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सब पर भारी ‘पहलवान‘: ‘भोपाल’ में काम आए ‘उज्जैन’ में सीखे ‘पटे-बनेठी’ के पैर-पैंतरे

अनेक किंतु-परंतु के बावजूद दिल्ली से रिश्ते बने रहे मजबूत ‘राजनीतिक बुनियाद’ व ‘लीडर वाली पहचान’ की मजबूती में बीते ‘सरकार’ के दो बरस प्रधानमंत्री गृहमंत्री के ‘बारंबार’ प्रदेश प्रवास से मिला ‘निष्कंट

Khulasa First

संवाददाता

13 दिसंबर 2025, 7:52 पूर्वाह्न
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सब पर भारी ‘पहलवान‘

अनेक किंतु-परंतु के बावजूद दिल्ली से रिश्ते बने रहे मजबूत

‘राजनीतिक बुनियाद’ व ‘लीडर वाली पहचान’ की मजबूती में बीते ‘सरकार’ के दो बरस

प्रधानमंत्री गृहमंत्री के ‘बारंबार’ प्रदेश प्रवास से मिला ‘निष्कंटक राजकाज’

आखिरकार मनोनुकूल ही मिला पार्टी मुखिया, ‘क्षत्रपों’ पर भी कसी रही लगाम

हंसते हुए चेहरे के साथ सख्त प्रशासनिक दक्षता का दिया उदाहरण

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जी हां, बात है मध्य प्रदेश की ‘पहलवान सरकार’ के दो बरस के कार्यकाल की। सरकार के मुखिया असल की दुनिया के पहलवान भी रहे हैं नहीं, आज भी हैं। देह की बनावट व चुस्ती-फुर्ती आज भी साफ दर्शाती है कि ‘पहलवान’ के दिल-दिमाग पर ‘सरकार’ चढ़ी नहीं है। तभी तो मिजाज में ‘सरकार’ वाले लटके-झटके आज तक शामिल नहीं हुए।

व्यवहार में वही सहजता, सरलता व सज्जनता... जैसी ‘सरकार’ होने के पूर्व थी। वही चेहरे पर निश्छल मुस्कान, जैसी गृहनगर उज्जयिनी में ‘नामदारपुरा’ से ‘देवास गेट’ और ‘फ्रीगंज’ से ‘पिपली नाका’ तक पहले भी और आज भी फैली-पसरी हुई है। इन दो बरस में ‘सरकार’ के मुखमंडल पर कभी भी कर्कशता नजर आई? कड़े से कड़ा फैसला भी हंसते-मुस्कुराते हुए कर दिया, लेकिन प्रदेश की जनता को इल्म न होने दिया कि ये निर्णय दुःखी मन से किया या गुस्से में। न कभी सार्वजनिक रूप से रोष प्रकट किया। सब कुछ बेहद संयत व सलीके के साथ अंजाम दिया।

‘सरकार’ को लेकर इन दो बरस में कई ‘किंतु-परंतु’ प्रदेश की फिजाओं में गाहे-ब-गाहे तैरते रहे, लेकिन सभी आशंका-कुशंकाएं पुनः जमीन पर आ गईं। ‘सरकार’ के ये दो बरस जनहित व प्रदेशहित में समर्पित होने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक बुनियाद व लीडरशिप वाली पहचान को मजबूती प्रदान करने के लिए भी याद किए जाएंगे।

तमाम बड़े लीडर्स की प्रदेश में उपस्थिति के बावजूद जो भरोसा ‘दिल्ली दरबार’ ने ‘पहलवान’ पर जताया था, उस पर ‘सरकार’ अक्षरशः सही साबित हुई। ये ही कारण है कि ‘दिल्ली’ से रिश्ते अनेक ‘कानाफूसी’ व ‘एकांत मुलाकातों’ के बावजूद मजबूत बने रहे। इस दौरान प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के प्रदेश में हुए ‘बारंबार’ दौरे भी ये ही साबित करते हैं कि दो बरस पूर्व किया गया ‘भरोसा’ बरकरार है और आगे भी यथावत रहेगा।

हर दो-चार महीने में ‘पंत-प्रधान’ का राज्य में आना और दिल्ली में बैठकर मध्य प्रदेश के सर्वांगीण विकास पर फोकस बनाए रखने ने ‘सरकार’ के हौसलों को नए पंख भी दिए, जिससे उड़कर ‘सरकार’ सात समंदर तक पार कर गई और दुनिया के अनेकानेक नामचीन देशों से प्रदेश के लिए निवेश मांग आई।

‘सरकार’ पर भरोसे और रुतबे का ही असर था कि पार्टी संगठन का मुखिया भी अंततोगत्वा मनोनुकूल ही मिला, जबकि संगठन मुखिया की लड़ाई प्रदेश में 6 महीने से ज्यादा चली कि सरकार व संगठन के रूप में दो अलग-अलग सत्ता के केंद्र बने, लेकिन ‘दिल्ली दरबार’ ने ‘बैतूल’ का चयन कर ‘भोपाल’ की बात सुनी, जहां ‘सरकार’ विराजमान है। ‘सरकार’ ने इस ‘दो ध्रुवीय’ लड़ाई के आगाज में ही अपनी पसंद ‘बैतूल’ को बता दी थी, जो अंतिम समय तक कायम ही नहीं रही, कामयाब भी हुई।

पार्टी संगठन के साथ साथ प्रशासनिक मुखिया की ‘लड़ाई’ भी अनेक कश्मकश के बाद सरकार ही जीती, जबकि प्रशासनिक मुखिया के पद पर ‘एक्सटेंशन’ राजनीति के गलियारों में ‘सरकार’ की ‘सेहत’ से भी जोड़ दिया गया था, लेकिन इस मोर्चे पर भी ‘सरकार’ सेहतमंद होकर न सिर्फ बाहर आई, बल्कि पहले से ज्यादा ‘तंदुरुस्त’ भी नजर आ रही है।

उलटा ऐसा पहली बार हुआ जब प्रशासनिक मुखिया के पद पर एक बरस का एक्सटेंशन मिला। एक्सटेंशन तो मिलते रहे, लेकिन प्रदेश का प्रशासनिक इतिहास बताता है कि छह माह से ज्यादा आज तक किसी को नहीं मिला।

‘रूठने-मनाने’ और ‘रुसवाई’ की अनथक कहानियों के बीच भी ‘सरकार’ के रिश्ते ‘क्षत्रपों’ से ‘शत्रुता’ तक नहीं पहुंचे। राजी-नाराजी परदे के पीछे ही रही और सबका मान-सम्मान यथावत रहा। बीच-बीच में ऐसी खबरें उड़ती-बनती-परोसती भी रहीं कि ‘सब कुछ ठीक नहीं’ है, लेकिन तभी कुछ न कुछ ऐसा हुआ कि ‘सब कुछ दुरुस्त है’ कहने को सियासतदानों को मजबूर होना पड़ा।

ऐसा ‘सरकार’ की सदाशयता के चलते हुआ, न कि ‘दुरभि संधियों’ के कारण। वैसे भी अखाड़े का पहलवान ‘दू-ब-दू’ में विश्वास करता है। जो भी होना है, वह लाल मिट्टी पर दमखम के साथ होता है। राजनीति का मैदान भी अगर सियासत का अखाड़ा मान लिया जाए तो अभी तो ‘सरकार’ की कोई जोड़ नहीं हैं। ‘पहलवान’ तो ‘खड़ी कुश्ती’ के लिए भी हाथ उठाए ‘एरिना’ में घूम रहे हैं, लेकिन अभी कोई ऐसा दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा, जो ‘पहलवान’ के सामने ‘खम’ ठोंक सके और ‘दंड-पट’ पर हाथ मारते हुए मैदान मारने की ललकार लगाए।

ये पहली ऐसी ‘सरकार’ थी, जिसे प्रदेश की जनता ने सार्वजनिक रूप से तलवार चलाते देखा। ‘पटा-बनेठी’ जैसे अखाड़े के अस्त्र-शस्त्र के पैर-पैंतरे सड़क पर दिखाने वाली भी ये पहली पहल ‘सरकार’ थी। ‘सतपुड़ा की रानी’ पचमढ़ी में ‘शीर्षासन’ की उम्मीदें पाले बैठे लोगों के बीच ‘मयूरासन’ कर सबको अचंभे में डालने वाली भी ये राज्य की पहली ही ‘सरकार’ थी तो ‘अवंतिकानाथ’ की नगरी में ‘सिद्धवट’ पर पुण्य सलिला शिप्रा के ठंडे व गहरे जल में तैरकर ‘दम-गुर्दे’ दिखाने वाली भी ये सर्वप्रथम ‘सरकार’ थी।

हो भी क्यों नहीं? आखिर ये मध्य प्रदेश की पहली ‘पहलवान सरकार’ जो थी। पहलवानी भी कोई हलकी-पतली ‘मशीन’ वाली नहीं। अखाड़े की लाल मिट्टी पर पसीना बहाने वाली पहलवानी। नतीजतन ‘पहलवान’ तो सब पर भारी रहना ही था न? ‘सरकार’ के दो साल तो ये ही साबित करते हैं कि सियासतदानों के अखाड़े में कितने ही पेर-पैंतरे चलें, लेकिन ‘पहलवान’ सब पर अब तक भारी ही साबित हुए।

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