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मदद के नाम पर दो लाख की खैरात: राशन की थैलियां बांटकर पाप धोने में जुटा प्रशासन

Khulasa First

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संवाददाता

22 जनवरी 2026, 5:20 pm
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मदद के नाम पर दो लाख की खैरात

जिम्मेदार अब भी मलाईदार कुर्सियों पर

सरकारी फाइलों में मौत पर लीपापोती

इंप्लांट के पैसे इंसेंटिव में लुटाए, दर्द से कराहते ‘आयुष्मान’ के मरीजों की सर्जरी अटकी

भागीरथपुरा जल त्रासदी : लाशों के ढेर पर इंदौर! भागीरथपुरा में 25वीं बलि, चार बेटियों के सिर से छिना पिता का साया, सातवीं की छात्रा ने दी मुखाग्नि

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर के माथे पर भागीरथपुरा की जल-त्रासदी ने ऐसा कलंक लगा दिया है जिसे करोड़ों के विज्ञापनों से नहीं धोया जा सकता। नगर निगम के निकम्मेपन और अफसरों की आपराधिक लापरवाही ने मंगलवार रात एक और हंसते-खेलते घर को श्मशान बना दिया।

51 वर्षीय हेमंत गायकवाड़ की मौत के साथ ही इस सरकारी नरसंहार में मरने वालों का आंकड़ा 25 हो चुका है। ये महज मौतें नहीं उन मासूमों की हत्या हैं जिन्होंने नगर निगम पर भरोसा कर वह पानी पिया, जिसमें सीवेज का घातक जहर घुला था। भागीरथपुरा की गलियों में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि सिस्टम के प्रति आक्रोश की गूंज है।

हेमंत गायकवाड़ दिन-रात ई-रिक्शा चलाकर अपनी चार बेटियों के उज्ज्वल भविष्य का सपना बुन रहे थे, अफसरों की फाइलों में दफन होकर रह गए। 22 दिसंबर से शुरू हुआ उल्टी-दस्त का खूनी तांडव सांसें उखड़ने तक जारी रहा।

विडंबना देखिए जिस इंदौर को देश का गौरव बताया जाता है, वहां की जनता को नरक से बदतर हालात में जीने और ड्रेनेज मिला पानी पीकर मरने के लिए छोड़ दिया गया है। मालवा मिल मुक्तिधाम में बुधवार को जब हेमंत की सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली नन्ही बेटी मनाली ने काका के साथ पिता की चिता को मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा फट गया।

यह आग सिर्फ एक चिता नहीं, बल्कि उन तमाम सरकारी दावों की थी, जो जनसुरक्षा का दम भरते हैं। प्रशासन अब निर्लज्जता की सारी हदें पार कर मरने वालों के आंकड़े छिपाने और उनके डेथ सर्टिफिकेट में बीमारी का बहाना ढूंढने में लगा है।

हेमंत के जाने से उनकी पत्नी कल्पना और चार बेटियां रिया, जिया, खुशबू और मनाली एक ऐसे अंधकार में चली गई हैं, जहां से निकलने का रास्ता नजर नहीं आता। बड़ी बेटी स्नातक होकर भी बेरोजगार है और पिता का ई-रिक्शा अब घर के कोने में प्रशासनिक क्रूरता के प्रतीक के रूप में खड़ा है।

हर घर गवाह प्रशासनिक क्रूरता का
शर्मनाक यह कि इतनी मौतों के बाद भी किसी रसूखदार अफसर ट्रांसफर से ज्यादा कोई कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासन ने दो-दो लाख के चेक और समाजसेवियों ने दाल-चावल की थैलियां बांटकर इस महापाप पर मरहम लगाने की कोशिश की है, जैसे किसी की जिंदगी की कीमत महज चंद रुपयों से तौली जा सकती हो।

यह मदद नहीं, बल्कि पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। मरते हुए लोगों की चीखों को दबाने के लिए सरकारी खंडन जारी किए गए और अखबारों की निष्पक्ष खबरों को भ्रामक बताया गया, लेकिन भागीरथपुरा का हर घर आज गवाह है कि प्रशासन की नलों से पानी नहीं, मौत की सप्लाई हो रही थी।

बेटी जिया का दर्दनाक बयान
पिता को अस्पताल की फाइल में भले ही कैंसर या किडनी का मरीज बता दिया जाए, लेकिन सच तो यह है उन्हें उस ड्रेनेज वाले गंदे पानी ने मारा है जो हमारे घर के नल में आ रहा था। 24 दिसंबर को जब पहली बार उन्हें उल्टी-दस्त शुरू हुए, तभी से मदद की गुहार लगा रहे थे लेकिन किसी ने नहीं सुना।

प्रशासन आज हमें राशन और पैसे देने की बात कर रहा है, क्या वो हमारे पिता को वापस ला सकता है? हमें भीख नहीं, इंसाफ चाहिए। मेरी बड़ी बहन को सरकारी नौकरी दी जाए ताकि हम बहनें और मां सड़क पर न आ जाएं। सिस्टम ने हमारे सिर से छत और साया दोनों छीन लिया है।

हेमंत की बहनें बोली: उन्हें पहले से कोई बीमारी नहीं थी, दूषित पानी ने ली जान
हेमंत गायकवाड़ के असमय निधन ने उनके पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया है। घर के इकलौते कमाने वाले सदस्य के चले जाने से उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है, वह बदहवास हालत में बस यही कह रही हैं कि अब उनका क्या होगा और उनका सब कुछ लुट गया है।

इस दुखद घड़ी में हेमंत की बुआ चंद्रप्रभा शिंदे ने प्रशासन और मंत्रियों के प्रति गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने तीखे स्वर में सवाल किया कि अब वे मंत्री कहां हैं जो दावे करते थे? चंद्रप्रभा ने सरकार से मांग की है कि हेमंत की चार बेटियों की शिक्षा और नौकरी की पूरी जिम्मेदारी उठाई जाए, क्योंकि पिता के साये के बिना ये बच्चियां अब अनाथ हो गई हैं।

वहीं, हेमंत की दो सगी बहनें सुरेखा जाधव और पुष्पा पंवार, भाई की मृत्यु की खबर मिलते ही वडोदरा, गुजरात से आईं। बड़े भाई को खोने का गम उनकी आंखों में साफ झलक रहा था। बड़ी बहन सुरेखा ने प्रशासन को कोसते हुए कहा कि उनका भाई ई-रिक्शा चलाकर मेहनत से अपने परिवार का पेट पालता था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि हेमंत को पहले से कोई बीमारी नहीं थी, बल्कि दूषित पानी पीने की वजह से उनकी जान गई है। इस बीच, हेमंत की 74 वर्षीय मां सुशीला, जो खुद दमे की बीमारी से जूझ रही हैं, अपने जवान बेटे की मौत के बाद से गहरे सदमे और दुख में डूबी हुई हैं। पूरा परिवार आज न्याय और भविष्य की सुरक्षा की गुहार लगा रहा है।

दूषित पानी के गुनहगारों को बचाने पुरानी बीमारियों की आड़ ले रहा स्वास्थ्य विभाग
स्वच्छता में नंबर वन का दंभ भरने वाले इंदौर के भागीरथपुरा में मची चीख-पुकार दबाने के लिए प्रशासनिक तंत्र ने आंकड़ों की बाजीगरी शुरू कर दी है। प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जलजनित संक्रमण से मौतों का आंकड़ा 25 तक पहुंचने की खबर से हड़कंप मचने पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग बचाव की मुद्रा में हैं।

सीएमएचओ डॉ. माधव हासानी ने हेमंत गायकवाड की मौत को डायरिया से मानने से साफ इनकार कर इसे कैंसर और कार्डियो पल्मोनरी अरेस्ट का परिणाम बता दिया है। प्रशासन का यह तर्क उन शोकाकुल परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है, जो अपनों को खोने का कारण नगर निगम की पाइपलाइन में घुले सीवेज के जहर को मान रहे हैं।

डॉ. हासानी का दावा है अस्पतालों में भर्ती मरीज डायरिया से मुक्त हो चुके हैं और उनका इलाज केवल उनकी पुरानी गंभीर बीमारियों के चलते चल रहा है, लेकिन सवाल है क्या इन गंभीर बीमारियों को जानलेवा स्तर तक पहुंचाने का काम उसी दूषित पानी ने नहीं किया?

प्रशासनिक स्पष्टीकरण के मुताबिक अपोलो, सीएचएल, अरविंदो और बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती मरीज किडनी फेलियर, मल्टी ऑर्गन डिस्फंक्शन, लिवर संक्रमण और मस्तिष्क की बीमारियों से जूझ रहे हैं। विभाग इन बीमारियों को ढाल बनाकर खुद को पाक-साफ बताने की कोशिश कर रहा है जबकि हकीकत यह है दूषित पानी के कहर ने ही इन मरीजों की प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर उन्हें मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा किया है।

सरकारी आंकड़े ही बता रहे स्थिति कितनी भयावह
भागीरथपुरा के 6365 घरों में किए गए सर्वे और 26 हजार से अधिक रहवासियों की जांच गवाह है स्थिति कितनी भयावह थी। प्रशासन अब नि:शुल्क उपचार और ओआरएस बांटने का ढिंढोरा पीटकर अपनी उस नाकामी को छिपाने का प्रयास कर रहा है जिससे पूरा क्षेत्र नरक बन गया।

यह बेहद शर्मनाक है तंत्र अपनी गलती सुधारने और दोषियों पर कार्रवाई के बजाय मौतों के तकनीकी कारण गिनाने में पूरी ऊर्जा लगा रहा है। इंदौर की जनता देख रही है कैसे कागजी दावों के जरिए एक बड़ी मानवीय त्रासदी को पुरानी बीमारी का नाम देकर दफन करने की साजिश रची जा रही है।

एमवाय अस्पताल की घोर लापरवाही
एमवायएच में प्रबंधन की अदूरदर्शिता और वित्तीय कुप्रबंधन ने स्वास्थ्य सेवाओं को आईसीयू में पहुंचा दिया है। हड्डी रोग विभाग में आठ दिनों से इंप्लांट्स की कमी के चलते 12 से अधिक बड़े ट्रांसप्लांट टालने पड़े, जिससे गरीब मरीज दर्द और अनिश्चितता के बीच बिस्तर पर पड़े रहने को मजबूर हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि अस्पताल प्रशासन ने आयुष्मान योजना से मिली राशि का उपयोग मरीजों के इंप्लांट और आवश्यक सर्जिकल सामग्री का भुगतान करने के बजाय डॉक्टरों और स्टाफ को इंसेंटिव बांटने में कर दिया। इस वित्तीय मिसमैनेजमेंट के कारण वेंडरों का भुगतान अटक गया और उन्होंने अस्पताल को सप्लाई देने से हाथ खींच लिए।

अस्पताल की इस व्यवस्थागत विफलता का सबसे वीभत्स चेहरा उन मरीजों के रूप में सामने आया है जो आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद निजी अस्पतालों के चक्कर काटने या सरकारी अस्पताल की फर्श पर दर्द सहने को विवश हैं।

हड्डी रोग विभाग में सर्जरी पूरी तरह ठप... विदुर नगर निवासी 41 वर्षीय अनिल जैसे कई मरीज इसका उदाहरण हैं, जिनका कूल्हा प्रत्यारोपण केवल इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि अस्पताल के पास इंप्लांट खरीदने के पैसे नहीं बचे थे।

जब स्थिति हाथ से निकलने लगी और हड्डी रोग विभाग में सर्जरी पूरी तरह ठप हो गई, तब जाकर एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने आपातकालीन हस्तक्षेप किया और वैकल्पिक मदों से बजट की व्यवस्था कर वेंडरों को शांत किया।

सप्लाई शुरू हो चुकी है... हड्डी रोग विभाग में कुछ दिनों से इंप्लांट सप्लाई में दिक्कतें थीं। सप्लाई शुरू हो चुकी है। आयुष्मान मरीजों के इंप्लांट के लिए पिछला भुगतान भी कर दिया गया है और सभी लंबित सर्जरी जल्द की जाएंगी।- डॉ. अशोक यादव, अधीक्षक, एमवायएच

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