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युवक की चीख ने हिला दी सरकार: कलेक्ट्रेट में छावनी सा पहरा; साहब, हम मजदूर हैं, हर मंगलवार धक्के नहीं खा सकते

KHULASA FIRST

संवाददाता

11 फ़रवरी 2026, 10:20 पूर्वाह्न
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युवक की चीख ने हिला दी सरकार

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट,इंदौर।
प्रशासन की जनसुनवाई का माहौल मंगलवार को पूरी तरह बदला नजर आया। जिस कलेक्ट्रेट परिसर में आम आदमी फरियाद लेकर बेरोकटोक पहुंचता था, वहां कल परिंदा भी पर मारने से कतरा रहा था। यह सुरक्षा व्यवस्था जनता की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि उस आवाज को दबाने की कवायद ज्यादा नजर आई, जिसने पिछले हफ्ते कलेक्ट्रेट की दीवारों के साथ-साथ सत्ता के गलियारों को भी झकझोर दिया था।

पिछले मंगलवार अपनी मां की विधवा पेंशन के लिए भटक रहे युवक दिनेश प्रजापत की सिसकियों और आक्रोश ने जब सोशल मीडिया से लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मोबाइल तक दस्तक दी तो तंत्र की चूलें हिल गईं। कल कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार को छोड़कर बाकी सभी दरवाजों पर जड़े ताले और चप्पे-चप्पे पर तैनात आधा सैकड़ा पुलिस बल चीख-चीख कर कह रहा था कि तंत्र अब संवाद से नहीं, पहरेदारी से चल रहा है।

प्रशासनिक तंत्र को जवाबदेह बनाना होगा
शहर के प्रबुद्ध वर्ग और कलेक्ट्रेट पहुंचने वाले फरियादियों के बीच अब यही चर्चा है कि यदि निचले स्तर के कार्यालयों में ही निष्पक्ष सुनवाई हो जाती और जनता की समस्या का हल निकल आता तो किसी मजदूर को अपना काम छोड़कर कलेक्ट्रेट की देहरी पर सिर पटकने की जरूरत ही क्यों पड़ती? असल सवाल सुरक्षा का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की उस संवेदनहीनता का है, जो एक मामूली पेंशन के लिए किसी युवक को इतना विवश कर देती है कि उसकी चीख पूरे प्रदेश की सुर्खियां बन जाती है।

जवाबदेही तय करने के बजाय सुरक्षा घेरे ऊंचे कर दिए
विडंबना देखिए कि जिस कलेक्ट्रेट को जनता की शिकायतों का अंतिम सहारा माना जाता है, वहां अब फरियादी को एक खतरे की तरह देखा जाने लगा है। पिछले दिनों जब दिनेश अपनी बुजुर्ग मां रामप्यारी बाई को लेकर भटक रहा था, तब उसकी व्यथा सुनने के बजाय उसे सिस्टम की सुस्ती का शिकार बनाया गया। वीडियो वायरल होने और मुख्यमंत्री तक बात पहुंचने के बाद सरकार की छवि धूमिल हुई तो प्रशासन ने जवाबदेही तय करने के बजाय सुरक्षा के घेरे ऊंचे कर दिए।

केवल एक व्यक्ति ही ऊपर जा सकेगा
कलेक्ट्रेट परिसर की सीढ़ियों से लेकर कक्ष क्रमांक 102 तक जाने वाले हर रास्ते पर पुलिस के जवानों और वॉलेंटियर्स की ऐसी घेराबंदी थी मानो किसी संवेदनशील अपराधी की पेशी हो। नियम सख्त थे, नीचे जनसुनवाई में शिकायत की रसीद कटाओ और केवल एक व्यक्ति ही ऊपर जा सकेगा।

सुरक्षा में तैनात जवानों ने साफ कह दिया कि ऊपर से निर्देश हैं कि पानी की बोतल, एसिड संदिग्ध पदार्थ तो दूर, पान-मसाला और बीड़ी-सिगरेट तक की अनुमति नहीं है। यह सख्ती उस डर का नतीजा थी जो दिनेश प्रजापत के शब्दों ने पैदा किया था।

दिनेश ने जब भारी गले से कहा था, साहब, हम मजदूर हैं, हर मंगलवार काम छोड़कर धक्के नहीं खा सकते, तो इस करुण पुकार ने इंदौर जिला प्रशासन के सुशासन के दावों की हवा निकाल दी थी।

कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में गूंजी वह चीख असल में उन हजारों मजलूमों का प्रतिनिधित्व कर रही थी, जो राशन कार्ड में नाम जुड़वाने या रुकी हुई पेंशन शुरू करवाने के लिए सरकारी फाइलों के मकड़जाल में दम तोड़ रहे हैं।

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