आखिर दोषी है कौन: या अंततोगत्वा प्रारब्ध ही मान लें इसे; जल में जहर का घटनाक्रम स्मार्ट इंदौर का
KHULASA FIRST
संवाददाता

अंशुल पंडित खुलासा फर्स्ट।
मानवता तब शर्मसार नहीं होती तब कोई घटनाक्रम घटता है, क्योंकि घटना-दुर्घटनाएं आकस्मिक बनती हैं, होती हैं, जिसमें जनहानि भी होती है, पर प्रश्न ये है कि यथार्थ में हो क्या रहा है? दोषी आखिर है कौन? मानवता के हनन से उतनी पीड़ा नहीं होती साहब जितनी सवालों के जवाब से जिम्मेदारों के हाथ खड़े कर देने से होती है।
बात सही भी है दुखी कौन नहीं है। इस घटनाक्रम से सवाल पूछने वाले भी और जवाब देने वाले भी, मरने वाले भी और मारने वाले भी, भले ही मरण किसी प्रणाली से ही क्यों न हुआ हो, हत्या तो हत्या है।
खैर पीड़ा तो सभी को है, इसमें कोई संदेह नहीं। अब बात सिर्फ स्मार्ट शहर तक कहां रही, ये मानवता के हनन का मामला तो राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन गया हैं, क्योंकि पीड़ा आखिर किसे नहीं है। अब लगता है दोषी शायद प्रणाली ही है, पर प्रणाली ही क्यों मान लें? लगता है ये तो अंततोगत्वा प्रारब्ध ही होगा, है ना... और वैसे भी हमारे सनातन धर्म में प्रारब्ध का भी तो महत्व है, उसे कैसे भूला जा सकता है और हम सनातन का झंडा भी तो बुलंद करने में ही लगे हैं।
फिर इतना दुखी भी तो किसी को नहीं होता कि मरने वालों के साथ वो भी मर जाए। तो फिर जिम्मेदार भी इतना दुखी कहां होंगे कि अपने जिम्मेदारी भरे पद को त्याग दें, क्योंकि मोह तो आखिर पद का ही है।
क्योंकि लगता है अफसरशाही ने कंधे बहुत कमजोर कर दिए, इसलिए जिम्मेदारी का बोझ उठा नहीं जा रहा पर करें क्या? उस बोझ को कुर्सी पर बैठे-बैठे सहन इसलिए कर लेते हैं, क्योंकि कुर्सी की गर्मी से कंधों की भी सिंकाई हो जाती है तो भला उस पद को कैसे त्याग दे।
इतने भी दुखी नहीं हैं भैया
और रही बात विकास की तो भैया देखो थोड़ा तो समझौता सभी जनमानस को करना पड़ेगा ही। देखो पूरा अमला विकास कर शहर को स्मार्ट बनाने में जो लगा है तो गड्ढे तो होंगे ही, खुदेगा तो सही। अब उसमें कोई बच के निकलता है तो कोई गिर जाता है।
खोदना भी तो जरूरी है विकास के लिए उसमें आप सभी शहरवासियों का सहयोग तो लगेगा न कि नहीं बोलो... बोलो... हां कि नहीं। सहयोग में भले जनजीवन की आहुति ही क्यों न लगे, लोक कल्याण के यज्ञ में अपनों का इतना तो योगदान देना पड़ेगा ना।
बोलो करोड़ों की जनसंख्या में अगर 17 लोगों की जान गई तो क्या हुआ। राष्ट्र के कल्याण, विकास के लिए तो ये महत्वपूर्ण योगदान ही तो है। क्यों जिम्मेदारों ? और उसका हर्जाना भी तो शासन दे रहा है और फिर फ्री इलाज भी तो, फिर कहां जिम्मेदार भाग रहे हैं अपने दायित्वों का पालन कर तो रहे ही हैं। बेचारे...
फिर काहे की क्रिया प्रतिक्रिया है
ये भी तो एक प्रणाली ही है और उसी प्रणाली को बखूबी चलायमान है शासन- प्रशासन। बिल्कुल सही तालमेल से ही तो सब चल रहा है। पार्षद के पास शिकायत आना, पार्षद का विधायक और महापौर को अवगत कराना, साथ ही वार्ड और जोन के अधिकारियों को जानकारी में डालना।
फिर दिखलाता हूं सामान्य जवाब मिलना। आगे कार्रवाई न होने पर विधायक और महापौर को अवगत कराना, वहां से फिर बड़े अधिकारियों का अमला सब कुछ सही से तो रहा है। पर दुर्भाग्यवश किसी घटनाक्रम का घट जाना, अब उसमें किसकी गलती है भला...
फिर बताओ दोषी कौन?
लेकिन फिर शुरू होता है प्रणाली का असली खेल..., बात आती है कि मर जाओ चुल्लूभर पानी में डूबकर तो अब चुल्लू भर पानी में पूरी प्रणाली के कितने लोगों को डुबाएंगे भला, क्योंकि इसमें बेचारे पार्षद की क्या गलती है वो तो अपना काम कर रहा है फिर विधायक और महापौर की भी क्या गलती है अफसर हैं कि सुनने तक का काम नहीं करते है वो भी जब मंत्री तक की नहीं सुनते तो फिर बात ही क्या करें।
रही बात जल मंत्री की तो उन्होंने भी बोल दिया कि इसमें मेरा क्या काम, निगम की गलती है।
जब कोई सुनता नहीं तो… फिर निगम में जल कार्य प्रभारी भी क्या करें
अब बात आती है तो जाती भी दूर तक है, क्योंकि अब अपने इंदौर के प्रभारी मंत्री मुख्यमंत्री ही तो हैं, पर क्या जब बात अफसरशाही की आती है तो अफसर किसी की तो सुनते होंगे तो फिर दोषी कौन होगा या राजनीतिक गुटबाजी। इस हिसाब से तो लगता है मुख्यमंत्री दोषी है, पर नहीं।
कहीं ऐसा तो नहीं कि दोष चयन का हो गया, क्योंकि इस संपूर्ण प्रक्रिया में चयन करना भी तो प्रणाली का ही हिस्सा है तो फिर चयन में भी राजनीतिक दल हो, उनका संगठन और फिर संगठन के नेता और फिर दी जाने वाली जिम्मेदारियों का चयन।
तो फिर तो ये चयन करने का दोष है। ये चयन भी उसी प्रणाली का हिस्सा है। जिम्मेदार सभी हैं फिर ये किसी व्यक्ति विशेष की गलती नहीं है। किस-किस को डुबोएं चुल्लू भर पानी में, यहां कोई नहीं डूबने वाला। यदि चुल्लू भर पानी में डूबना है तो प्रणाली का हर जिम्मेदार अपने पद को त्यागे और इस कलंक का प्रायश्चित कर मिसाल दे और बताए कि किसी दोष की पीड़ा क्या होती है। मानवता के हनन में प्रणाली का दोष है तो हम इस दोषी प्रणाली का ही हिस्से हैं।
अन्यथा इस प्रणाली में मानवता का हनन होता रहेगा मजबूरी की चीख, पुकारें और आंसू ये प्रणाली की भेंट चढ़ते रहेंगे। दोषों को स्वीकार करें, सिर्फ बोलने मात्र से नहीं अपने राजसी पदों को त्याग कर और अपने दल की लाज बचाएं।
मिसाल दें कि ऐसा कृत्य जाने-अनजाने भी भविष्य में न हो। न कि कुछ अफसरों को सिर्फ दिखावे के लिए सस्पेंड कर दोषी प्रणाली के चक्र को चलायमान रखें। या ये महज एक प्रणाली ही है, जिसका चक्र चल रहा है और ये चलते ही रहेगा या अंतोगत्वा अब प्रारब्ध ही मान लें इसे और सनातन का झंडा बुलंद करें।
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