सफेद वर्दी और लाल जज्बा: समुद्र की ओर भारत का गर्व: वाटर, वार और वीरता: नौसेना दिवस की कहानी
प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’ लेखक खुलासा फर्स्ट जब समुद्र की लहरें तेज़ी से उठती हैं और युद्धपोतों की गड़गड़ाहट आसमान तक गूंजती है, तब पूरा भारत गर्व से भर उठता है-यही है नौसेना दिवस की सच्च
Khulasa First
संवाददाता

प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’ लेखक खुलासा फर्स्ट
जब समुद्र की लहरें तेज़ी से उठती हैं और युद्धपोतों की गड़गड़ाहट आसमान तक गूंजती है, तब पूरा भारत गर्व से भर उठता है-यही है नौसेना दिवस की सच्ची शक्ति। 4 दिसंबर का यह खास दिन वह पल है, जब देश अपने समुद्री वीरों को दिल से सलाम करता है। यह कोई साधारण तारीख नहीं, बल्कि 1971 के भारत-पाक युद्ध की वह यादगार रात है, जब भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर ऐसा वार किया कि दुश्मन संभल ही नहीं पाया।
ऑपरेशन ट्राइडेंट, जिसका नाम सुनते ही रोमांच दौड़ जाए। पहली बार किसी एशियाई देश ने एंटी-शिप मिसाइलों का इस्तेमाल किया, चार पाकिस्तानी जहाज़ डूब गए, कराची का बंदरगाह जल उठा और उनकी नौसेना बिखरकर रह गई। यह सिर्फ जीत नहीं, बल्कि समुद्री युद्ध के इतिहास में लिखा गया एक चमकता हुआ अध्याय था। तभी से 4 दिसंबर को भारतीय नौसेना दिवस के रूप में पूरे देश में गर्व के साथ मनाया जाता है।
ले किन यह दिन सिर्फ इतिहास की वीरगाथा नहीं सुनाता, यह वर्तमान की ताकत और भविष्य की तैयारी का भी प्रमाण है। भारतीय नौसेना आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और सबसे सक्षम नौसेनाओं में शुमार है। 67000 से ज्यादा जांबाज़ सैनिक, 150 से अधिक युद्धपोत, 250 से भी अधिक विमान और पनडुब्बियां-ये सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की संप्रभुता का दस्तावेज़ है। आईएनएस विक्रांत- देश का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत- जब समुद्र में उतरा, तब पूरी दुनिया ने देखा कि भारत अब सिर्फ खरीदार नहीं, बल्कि खुद अपनी शक्ति गढ़ने वाला राष्ट्र है। वहीं आईएनएस अरिहंत ने जब परमाणु त्रिशूल पूरा किया, तो बड़े-बड़े देश भी भारत की क्षमता के आगे गंभीर हो गए। बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस यह पनडुब्बी दुश्मन के लिए साफ संदेश है- भारत की ओर आंख उठाई, तो कीमत भी चुकानी पड़ेगी और जवाब भी ऐसा मिलेगा कि याद रखना मुश्किल हो जाएगा।
हिंद महासागर में भारतीय नौसेना आज सिर्फ रक्षक नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का संतुलन संभालने वाली शक्ति है। मालदीव संकट में जब ऑपरेशन कैक्टस चला, श्रीलंका में आईपीकेएफ के दौरान जब नौसेना ने मानवीय मदद पहुंचाई, सुनामी की तबाही में जब हजारों जानें बचाईं, और हाल ही में ऑपरेशन राहत व ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब युद्धग्रस्त देशों से भारतीयों को सुरक्षित घर लाया गया-हर बार नौसेना ने साबित किया कि उसकी ज़िम्मेदारी केवल समुद्र की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। उसकी पहुंच वहाँं तक है, जहाँ तक भारत का एक भी नागरिक
मौजूद है-चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो।
आज जब चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति से हिंद महासागर में घेरा कसने की कोशिश कर रहा है, भारतीय नौसेना बिल्कुल शांत बैठने वाली नहीं है। क्वाड का मजबूत सदस्य बनकर, मालाबार अभ्यास में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ कदम मिलाकर, फ्रांस के साथ वरुण अभ्यास में अपनी क्षमता दिखाकर, और रूस के साथ इंड्रा नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेकर भारत ने दुनिया को साफ संदेश दे दिया है-हिंद महासागर में दबाव, धमकी या दादागिरी नहीं चलेगी। आईएनएस विक्रमादित्य, आईएनएस चक्र, ब्रह्मोस से लैस स्टील्थ फ्रिगेट्स और पी-8 आई पोसाइडन विमान सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति और समुद्री शक्ति के चमकते प्रतीक हैं।
लेकिन नौसेना की सच्ची शक्ति उसके लोहे के जहाज़ों में नहीं, बल्कि उन सफेद वर्दी वाले वीरों में बसती है। वे ही हैं जो महीनों अपने परिवार से दूर रहते हैं; जब तूफान जहाज़ को झकझोरता है, नीचे अथाह समुद्र और ऊपर दुश्मन की नज़र होती है-फिर भी उनके चेहरे पर मुस्कान रहती है। वे समुद्र की गोद में रातें काटते हैं, ताकि करोड़ों भारतीय चैन से सो सकें। उनकी आंखों में गहराई है, दिल में देशभक्ति की गर्मी और हाथों में अजेय साहस। और उनके पीछे खड़ी होती हैं वे माएं, जो बेटे के जहाज़ पर चढ़ते ही आशीर्वाद देती हैं, वे पत्नियां जो हर तूफान में प्रार्थना करती हैं, वे बच्चे जो दिन गिनते रहते हैं-यही मौन शक्ति नौसेना को अपराजेय बनाती है।
हर साल नौसेना दिवस पर जब गेटवे ऑफ इंडिया के सामने जहाज़ सलामी देते हैं, जब मिग-29 के आसमान को चीरते हुए दहाड़ते हैं, जब काले परिधान में मार्कोस कमांडो अपने रोमांचक करतब दिखाते हैं-तब हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। पर यह गर्व सिर्फ उस पल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि यह नीली सीमा हमें यूं ही नहीं मिली; इसे वीरों ने अपने जीवन से सुरक्षित किया है। कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला, जिन्होंने आईएनएस खुकरी के डूबते समय जहाज़ के साथ समुद्र में समा जाना चुना, सिखाते हैं कि वर्दी से ऊपर कुछ भी नहीं। लेफ्टिनेंट कमांडर कपिश सिंह मुन्नो ने दुश्मन की पनडुब्बी को ध्वस्त कर दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय वीरों की नसों में डर नहीं-दृढ़ता बहती है।
4 दिसंबर वह दिन है, जब राष्ट्र अपने समुद्री क्षितिज को देख कर खुद से एक वादा करता है कि भारतीय नौसेना को हम और भी अजेय, और भी अतुल्य बनाएंगे। यह केवल जश्न मनाने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का पल है। हम स्वदेशी जहाज़ों और हथियारों की शक्ति से वह आधार रचेंगे, जिस पर एक दिन दुनिया की सबसे मजबूत नौसेना का ध्वज गर्व से लहराएगा। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समुद्र महज़ जलराशि नहीं, यह भारत की सांस, भारत की गति, भारत की जीवनरेखा है। हमारे 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार का मार्ग इसी नीले विस्तार से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित हुआ, तो न केवल हमारी सुरक्षा, बल्कि हमारी सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था ठहर जाएगी। इसलिए नौसेना की ताकत देश की सीमाओं की रखवाली ही नहीं करती, बल्कि हर नागरिक की समृद्धि की रक्षा भी करती है।
इसी वजह से, इस नौसेना दिवस पर हमें केवल ताली बजाकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। हमें अपने बच्चों को उन जांबाज़ों की गाथाएं सुनानी चाहिए, जिनकी सफेद वर्दी में भारत का गर्व, साहस और स्वाभिमान चमकता है। उन्हें समझाना चाहिए कि यह वर्दी सिर्फ कर्तव्य का वस्त्र नहीं—यह राष्ट्र की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। उन्हें प्रेरित करना चाहिए कि वे भी एक दिन इस अथाह नीले प्रहरी का हिस्सा बनें, क्योंकि जब तक यह सफेद वर्दी समुद्र की लहरों पर शान से दमकती रहेगी, तब तक भारत की आन, बान और शान सुरक्षित, सशक्त और अडिग रहेगी।
जय हिंद। जय भारतीय नौसेना।
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