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पर्दा, पहचान और पाखंड: चयनात्मक आक्रोश की क्या हो सकती है सच्चाई...?

Khulasa First

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संवाददाता

20 दिसंबर 2025, 5:25 pm
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पर्दा, पहचान और पाखंड

अजय कुमार बियाणी वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर
निस्संदेह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सार्वजनिक मंच पर किया गया व्यवहार आदर्श नहीं कहा जा सकता। किसी महिला के बुर्के या घूंघट को हटाने का प्रयास, चाहे वह किसी भी उद्देश्य से किया गया हो, लोकतांत्रिक शिष्टाचार और सार्वजनिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है।

इस दृष्टि से उनके तरीक़े की आलोचना स्वाभाविक और आवश्यक भी है। परंतु किसी भी घटना को केवल एक क्षणिक दृश्य तक सीमित कर देना और उसके पीछे की मंशा, संदर्भ तथा समाज में व्याप्त दोहरे मानदंडों को अनदेखा कर देना, स्वयं में एक बड़ी बौद्धिक बेईमानी है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक विचलित करने वाला पक्ष वह चयनात्मक आक्रोश है, जो कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं और कथित प्रगतिशील वर्ग की ओर से सामने आया। दु:ख तब होता है जब इस घटना की निंदा वही लोग करते हैं, जिनकी सार्वजनिक नैतिकता स्वयं कई बार प्रश्नों के घेरे में रही है।

एक ओर नग्नता और उच्छृंखलता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताने वाले लोग हैं, और दूसरी ओर वही लोग बुर्का और हिजाब को महिला सशक्तिकरण का प्रतीक घोषित कर आंदोलन करते दिखाई देते हैं। यह विरोध सिद्धांत का नहीं, सुविधा और अवसर का प्रतीत होता है।

प्रश्न यह नहीं है कि पर्दा सही है या गलत। मूल प्रश्न यह है कि सार्वजनिक जीवन और जनहित से जुड़े पेशों में पहचान और पारदर्शिता की अपेक्षा करना अपराध कैसे हो गया? एक डॉक्टर कोई रहस्यमयी पात्र नहीं होता। वह समाज के जीवन और स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा हुआ होता है।

चिकित्सा शिक्षा के दौरान परीक्षा केंद्रों पर पहचान सत्यापन होता है, हवाई अड्डों पर चेहरा दिखाना अनिवार्य है, बैंक से लेकर न्यायालय तक पहचान आवश्यक है। फिर जब कोई चिकित्सक सरकारी नियुक्ति पत्र ले रहा हो, तब यह जानना कि सामने खड़ा व्यक्ति कौन है, किस पहचान और किस जिम्मेदारी के साथ समाज की सेवा करने जा रहा है—यह सवाल उठाना अचानक असंवैधानिक और अमानवीय कैसे हो गया?

विडंबना यह है कि आज पहचान पूछना अपराध बन गया है, लेकिन किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के घटित हो जाने के बाद उसी पहचान को उछालना साहसिक पत्रकारिता और सामाजिक चेतना का नाम दे दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड नया नहीं है। जब सार्वजनिक मंचों पर हिंदू महिलाओं का घूंघट खींचा गया, तब न मोमबत्तियां जलीं, न अंतरात्मा जागी। जब राजस्थान के परीक्षा केंद्रों पर छात्राओं के वस्त्रों की आस्तीनें काटी गईं, तब नारी गरिमा अचानक विमर्श से बाहर हो गई। उस समय नैतिकता के ठेकेदारों की आवाज़ कहाँ चली गई थी?

समाज की स्मृति इतनी कमजोर नहीं होनी चाहिए कि वह इतिहास और संस्कृति को भूल जाए। सिनेमा में वर्षों तक पर्दा और बेपर्दगी के संवाद गूंजते रहे। गीत लिखे गए, दृश्य फिल्माए गए, पर न किसी की आस्था आहत हुई और न लोकतंत्र संकट में पड़ा। आज वही पर्दा, जब किसी सरकारी नियुक्ति के समय चर्चा में आता है, तो लोकतंत्र खतरे में दिखने लगता है। इससे स्पष्ट है कि समस्या पर्दे की नहीं, बल्कि व्यक्ति और पहचान की है।

साफ़ शब्दों में कहें तो मुद्दा यह है कि यदि चेहरा मनचाहा हो, तो वही कार्य सुधार कहलाता है, और यदि नाम या पहचान असुविधाजनक हो, तो वही कार्य अत्याचार घोषित कर दिया जाता है। यही चयनात्मक आक्रोश है और यही सुविधाजनक नैतिकता। यह प्रवृत्ति न समाज को मजबूत करती है, न महिलाओं को सशक्त बनाती है।

नीतीश कुमार के प्रकरण में भी अधिकांश लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उनकी नीयत दुर्भावनापूर्ण थी। उनका आचरण आलोचना के योग्य हो सकता है, पर उनकी मंशा पर संदेह करना भी उतना ही अनुचित है। एक महिला आयुष चिकित्सक, जिसका चेहरा पूरी तरह ढका हो, समाज के सामने एक सार्वजनिक भूमिका निभाने जा रही है।

ऐसे में यह अपेक्षा करना कि उसकी पहचान स्पष्ट हो, किसी पिता या अभिभावक के भाव से उपजी हुई भी हो सकती है। यह दृष्टिकोण महिला विरोधी नहीं, बल्कि पेशेवर जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है। यह बहस केवल धार्मिक स्वतंत्रता बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नहीं है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व की भी है।

यदि कोई महिला चिकित्सक या शिक्षिका पूरा चेहरा ढककर कार्य करना चाहती है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह उस पेशे की व्यावहारिक आवश्यकताओं के अनुरूप है? यदि किसी समाज में महिलाओं को यह सिखाया जाता है कि पूर्ण पर्दा ही पुण्य है, तो समाज का दायित्व केवल उस मान्यता का समर्थन करना नहीं, बल्कि उसे तर्क और संवेदना के साथ परखना भी है।

इतिहास साक्षी है कि कभी अनेक कुरीतियाँ भी पुण्य समझी जाती थीं। समय के साथ समाज ने उन्हें बदला, क्योंकि प्रश्न पूछने का साहस किया गया। आज भी वही साहस अपेक्षित है। विरोध का अधिकार सबको है, लेकिन वह ईमानदार और समान होना चाहिए। चयनात्मक नैतिकता और अवसरवादी आक्रोश नारी सम्मान के नहीं, बल्कि वैचारिक दिवालियापन के संकेत हैं।

इसलिए, इस पूरे विवाद को केवल माफी की मांग तक सीमित कर देना समस्या का समाधान नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि समाज आत्ममंथन करे- क्या हम सचमुच महिला सशक्तिकरण चाहते हैं, या केवल उसे राजनीतिक सुविधा और वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं? जब तक इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट और ईमानदार नहीं होगा, तब तक पर्दा नहीं, पाखंड ही हमारे सार्वजनिक विमर्श पर छाया रहेगा।

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