इंदौर।
मौत से किसकी रिश्तेदारी है? आज हमारी तो कल उनकी बारी है..!! सत्तर के दशक की सुपरहिट फिल्म मुकद्दर का सिकंदर का ये लोकप्रिय डायलॉग इंदौर की फिजाओं में फिर मंडरा गया है। मसला भागीरथपुरा दूषित जलकांड में हुई दर्जनभर से ज्यादा मौतों से जुड़ा है।

आज जो हालत विधायक कैलाश विजयवर्गीय की विधानसभा के हुए, क्या गारंटी कि वह जिले के अन्य 8 विधायकों के इलाके में नहीं होंगे? विजयवर्गीय तो मोहन सरकार के वरिष्ठतम मंत्री हैं। बावजूद इसके उनके क्षेत्र के ये हाल कर दिए गए तो शेष विधायक कौन-से खेत की मूली हैं?

जब लड़ने-भिड़ने वाले मैदानी नेता के इलाके की जनता से जुड़ी समस्या की फाइल अफसर दबाकर बैठ सकते हैं, तो बाकी जनप्रतिनिधि को बख्श देंगे क्या? आज जो विजयवर्गीय व उनकी विधानसभा क्षेत्र के हालात पर हंस रहे हैं, वे ये खुशफहमी न पालें कि शहर में तैनात अफसर उनसे कोई मुरव्वत रखेंगे। अगर रखेंगे या रख रहे, तो फिर ये भी स्पष्ट हो जाता है कि शहर की ब्यूरोक्रेसी के निशाने पर एक नेता, एक विधानसभा ही है। शेष सब ‘अपने वाले' हैं?

भागीरथपुरा की घटना से गमगीन इंदौर को ये समझ नहीं आ रहा कि जिस शहर के सरमायेदार स्वयं सरकार के मुखिया हैं, उस शहर की ब्यूरोक्रेसी बेलगाम क्यों? इस अफसरशाही की बेलगामी की बातें किस्सों-कहानियों में नहीं, नेताओं की मुंहजबानी सामने आ चुकी हैं।

याद है, कभी ऐसा भी हुआ है क्या कि किसी शहर का मेयर, राजधानी मुख्य सचिव को चिट्ठी लिखकर ये शिकायत करे कि अफसर सुनवाई नहीं कर रहे और जनता के काम पेंडिंग पड़े हुए हैं? नहीं सुना न? लेकिन इंदौर जैसे शहर में ये हो चुका है।

इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ये कर चुके हैं। तब इस पत्राचार को प्रदेश के सियासी हलकों में बेहद आश्चर्य के रूप में देखा गया था। इस बात को दो माह से ज्यादा समय हो गया। सूरत-ए-हाल फिर भी क्यों नहीं बदले?

हैरत की बात तो ये भी है कि भोपाल को लिखी चिट्ठी-पत्री के बाद महापौर ने विधानसभावार पार्षदों की बैठकें भी बुलाई थीं। हर पार्षद के इलाके के कामकाज के बहाने बुलाई गई इन बैठकों में भी हर विधानसभा क्षेत्र से एक ही सुर से एक ही बात निकलकर सामने आई थी कि अफसर बिलकुल सुन नहीं रहे और इस कारण इलाके के तमाम काम अटके पड़े हैं।

पार्षदों ने तो यहां तक मुखरता प्रदर्शित की कि अगर ये हालात रहे तो हम जनता के बीच दो साल बाद क्या मुंह लेकर जाएंगे? मेयर के साथ शहरभर के पार्षदों की बंद कमरा बैठकों में हुई बात मीडिया की सुर्खियां भी बनी।

तब भी लगा था कि शायद जनप्रतिनिधियों की बेबसी व शिकायतें असर दिखाएंगी, लेकिन ये बेअसर ही क्यों बनी रहीं? ये सवाल भागीरथपुरा की घटना से जनता व जनप्रतिनिधियों की जुबां पर फिर आ गया।

इंदौर के ऐसे हालात तो कभी नहीं रहे कि मेयर से लेकर मंत्री और सांसद से लेकर पार्षद तक ये शिकायतें करें कि उनकी सुनवाई नहीं हो रही। सुनवाई नहीं होने की शिकायतें तो सदैव जनता के हिस्से में ही आई थीं। नेताओं के हिस्से में ऐसा पहली बार होते देखा कि वे ये रोना रोएं कि शहर में तैनात अफसर उनके कहे पर कान नहीं धर रहे।

ये इंदौर के लिए भी एक बड़ा आश्चर्य है कि ‘ट्रिपल इंजिन' की सरकार के दौर में क्या ऐसा भी हो सकता है? शहर में तो अब तक ये ही प्रचलित रहा है कि नेता क्या नहीं कर सकता? वह भी सत्तारूढ़ दल का हुआ तो बात ही अलग है। भले ही वह अदना-सा नेता क्यों नहीं हो, लेकिन इंदौर में तो चुने हुए नेताओं की ही फजीहत हो गई। नतीजा भागीरथपुरा के बाशिंदों की असमय जलती हुई चिताओं के रूप में सामने आया।

इंदौर के माथे लगा कलंक लगातार तीसरे दिन भी राष्ट्रीय मीडिया की खबरों की फेहरिस्त में पहले नंबर पर बना हुआ है। नेशनल मीडिया में इस घटना पर इस शहर के लिए ये शब्द चल रहे कि अपनी सफाई के लिए ‘इतराने’ वाले इंदौर में पीने का साफ पानी तक नहीं।

लगभग सभी नामचीन चैनल के निशाने पर डॉ. मोहन सरकार के साथ-साथ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी हैं। पूरे देश में इस घटना के चर्चे अब साफ-सुथरे शहर से ज्यादा हैं कि गंदे पानी से 15 मौतें हो गईं, बावजूद इसके प्रदेश सरकार अब तक इस घटना के जिम्मेदार तय नहीं कर पाई।

सिवाय छोटे कारिंदों को फौरी सजा के अलावा किसी की बड़े अफसर की जवाबदेही 4 दिन बाद भी तय नहीं हुई, जबकि जांच रिपोर्ट भी सामने आ गई है कि देश में चल रहे ‘अमृत काल' में भी देश के सबसे स्वच्छ शहर के बाशिंदे हैजा-डायरिया जैसी बीमारी से असमय काल-कवलित हो गए। राष्ट्रीय मीडिया में मंत्री की हंसी व पीड़ितों का रुदन जगह छोड़ नहीं रहा। ठीक वैसे ही, जैसे नगर निगम के बड़े अफसर अपनी कुर्सी नहीं छोड़ रहे।

मंत्री सिलावट की कोई जवाबदेही नहीं? शर्मा किस बात के प्रभारी?
भागीरथपुरा की घटना ने एक सवाल और खड़ा किया है कि इस मामले में प्रदेश के शहर से जुड़े एक अन्य मंत्री तुलसी सिलावट की जवाबदेही अब तक तय नहीं हो रही? उनका महकमा तो उसी जल से जुड़ा है, जिसके दूषित हो जाने से 15 मौत हो जाती है।

जैसे नगरीय प्रशासन मंत्री होने के नाते विजयवर्गीय सबके निशाने पर हैं, वैसे ही प्रदेश के जल संसाधन मंत्री होते हुए सिलावट क्यों जवाबदेही से मुक्त हैं? सिलावट भी तो इंदौर का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन भागीरथपुरा की मौत की आंच व जांच से वे कोसों दूर नजर आ रहे हैं।

क्या उनकी कोई जवाबदारी नहीं कि उनके ही जिले में पीने का पानी जहर कैसे बन गया? एक बड़ा सवाल तो नगर निगम के जल प्रभारी बबलू शर्मा के इर्द-गिर्द भी मंडरा रहा है कि जब भागीरथपुरा की फाइल निगम के अफसर दबाकर बैठे थे तो बतौर जलकार्य प्रभारी वे क्या कर रहे थे? वे चुप क्यों रहे? क्या पार्षद कमल वाघेला ने शर्मा को नहीं बताया होगा कि अफसर टेंडर नहीं खोल रहे?

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