हम सब दोषी हैं: क्योंकि हमने डर को शिक्षा समझ लिया
प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’ लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर । हम सबने यह खबर पढ़ी। कुछ देर तक दिल बैठा, फिर हम आगे स्क्रॉल कर गए। लेकिन सच्चाई ये है- वो बच्चा किसी दूसरे घर का नहीं था। वो हमारा बच्चा
Khulasa First
संवाददाता

प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’ लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हम सबने यह खबर पढ़ी। कुछ देर तक दिल बैठा, फिर हम आगे स्क्रॉल कर गए। लेकिन सच्चाई ये है- वो बच्चा किसी दूसरे घर का नहीं था। वो हमारा बच्चा भी हो सकता था। हमारे मोहल्ले का, हमारे स्कूल का, हमारी अपनी दुनिया का हिस्सा। सब सोचते रह गए कि उसने ऐसा क्यों किया।
पर किसी ने यह नहीं सोचा कि उस आखिरी मिनट में वह कितना अकेला था- कमरे में बैठा, चारदीवारी के बीच, अपने ही अपराधबोध से घिरा व डर तले दबा हुआ। बाहर प्रिंसिपल, टीचर, पिता-सब गुस्से में। और अंदर एक छोटा-सा बच्चा, जिसे लगा कि उसने गलती तो की है, पर अब उसकी सजा शायद मौत से कम हो ही नहीं सकती।
हम बचपन से सुनते आए हैं- गलती करोगे तो डांट पड़ेगी, सजा मिलेगी। मगर कब समय ने अपनी चाल बदल दी कि सजा का मतलब एक बच्चे को इतना तोड़ देना हो गया कि वो अपनी जान लेने पर उतारू हो जाए? कब शिक्षा के मंदिर इतने कठोर हो गए कि मेडल छीनने की धमकी धीरे-धीरे ज़िंदगी छीनने की ओर धकेलने लगी? शायद वो प्रिंसिपल आज भी सोचती होंगी कि उन्होंने अनुशासन कायम किया- पर अगर अनुशासन का अर्थ है किसी बच्चे का आत्मविश्वास कुचलकर उसे यह यक़ीन दिला देना कि वह दुनिया के लिए बोझ है, तो उसे अनुशासन नहीं, सीधी-सीधी हिंसा कहते हैं।
हमारे स्कूलों में आज भी मुर्गा बनो, कान पकड़ो, दीवार के पास खड़े रहो जैसी पुरानी सज़ाएं धूल नहीं बनीं- वे आज भी बच्चों की गरिमा का सौदा कर रही हैं। हम इन्हें बड़े आराम से डिसिप्लिन कह देते हैं, जबकि ये दरअसल नवपीढ़ी के लिए शर्मिंदगी का कारोबार है। एक बच्चे को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, उसके आत्मसम्मान को रौंदना-ये कोई शिक्षा नहीं।
ये शिक्षा की प्रक्रिया नहीं, उसकी हत्या की शुरुआत है। बस हथियार बदल जाते हैं, कभी डंडा, कभी शब्द, कभी धमकी। पर नतीजा हमेशा वही होता है- एक बच्चे का भीतर से बिखर जाना। उस दिन रतलाम के उस स्कूल में जो हुआ, वह सिर्फ एक प्रिंसिपल की जिद नहीं थी। वह पूरे शिक्षा तंत्र की सामूहिक विफलता थी।
हम बच्चों को इंसान बनने की बात सिखाते हैं, लेकिन उन्हें परखते ऐसे हैं जैसे मशीनें हों। उनसे कहते हैं- 99% लाओ, मेडल लाओ, रैंक लाओ… वरना तुम्हारी कोई कीमत नहीं। और अगर ज़रा-सी गलती हो जाए, तो मेडल भी छीन लेंगे, नाम भी काट देंगे और भविष्य का दरवाज़ा भी बंद कर देंगे। हमने अपने ही बच्चों को ऐसा यक़ीन दिला दिया है कि उनकी पहचान उनके अंकों में बंधी है, उनकी इज्ज़त उनकी परफेक्ट इमेज की दासी है। जैसे ही वह इमेज टूटती है, बच्चा खुद को कचरा समझने समझने लगता है।
ज़रा सोचिए, तेरह साल की उम्र में बच्चा दुनिया से क्या सीखता है? दोस्ती, खेल, हंसी, शरारत। ज़िंदगी की हल्की-फुल्की धूप-छांव। मौत समझने की उसकी उम्र ही नहीं होती। पर हमने उसे मौत भी सिखा दी।हमने उसे समझा दिया कि मेडल चला गया तो ज़िंदगी खत्म; सस्पेंड हुए तो भविष्य बर्बाद; गलती की तो इंसान नहीं, अपराधी हो गया। लेकिन हमने उसे यह कभी नहीं सिखाया कि गलती करना इंसान होने का प्रमाण है। माफी मांगना कमजोरी नहीं, साहस है। दूसरा मौका कोई इनाम नहीं, हर इंसान का अधिकार है।
आज सवाल यह नहीं कि उस स्कूल पर ताला लगे या नहीं। सवाल यह है कि हम अपने भीतर बैठे उस कठोर प्रिंसिपल को कब निकालेंगे—वो जो हर गलती पर डर दिखाता है, हर शरारत पर अपमान देता है, और हर बच्चे को सीख नहीं बल्कि सज़ा देने के लिए तत्पर रहता है। हमें समझना होगा कि डर कभी किसी इंसान को नहीं बदलता- डर सिर्फ तोड़ता है, चुप कर देता है, मिटा देता है।
बच्चे को डांटना गलत नहीं, उसे समझाना ज़रूरी है- लेकिन उससे पहले उसे ये भरोसा देना ज़रूरी है कि मैं तुम्हारे साथ हूं, चाहे तुम कितनी ही बड़ी गलती क्यों न कर लो। उसका आत्मसम्मान उसकी सबसे कीमती पूँजी है। उसे चोट पहुंचा दी, तो बच्चे का नहीं- पूरी पीढ़ी का भविष्य घायल हो जाता है।
रतलाम वाला बच्चा तो बच गया—हड्डियां टूटीं, पर सांसें बचीं। पर कितने बच्चे ऐसे थे जो चुपचाप चले गए, जिनकी खबर तक नहीं बनी, जिनके नाम तक किसी अख़बार की हेडलाइन नहीं बने। हम तब भी यही कहते रहे- अरे, इतनी-सी बात पर? क्योंकि वो बात हमें छोटी लगती थी। उन्हें नहीं। उनके लिए वही छोटी बात उनकी पूरी दुनिया थी-टूटी हुई, डर से घिरी, उम्मीद से खाली। और अगर हम आज भी चुप रहे, तो कल फिर कोई बच्चा किसी तीसरी मंजिल की ओर भागेगा- किसी और शहर में, किसी और स्कूल में। और हम फिर दो मिनट दुखी होंगे, फिर स्क्रॉल कर देंगे।
इसलिए बस इतना कर लो- जब अगली बार कोई बच्चा गलती करे, उसे गले लगा लेना। धीरे से कहना—कोई बात नहीं… मैं हूं न। यकीन मानिए, यही एक वाक्य उसे किनारे से वापस खींच सकता है। हमारा सिस्टम, हमारा अहंकार, अनुशासन के नाम पर किया गया हर अत्याचार- सब धरा रह जाएगा। लेकिन अगर हम आज नहीं बदलेंगे, तो इतिहास यही लिखेगा—हम बचपन नहीं बचा सके। और हां, इस बार कसूरवार हम ही थे।
एक बच्चे ने क्लास में एक छोटी-सी रील बना ली-दो सेकंड की हंसी, एक पल का बचपना। उसे क्या पता था कि वही पल उसकी पूरी ज़िंदगी को तीसरी मंजिल की रेलिंग तक धकेल देगा। प्रिंसिपल के कमरे में खड़ा, कान पकड़कर चालीस से ज्यादा बार ‘सॉरी मैम’ दोहराता हुआ वह बच्चा सिर्फ माफी नहीं मांग रहा था- वह अपनी मासूमियत बचाने की कोशिश कर रहा था।
पर न माफी मिली, न समझ। मिला तो सिर्फ सस्पेंशन का डर, मेडल छीन लेने की धमकी और भविष्य को मटियामेट कर देने वाले शब्द। तेरह साल का दिल कितनी चोट झेल सकता है? जितनी हम बड़े समझ लेते हैं, उससे कहीं कम। और फिर वह दौड़ा। सीढ़ियां चढ़ीं। तीसरी मंजिल की तरफ गया। ...और कूद गया।
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