आखिर कब होगी गुनहगारों पर FIR: भागीरथपुरा में गंदा पानी पीने से हुई मौतों का मामला
KHULASA FIRST
संवाददाता

भागीरथपुरा कांड बनाम 1976 की जहरीली शराब त्रासदी, तब दर्ज हुआ था पुलिस और आबकारी विभाग के अफसरों पर केस, आज सिर्फ निलंबन!
16 मौतों पर क्षेत्रीय पार्षद, जेडओ, उपयंत्री, अपर आयुक्त और एसई नर्मदा प्रोजेक्ट पर केस दर्ज होना ही चाहिए
मुकेश मुवाल 98934-39951 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
16 लाशें, एक दुधमुंहा मासूम और सरकार का ‘घंटा’ न्याय... 1976 याद है या इतिहास भी बदला जाएगा? ये बात इसलिए कहना पड़ रही है, क्योंकि आठ बार स्वच्छता का तमगा पहनकर देश में नंबर-वन बनने वाला इंदौर आज देशभर में जनप्रतिनिधि और अफसरशाही के कारण शर्मसार हो गया है।
भागीरथपुरा इलाके में सीवेज मिला गंदा पानी पीने से सैकड़ों लोग बीमार हो गए। 16 निर्दोषों की मौत हो गई, मगर हैरानी की बात यह है कि इतनी मौतों के बावजूद न कोई एफआईआर और न किसी पर गैर इरादतन हत्या का केस।
सरकार ने दिखावे के तौर पर निलंबन और बर्खास्तगी की फाइलें जरूर चला दीं, लेकिन सवाल जस का तस है, क्या मौतें सिर्फ आंकड़ा है? खुलासा फर्स्ट ने जब इंदौर में पूर्व में हुई ऐसी त्रासदियों का इतिहास खंगाला, तो 70 के दशक में हुई जहरीली शराब त्रासदी सामने आई, तब छत्रीपुरा थाना क्षेत्र जहरीली शराब से हुई 115 मौतों और कई लोगों की आंखों की रोशनी चले जाने के मामले में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पुलिस और आबकारी विभाग के अधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज कराया था।
ऐसे तो भागीरथपुरा के लोग महीनों से सीवेज मिला गंदा पानी पी रहे थे। 21 दिसंबर से लोगों की तबीयत बिगड़ना शुरू हुई और उनका अस्पताल जाने का सिलसिला भी। वहीं, 24 दिसंबर से मौतों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जो कि पांच माह के दुधमुंहे मासूम आव्यान सहित अब तक 16 तक जा पहुंचा है।
इतने बेगुनाहों की जान चली गई और जिम्मेदारों पर न तो जिम्मेदारी तय हुई और न ही कोई एफआईआर। हां इतना जरूर हुआ कि प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री और इंदौर के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय के ‘घंटा’ वाले बयान ने देशभर में थू-थू अलग करा दी। खैर जो भी हो, अब वे कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। उन्हें तक दिल्ली तलब किया गया है, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती।
सरकार अभी भी मौत के आंकड़ों को गंदे पानी से हुई चार मौतों से अलग बता रही है, लेकिन इससे भयावह त्रासदी 70 के दशक में हुई थी। तब जहरीली शराब पीने से 115 लोगों की मौत हुई थी। कारण भले ही जहरीली शराब से मौत का था, लेकिन तब तत्कालीन सरकार ने पुलिस और आबकारी विभाग के तत्कालीन अधिकारियों को इन मौत का जिम्मेदार मानते हुए उन पर केस दर्ज कराया था।
ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या मौजूदा मोहन सरकार भी अपने भाजपाई क्षेत्रीय पार्षद और निगम अधिकारियों पर केस दर्ज कराने का दम दिखा पाएगी... या फिर मामला सिर्फ निलंबन और बर्खास्त की विभागीय कार्रवाई तक ही सीमित होकर रह जाएगा।
अब तक इन पर हुई कार्रवाई... मामले में हाथ बचाने के लिए सरकार ने एक्शन लिया और जोन-4 के जेडओ शालिग्राम सितोले और उपयंत्री योगेश जोशी को निलंबित करने के साथ उपयंत्री शुभम श्रीवास्तव को बर्खास्त कर दिया। वहीं, निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव का तबादला कर दिया, तो अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया और एसई नर्मदा प्रोजेक्ट संजीव श्रीवास्तव को भी निलंबित कर दिया गया।
1976 में 115 लोगों ने गंवाई थी जान
70 के दशक में इंदौर के छत्रीपुरा थाना क्षेत्र में रसूखदार शराब माफिया मक्कू (मक्खनलाल) का शराब का अवैध अड्डा चलता था। उसके अड्डे से जुड़ी जहरीली कच्ची शराब पीने से नवंबर 1976 में 115 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी, जबकि लगभग 50 लोग हमेशा के लिए अंधे हो गए थे या उनके मस्तिष्क को स्थायी क्षति पहुंची थी।
इसमें ज्यादातर मजदूर वर्ग के लोग थे, जो शहर के पूर्वी और मध्य इलाके में रहते थे। इस घटना ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया था। ये मध्य प्रदेश के इतिहास की सबसे भयावह जहरीली शराब कांडों में से एक मानी जाती है। मामले में तत्कालीन प्रशासनिक और पुलिस तंत्र पर गंभीर सवाल उठे थे।
तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने तत्काल एक्शन लेते हुए मक्कू के साथ साठगांठ के आरोप में कई पुलिस और आबकारी विभाग के अधिकारियों को न केवल निलंबित किया गया, बल्कि उनके खिलाफ गैर इरादतन हत्या केस भी दर्ज किया गया और उन्हें दोषी पाया गया था। घटना के बाद मक्कू के अवैध साम्राज्य को ढहा दिया गया था। हालांकि करीब 49 साल पुराने इस मामले के अधिकारियों के नाम नहीं मिल सके। हालांकि मौत के आंकड़ों को छिपाने में उस समय की सरकार ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी थी।
दर्ज हो केस, भविष्य में जिम्मेदारी तय हो... भागीरथपुरा का मामला बहुत ही दुखद घटना है। मामले में सबसे पहले क्षेत्रीय भाजपा पार्षद (वार्ड-11) कमल वाघेला, निलंबित जेडओ शालिग्राम सितोले (जोन-4), उपयंत्री योगेश जोशी, बर्खास्त उपयंत्री शुभम श्रीवास्तव और निलंबित अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया पर गैर इरादतन हत्या 106(1) का केस दर्ज होना चाहिए।
इतना ही नहीं भविष्य के लिए अभी से जिम्मेदारी भी तय होना चाहिए, ताकि जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से काम करें और ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। - मनीष यादव (वरिष्ठ अधिवक्ता, हाई कोर्ट)
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