जहां धरती की सरहद खत्म होती है और देवलोक शुरू होता है: पहले गांव माणा का रहस्य; अपने में समेटे है अनेक औषधीय रहस्य
KHULASA FIRST
संवाददाता

क्या वाकई आज भी ‘स्वर्गारोहिणी’ पर सुनाई देती हैं पांडवों की पदचाप
परंपरा और आधुनिकता के बीच जूझता हिमालय का ‘प्रवेश द्वार’
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हिमालय की गोद में एक ऐसा मोड़ आता है जहां सड़क खत्म हो जाती है, शोर थम जाता है और पहाड़ कुछ कहने लगते हैं।
यह मोड़ है माणा - वह गांव जिसे कभी ‹भारत का अंतिम गांव› कहा जाता था, और जो अब गर्व से ‹देश का प्रथम गांव› कहलाता है, लेकिन माणा की असली पहचान उसके नाम में नहीं, उसके उस पार में है।
जहां इस गांव की सरहद खत्म होती है, वहां से एक ऐसा मार्ग शुरू होता है जिसे पुराणों ने ‹स्वर्गारोहिणी› का नाम दिया। वही मार्ग जिस पर चलकर पांचों पांडव सशरीर स्वर्ग की ओर बढ़ गए थे।
आज भी उस राह की हवाओं में वेदों की ऋचाएं घुली हुई हैं और दुर्लभ जड़ी-बूटियों की महक किसी अनजान भाषा की तरह बोलती है।
ऋतु प्रवास- बर्फ के साथ उठना और बर्फ के साथ लौटना
माणा के निवासियों का जीवन बद्री विशाल के कपाटों के साथ धड़कता है। सदियों से यहां ‹ऋतु प्रवास› की परंपरा चली आ रही है। अक्टूबर के अंत में जैसे ही बर्फ की पहली परत पहाड़ों पर बिछती है, पूरा गांव अपनी संस्कृति, ऊनी हथकरघा और पशुओं को समेटकर नीचे की घाटियों छिनका या चमोली की ओर उतर जाता है।
और जब वसंत आता है, बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, तब यही लोग फिर ऊपर चढ़ते हैं, लेकिन यह चक्र अब टूटने लगा है। होमस्टे की संस्कृति और पर्यटन के बढ़ते दबाव ने इस परंपरा को हिलाना शुरू कर दिया है।
नई पीढ़ी इस कठिन जीवन की जगह शहरों की सुविधाओं को चुन रही है। माणा के वे पारंपरिक पत्थर के घर जिन्हें स्थानीय भाषा में ‹खिमतिया› कहते हैं, अब एक-एक कर कंक्रीट के होटलों में बदलते जा रहे हैं। गांव की देह बदल रही है और उसके साथ उसकी आत्मा भी।
पांडवों का अंतिम सफर, जहां हर कदम एक परीक्षा था
माणा गांव से कुछ ही दूर एक विशाल शिला है जिसे ‘भीम पुल’ कहते हैं। किंवदंती है कि जब पांडव मोक्ष की राह पर थे, तब सरस्वती नदी के प्रचंड वेग को पार करने के लिए महाबली भीम ने यह शिला यहां रख दी थी। पानी की गर्जना आज भी उतनी ही है।
फर्क सिर्फ इतना है कि पार करने वाले अब श्रद्धालु हैं, पांडव नहीं। महाभारत के ‹महाप्रस्थानिक पर्व› में वर्णन है कि पांडवों ने इसी गांव के रास्ते अपनी अंतिम यात्रा शुरू की थी। ‘भीम पुल’ उसी यात्रा का साक्षी है।
पैरों की नहीं, आत्मा की भी परीक्षा
भीम पुल से आगे की यात्रा केवल पैरों की नहीं, आत्मा की भी परीक्षा है। लगभग 25 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई के बाद मिलता है ‹सत्यपथ›। एक त्रिकोणीय झील जिसके बारे में मान्यता है कि यहां त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने स्नान किया था।
इसके आगे खड़ी हैं स्वर्गारोहिणी की वे चोटियां जो बादलों के बीच सीढ़ियों जैसी आकृति बनाती हैं और फिर सीधे शून्य में समा जाती हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि यहां मौसम साफ हो तो आंखें चौंधिया जाती हैं, और बादल घिरें तो मन डर जाता है।
पुराणों में मणिभद्रपुर के नाम से उल्लेख...
इस गांव को पुराणों में मणिभद्रपुर के नाम से बताया गया है। स्कंद पुराण और महाभारत में इसके महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। जब आप माणा की धूल पर पैर रखते हैं, तो आप केवल एक सीमावर्ती गांव में नहीं होते, बल्कि उस मणिभद्रपुर में होते हैं जहां कभी वेदों की ऋचाएं पहली बार गूंजी थीं।
यहां की व्यास गुफा की दीवारों में आज भी अठारह पुराणों की गूंज सुनाई देती है। यह वह स्थान है जहां सरस्वती नदी ने महर्षि व्यास के शाप को शिरोधार्य किया और मानव जाति को महाभारत जैसा महान ग्रंथ मिला।
मणिभद्र को यक्षों का सेनापति और धन के देवता कुबेर का अनन्य मित्र माना जाता है। स्कंद पुराण के ‹मानस खंड› में उल्लेख है कि यह क्षेत्र यक्षों और गंधर्वों का निवास स्थान था। आज भी माणा के निवासी स्वयं को उन दिव्य परंपराओं का वाहक मानते हैं।
देव-उद्यान- जहां हर पत्ता एक दवा है
माणा से ऊपर बढ़ते ही हिमालय का वह रूप सामने आता है जिसे ‘देव-उद्यान’ ही कहा जा सकता है। नीलकंठ चोटी की छाया में बसी यह घाटी दुर्लभ जड़ी-बूटियों का ऐसा भंडार है जिसे आधुनिक विज्ञान अभी तक पूरी तरह समझ नहीं पाया।
यहां के बुग्यालों यानी ऊंचाई पर फैले घास के विशाल मैदानों में ‹बालछड़ी›, ‹जटामांसी› और ‹ब्रह्मकमल› जैसी वनस्पतियां मिलती हैं जो सदियों से आयुर्वेद की रीढ़ रही हैं। यहां की भोटिया जनजाति के पास इन पौधों का वह परंपरागत ज्ञान है जो किसी विश्वविद्यालय की किताब में दर्ज नहीं।
पौराणिक मान्यता यह भी है कि हनुमान जी जब संजीवनी की खोज में निकले थे, तब उनके चरण इसी क्षेत्र पर भी पड़े थे। यहां की जड़ी-बूटियां फेफड़ों के रोगों से लेकर मानसिक अवसाद तक में प्रभावी मानी जाती हैं, लेकिन यह ज्ञान बाहर कम, भीतर ज्यादा रहता है।
रील और श्रद्धा के बीच का फासला
माणा के पार का यह क्षेत्र केवल ट्रैकिंग का ठिकाना नहीं है। यह एक जीती-जागती सांस्कृतिक धरोहर है, लेकिन आज के पर्यटक, जो रील बनाने और ‹लोकेशन› ढूंढने में व्यस्त हैं, अक्सर उन स्थानों की पवित्रता को भूल जाते हैं जहां कभी ऋषियों ने मौन साधना की थी।
सरस्वती का उद्गम हो, व्यास गुफा हो या सत्यपथ इन स्थानों का आकर्षण उनकी शांति में है, भीड़ में नहीं। माणा से आगे का मार्ग हमें एक ही बात सिखाता है मनुष्य की सीमाएं कहां खत्म होती हैं और प्रकृति का विराट कहां से शुरू होता है।
अगर हम स्वर्गारोहिणी की मर्यादा को नहीं समझे, यहां के लोगों के संघर्ष को नहीं पहचाना, तो हम अपने देश के इस प्रथम गांव की आत्मा को अपने ही हाथों खो देंगे।
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