खुशी की डोर, जिम्मेदारी की पतंग
KHULASA FIRST
संवाददाता

अजय कुमार बियाणी वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आज से तीस–पैंतीस वर्ष पहले की मकर संक्रांति याद करें तो आंखों के सामने सादगी और अपनापन तैर जाता है। पतंग उड़ाना केवल एक खेल नहीं था, वह पूरे मोहल्ले का उत्सव होता था। एक–दो दिन पहले ही दूर से मज़ाक़ में पतंगें लूटने की योजना बनती थी, छतों पर देसी हँसी गूंजती थी और हाथों में जो धागा होता था, वही सबसे कीमती लगता था।
तब हमें यह तक पता नहीं होता था कि धागा कहां से आता है, कौन बनाता है, बस इतना मालूम था कि पतंग उड़ानी है और त्योहार मनाना है। वह धागा सूती होता था, देसी होता था, और सबसे बड़ी बात- निर्दोष होता था।
समय बदला, बाज़ार बदला और हमारे त्योहारों में भी एक खतरनाक बदलाव चुपचाप घुस आया। आज सवाल यह नहीं है कि चाइना का धागा क्यों बिक रहा है, असली सवाल यह है कि वह बिक इसलिए रहा है क्योंकि हम उसे खरीद रहे हैं। मांग होगी तो आपूर्ति आएगी।
यदि हम हाथ रोक लें, तो यह जानलेवा धंधा अपने आप बंद हो जाएगा। पतंग उड़ाना हमारी परंपरा है, उस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन उस परंपरा के नाम पर किसी की जान जोखिम में डालना न परंपरा है, न संस्कृति।
चाइना का धागा केवल एक धागा नहीं है, वह लापरवाही, संवेदनहीनता और स्वार्थ की प्रतीक बन चुका है। हर वर्ष समाचारों में पढ़ते हैं—किसी का गला कट गया, किसी की आंख चली गई, कोई पक्षी तड़प कर मर गया, कोई बच्चा ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज हो गया। यह सब किसलिए? कुछ क्षणों की खुशी के लिए? यदि हमारी खुशी किसी और के जीवन पर भारी पड़ जाए, तो ऐसी खुशी पर सवाल उठना ही चाहिए।
हम यह क्यों भूल जाते हैं कि त्योहारों का मूल उद्देश्य आनंद बांटना होता है, पीड़ा देना नहीं। यदि पतंग उड़ानी है तो उड़ाइए, लेकिन सुरक्षित धागे से। यदि धागा न भी मिले तो कोई बात नहीं, हम गोदड़ी सीने के धागे से भी पतंग उड़ा सकते हैं, लेकिन उस धागे से नहीं जो किसी का गला काट दे। यह कोई त्याग नहीं, यह न्यूनतम नागरिक ज़िम्मेदारी है।
यह बात समझने की ज़रूरत है कि कानून केवल सज़ा देने के लिए नहीं होते, समाज को सही दिशा देने के लिए होते हैं। चाइना के धागे पर प्रतिबंध के बावजूद उसका खुलेआम बिकना हमारे सामूहिक चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
प्रशासन की भूमिका अपनी जगह है, लेकिन उससे पहले नागरिक चेतना की भूमिका आती है। जब तक समाज स्वयं यह न ठान ले कि वह खतरनाक धागे को हाथ नहीं लगाएगा, तब तक कोई भी नियम पूरी तरह सफल नहीं हो सकता।
मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व है, अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है। ऐसे पावन पर्व पर यदि हम असंवेदनशीलता को बढ़ावा दें, तो यह पर्व के भाव के ही विरुद्ध है। हमें यह प्रण लेना होगा कि हम अपनी खुशी के लिए किसी का गला नहीं कटने देंगे। हम उत्सव मनाएंगे, लेकिन किसी को दुख पहुंचाकर नहीं। जो व्यक्ति दूसरे को पीड़ा देकर आनंद खोजता है, वह न समाज का भला करता है, न स्वयं का।
आज आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को भी यह संस्कार दें कि उत्साह और ज़िम्मेदारी साथ–साथ चलते हैं। उन्हें बताएं कि असली बहादुरी पतंग काटने में नहीं, बल्कि गलत चीज़ को न कहने में है। यदि एक पीढ़ी यह ठान ले कि वह जानलेवा धागा नहीं खरीदेगी, तो अगली पीढ़ी को यह समस्या विरासत में नहीं मिलेगी।
देश हित और जन हित के नाम पर नारे लगाना आसान है, लेकिन सच्चा देश हित छोटे–छोटे फैसलों से बनता है। चाइना के धागे को न खरीदने का निर्णय भी वैसा ही एक छोटा, लेकिन प्रभावशाली कदम है।
आइए, इस मकर संक्रांति पर हम केवल पतंग ही न उड़ाएं, बल्कि अपनी सोच को भी ऊंचाई दें। ऐसी खुशी चुनें, जो सबके लिए सुरक्षित हो, और ऐसा उत्सव मनाएं, जिस पर किसी की आह न टिकी हो।
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