भागीरथपुरा में वार-फुटिंग प्रोटोकॉल से रुक सकती थी मौतें: रिस्पांस ब्लूप्रिंट पर श्वेत पत्र
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. तेजप्रकाश पूर्णानंद व्यास वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागीरथपुरा जैसी घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जब प्रशासन और सिस्टम की विफलता से मौतें हो रही थीं, तो ‘सामान्य राहत’ के बजाय ‘वॉर-फुटिंग’ (युद्ध स्तर) प्रोटोकॉल लागू होना था। इससे मौतों को रोका जा सकता था।
‘ज़ोनिंग’ एवं ‘सोर्स कंट्रोल’: जैसे ही क्षेत्र में 5 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए, प्रशासन को बिना किसी ‘डेथ ऑडिट’ या रिपोर्ट का इंतज़ार किए आइसोलेशन ऑफ पाइपलाइन करना था यानी प्रभावित क्षेत्र की मुख्य पेयजल पाइपलाइन को तत्काल ‘कट-ऑफ’ कर देना था।
भागीरथपुरा में देरी का मुख्य कारण यही था अधिकारी ‘लीकेज’ ढूंढते रहे और लोग ज़हर पीते रहे। रेड ज़ोन घोषित कर प्रभावित 2-3 किमी दायरे को ‘संक्रमित क्षेत्र’ घोषित कर वहां के सभी सार्वजनिक नलों और हैंडपंपों को सील किया जाना चाहिए था ।
अल्टरनेटिव सप्लाई: केवल प्रमाणित और क्लोरिनेटेड वाटर पानी की आपूर्ति होनी थी, जिनकी निगरानी स्वयं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी करते। ‘एक्टिव केस फाइंडिंग’ एवं ‘ट्राइएज’ (डोर-टू-डोर सर्विलांस) प्रोटोकॉल के तहत अस्पताल आने वाले मरीजों का इंतज़ार करना मूर्खता रही।
प्रशासन को जनता के पास तत्काल जाना था। रैपिड रिस्पांस टीम (आरआरटी) के तहत प्रत्येक 10 घरों पर एक आशा कार्यकर्ता और एक पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती होनी थी।
घर-घर जाकर यह जांचें की करना थी कि क्या किसी को हल्की मितली या दस्त है। प्रोफाइलैक्सिस वितरण यानी बिना देरी पैकेट ओआरएस, जिंक गोलियां व ‘क्लोरीन टैबलेट्स’ का वितरण अनिवार्य होना था।
ट्राइएज सेंटर स्थापित होना थे- अस्थायी ‘स्टेबलाइजेशन सेंटर’ तत्काल बनाना था, जहां गंभीर रूप से निर्जलित (डीहाइड्रेटेड) मरीजों को बड़े अस्पतालों में शिफ्ट करने से पहले तत्काल आईवी फ्लूइड दिया जाना था। एम्बुलेंस की देरी ने भी जानें ली हैं।
जल शुद्धिकरण प्रोटोकॉल का अभाव- जब पाइप लाइनें ही प्रदूषित हो जाएं, तो केवल पानी उबालना पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में शॉक क्लोरिनेशन यानी क्षेत्र के सभी भूमिगत टैंकों और ओवरहेड टैंकों में हाई-डोज़ क्लोरिनेशन किया जाना था।
रेसिड्यूअल क्लोरीन टेस्ट- हर 2 घंटे में क्षेत्र के 10 अलग-अलग बिंदुओं से पानी के सैंपल लेकर ‘ओर्थो-टोलुडीन’ (ओटी) टेस्ट किया जाना था । यदि मान 0.5 mg/L से कम था, तो पानी को ‘असुरक्षित’ श्रेणी में रखकर वितरण रोका जाना था। कंटेनर सैनिटाइजेशन प्रोटोकॉल के तहत लोगों को पुराने भरे हुए पानी को फेंकने और बर्तनों को ब्लीचिंग पाउडर से धोने के निर्देश दिए जाने थे।
तंत्रजनित नरसंहार- यह श्वेत-पत्र ऐसी त्रासदी का विश्लेषण है जिसे टाला जा सकता था। भागीरथपुरा) में पेयजल आपूर्ति में मल-मूत्र (सीवेज) के मिश्रण से 20 नागरिकों की अकारण मृत्यु हुई। यह रिपोर्ट वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सिद्ध करती है कि यह केवल एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि ‘इंजीनियरिंग विफलता’ और ‘प्रशासनिक भ्रष्टाचार’ का परिणाम है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज और क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं के डेटा विश्लेषण से निम्नलिखित तथ्य का खुलासा हुआ है।
फेकल कोलिफॉर्म का तांडव: पेयजल के नमूनों में ऐशेरिशिया कोली और वाइब्रिओ शोलेरा की उपस्थिति ‘अनकाउंटेबल’ श्रेणी में पाई गई। वैज्ञानिक दृष्टि से, पेयजल और सीवरेज लाइनों के बीच ‘क्रॉस-कंटेमिनेशन’ तब होता है जब दबाव के अंतर के कारण दूषित जल पेयजल पाइपलाइन के छिद्रों से भीतर प्रवेश करता है।
आधिकारिक तौर पर इसे ‘एक्यूट डायरिया’ कहा गया, लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह ‘सेप्टिक शॉक’ और ‘हाईपोवोलेमिक शॉक’ का मामला है, जहां दूषित जल के कारण शरीर का इलेक्ट्रोलाइट संतुलन 4-8 घंटों में बिगड़ गया और मल्टी-ऑर्गन फेलियर से मौतें हुईं। भागीरथपुरा की घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि ‘माइक्रोबायोलॉजिकल नरसंहार’ है।
यदि हम अब भी नहीं चेते, तो ‘स्मार्ट सिटी’ केवल एक कंक्रीट का जंगल बनकर रह जाएगी जहाँ जीवन की कोई गारंटी नहीं होगी। इस श्वेत-पत्र का उद्देश्य केवल आलोचना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और वैज्ञानिक भविष्य का निर्माण करना है। भागीरथपुरा की त्रासदी ने सिद्ध किया है हमारे पास ‘सुंदर शहर’ के लिए बजट है, लेकिन ‘सुरक्षित जीवन’ के लिए ‘इमरजेंसी रिस्पांस’ शून्य है।
यदि ऊपर लिखित 6-चरणीय प्रोटोकॉल को घटना के पहले 24 घंटों में लागू कर दिया जाता, तो ओम प्रकाश शर्मा और उन मासूम बच्चों की कुल 20 जानें बचाई जा सकती थीं।
सिस्टम के ‘लूपहोल्स’ और आर्थिक भ्रष्टाचार
करोड़ों के निवेश के बावजूद यह त्रासदी क्यों हुई? अमृत योजना और स्मार्ट सिटी का खोखलापन: अरबों रुपये सौंदर्यीकरण और ऊपर चमकते फुटपाथों पर खर्च किए गए, लेकिन जमीन के नीचे का ‘यूटिलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर’ साल पुराना और जर्जर है। डेथ ऑडिट के नाम पर मौतों को ‘पुरानी बीमारी’ बताकर सरकारी आंकड़ों को छिपाना, ठीक वैसा ही जैसे कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी के दौरान किया गया था।
संपूर्ण भारत में ये नीतिगत बदलाव अनिवार्य
‘जल-सीवर पृथक्करण अधिनियम’: पेयजल और सीवर लाइन के बीच न्यूनतम 3 मीटर की दूरी का कानूनी प्रावधान।
जीआईएस (जीआईएस) मैपिंग: शहर की हर पाइपलाइन का डिजिटल मानचित्र और रिसाव का स्वचालित पता लगाने वाला तंत्र।–
स्वतंत्र वैज्ञानिक आयोग: किसी भी संक्रामक मृत्यु की जांच के लिए स्थानीय प्रशासन से स्वतंत्र वैज्ञानिकों की एक स्थायी समिति।
जवाबदेही तय करना: दोषी इंजीनियरों और अधिकारियों पर ‘आपराधिक लापरवाही’ के तहत मुकदमा।
‘एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग’ एवं ‘सीवरेज इंटरवेंशन’
भागीरथपुरा त्रासदी का मूल कारण ‘क्रॉस-कंटेमिनेशन’ था। वैक्यूम सक्शन: क्षेत्र की सभी सीवर लाइनों को वैक्यूम पंपों से खाली किया जाना था, जिससे पेयजल पाइप लाइनों पर पड़ने वाला बाहरी दबाव कम होता।
डाइ-ट्रेसर टेस्ट
पाइप लाइनों में सुरक्षित रंगीन डाई (डाई) डालकर पता लगाया जा सकता था कि रिसाव कहां से हो रहा है। यह तकनीक समय बचाती है और खुदाई के बिना लीकेज पकड़ती भी है। अब केमिकल बैरियर खुली नालियों और जलभराव वाले क्षेत्रों में कैल्शियम हाइपोक्लोराइड) का सघन छिड़काव हो, ताकि मक्खियों और अन्य वाहकों द्वारा संक्रमण न फैले क्योंकि भ्रम और डर संक्रमण से ज्यादा घातक होते हैं।
‘नल का पानी मौत का कारण बन सकता है - ऐसी स्पष्ट चेतावनी लाउडस्पीकरों पर 30-30 मिनट के अंतराल पर दी जानी थी। जनता को बताया जाना था चावल के पानी जैसे दस्त हैजा के लक्षण हैं और इसे सामान्य न समझें।
सोशल मीडिया पर फैल रही ‘घरेलू नुस्खों’ की अफवाहों को रोककर केवल वैज्ञानिक प्रोटोकॉल को प्रसारित किया जाए। ‘जीनोम सीक्वेंसिंग’ होना थी, ताकि ‘पैथोजन’ स्ट्रेन की पहचान होती।
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