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सात समंदर पार तक मालवी की मिठास और हिंदी का सम्मान: विश्व हिंदी दिवस (10 जनवरी ) विशेष

KHULASA FIRST

संवाददाता

10 जनवरी 2026, 11:56 पूर्वाह्न
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सात समंदर पार तक मालवी की मिठास और हिंदी का सम्मान

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आधुनिक भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली राजनीतिक विचारक होने के साथ भाषा के गहरे जानकार, स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता डॉ राममनोहर लोहिया कहते थे देश की मौलिकता और सृजनात्मकता उसकी अपनी भाषा में ही निखर सकती है। विदेशी भाषा केवल जानकारी दे सकती है, लेकिन मौलिक चिंतन और जन-जन तक पहुंच केवल अपनी भाषा (हिंदी) से ही संभव है। आज विश्व हिंदी दिवस पर डॉ. लोहिया के ये विचार प्रासंगिक हैं।

निश्चित रूप से कोई भी भाषा मात्र संवाद का माध्यम ही नहीं, हमारे सोचने का तरीका भी होती है। कहा जाता है कोई भी समाज हो, उधार की भाषा में महानता हासिल नहीं कर सकता। देवी अहिल्या का विश्व प्रसिद्ध शहर इंदौर इसी बात को प्रमाणित करता है।

यहां का हर वर्ग से जुड़ा व्यक्ति अपनी भाषा में ही बात करता है। मालवी और अन्य बोलियां सहायक की भूमिका निभाती हैं। आप भी इस बात को मानेंगे कि यहां संवाद में जो मौलिकता और अपनापन है, अन्यत्र दुर्लभ है।

हिंदी को विश्व स्तर पर स्थापित करना लक्ष्य
विश्व हिंदी दिवस (10 जनवरी) हिंदी को विश्व स्तर पर स्थापित करने के एक मिशन के रूप में मनाया जाता है। लक्ष्य यही है  विश्व में भारतीय दूतावासों और विदेशों में निवास कर अपने देश का मान बढ़ा रहे भारतीयों के माध्यम से हिंदी का प्रचार-प्रसार हो। नागपुर में 10 जनवरी 1975 को पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन के बाद इसकी स्मृति विश्व हिंदी दिवस के रूप में आरंभ हो गई।  इससे पहले हम 14 सितंबर का दिन राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मना ही चुके हैं।

राजवाड़ा पर गूंजने वाली हिंदी सुनिये
हर इंदौरवासी जानता है शहर के हृदयस्थल में सिर ऊंचा कर शान से खड़ा राजवाड़ा केवल गौरवशाली अतीत को दर्शाती पहचान ही नहीं है, शहर की धड़कनों और संस्कारों का गवाह भी है। यह बताता है यहां के भाषा और संस्कृति के संस्कार सात समंदर पार भी इंदौर की खूबियां बयां करते हैं। कभी राजवाड़ा पर गूंजने वाली उस ‹हिंदी› को सुनिए, जिसमें मालवी की मिठास के साथ भाईचारे की सुगंध आती है।

मार्केटिंग और ब्रांडिंग के लिए हिंदी प्रबल माध्यम
अपने लहजे में जब कोई इंदौरी देश-विदेश में कहीं भी बोलना आरंभ करता है तो उसका कहा गया शब्द ‹भिया› ही सब कुछ समझने के लिए पर्याप्त है। इस तथ्य से कोई इंकार नहीं करेगा अब शहर के स्टार्टअप्स भी अपनी मार्केटिंग और ब्रांडिंग के लिए हिंदी को ही प्रबल माध्यम बना रहे हैं। इस बात को झुठला नहीं सकते कि प्रभावी भाषा वह नहीं है, जो केवल व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हो, बल्कि वह जो हृदय और बुद्धि पर एक साथ असर डाले।

हिंदी में समावेश की अद्भुत शक्ति समाहित
अपनी भाषा में कही गई बात ही दिल तक पहुंचती है और प्रभाव छोड़ती है। किसी ने सही कहा है भाषा वह नहीं, जिसे व्याकरण की जंजीरों में बांधा जाए, बल्कि वह जो भावनाओं को वहन कर सके। हिंदी इसीलिए प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें समावेश की अद्भुत शक्ति समाहित है।

महात्मा गांधी अक्सर कहते थे ‘हिंदी के बिना अपनी मातृभूमि में खुद को विदेशी की तरह महसूस करता हूं। पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी कहते थे जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य पर गर्व नहीं है, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता।

इंदौर में खचाखच भरे रहते हैं सभागृह
शहर में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए महत प्रयास किए जा रहे हैं। यहां के समाचार पत्र, पत्रिकाओं, साहित्यिक संस्थाओं, साहित्यकारों, लेखकों, कवियों और भाषाविदों ने इस शहर को अपने कार्यों से देश-विदेश में प्रतिष्ठापूर्ण मुकाम पर पहुंचाया है, पहुंचा रहे हैं।

निश्चित ही हिंदी को देश की बिंदी कहा जाता है, लेकिन इंदौर के लिए यह बिंदी नहीं, बल्कि धड़कन है। साहित्य के किसी भी आयोजन में खचाखच भरे सभागृह गवाही देते हैं इस शहर में हिंदी की जड़ें और संस्कार कितने गहरे हैं।

आज का दिन हर इंदौरी को यह भी याद दिलाता है हिंदी भाषा की जड़ें कितनी गहरी हैं। इंदौर, जो अपनी स्वच्छता के लिए विश्व विख्यात है, अपनी भाषा की शुद्धता और उसके प्रति सम्मान के लिए भी उतना ही समर्पित है।


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